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पौराणिक कथा - चार प्रश्न

पौराणिक कथा - चार प्रश्न

 


दक्षिण कोसल टुडे द्वारा प्रस्तावना

पौराणिक कथाएँ भारतीय वाङ्मय की अमूल्य निधि हैं। ये कथाएँ इतिहास का वृत्तान्त देते हुए उसके माध्यम से शाश्वत मानवीय मूल्यों का जीवंत प्रतिबिंब हमारे समक्ष रखती हैं। समूचे भारत की इस महान कथा-परंपरा को छत्तीसगढ़ ने अपना एक अनोखा वैशिष्ट्य देते हुए आत्मसात किया है। यही अनोखापन यहाँ की 'पण्डवानी' और रामायणी जैसी लोकनाट्य विधाओं के रूप में आज विश्व-विरासत बन चुकी हैं। पर इन सभी विविधताओं के बाद भी हमारी पौराणिक कथाओं का प्रतिपाद्य मानवीय मूल्य ही रहे हैं।
अतः इसी कथा-परम्परा  से एक मोती निकालकर  दक्षिण कोसल टुडे के पटल पर हम प्रस्तुत कर रहे है — चार प्रश्न। यह कथा कलिकाल की आहट और धर्मराज युधिष्ठिर के साथ कलियुग विवेकपूर्ण संवाद के माध्यम से वर्तमान युग की विसंगतियों और नैतिक क्षरण का मार्मिक विश्लेषण करती है। आइए, इस प्राचीन बोध-कथा के दर्पण में कलयुग के स्वरूप और धर्म की सूक्ष्म मर्यादाओं को जानने का प्रयत्न करें।


पौराणिक कथा - चार प्रश्न

एक बार अपने प्रियजनों से बातचीत करते-करते महाराज युद्धिष्ठिर ने कहा, "कलिकाल ने अब अपना अधिकार सर्वत्र जमा लिया है। इसके प्रत्यक्ष चिह्न दिखाई देते हैं। कलियुग ने तो एक दिन आकर मुझसे कहा भी था कि महाराज ! अब मेरा समय आ गया है। आपको अब सिंहासन त्याग देना चाहिए।"

इस पर कुतूहलवश एक आत्मीय ने पूछा- "देव ! आप तो धर्मावतार हैं, कलियुग से आपकी भेंट कहाँ हो गयी। कलियुग का ऐसा साहस कैसे हो गया, कि वह आपके सन्मुख आ सका?"

इस प्रश्न को सुन कर, सबको सुनाते हुए धर्मराज कहने लगे- “एक दिन ये मेरे भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव चारों भाई साथ ही सभा में प्रवेश कर रहे थे। तभी इन्होंने द्वार पर एक मनुष्य को देखा।

उसके पास सर्व-सुंदर लक्षणों वाला अत्यंत-ही शीघ्रगामी एक घोड़ा था। उस अद्वितीय घोड़े को देखकर मेरे चारों भाई उस पर मुग्ध हो गये। उन्होंने जाकर उस व्यक्ति से पूछा- "क्यों भाई ! घोड़ा बेचोगे ?”

उसने नम्रता के साथ कहा- "महाराज मैं तो बेचने के लिए ही लाया हूँ।"

इस पर मेरे अनुजों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- "अच्छी बात है, भैया ! तुम इसे अभी हमारी अश्वशाला में बाँध आओ और जितने चाहो, रुपये ले जाओ।"

उस व्यक्ति ने कहा- "महाराजकुमारों! आपके यहाँ धन की तो कुछ कमी ही नहीं है। मुझे भी धन की कोई इच्छा नहीं। इसलिए मैं आप चारों से प्रश्न पूछता हूँ। यदि आप उन चारों का उत्तर दे सकें; तब तो घोड़ा आपका है। मैं उसे अश्वशाला में बाँध दूँगा। यदि आपसे उन प्रश्नों का उत्तर न दिया गया, तो मैं यह लकीर खींचे देता हूँ, धर्मपूर्वक आप उसके बाहर तब तक न जाएँ, जब तक मेरे प्रश्नों का उत्तर न मिले। मेरे भाइयों को एक साधारण अश्व विक्रेता की ऐसी बात सुनकर बड़ा कुतूहल हुआ। उन्होंने हँसते हुए कहा- "अच्छा भैया ! पूछो, हमें तुम्हारी बात स्वीकार है।"

यह सुनकर वह प्रसन्नतापूर्वक बोला- "देखिए, मैं अपने इस अश्व को लिये हुए आ रहा था, मैंने मार्ग में एक बहुत बड़ा भयंकर कुआँ देखा। उसमें मुझे एक बड़ा भारी आश्चर्ययुक्त व्यापार दिखाई दिया। उस कुएँ के मुख पर अधर में एक पैसा लटका हुआ था, उस एक पैसे में लाखों मन (भारमापन की प्राचीन इकाई जो लगभग 40 किलो की होती है) लोहा लटक रहा था, फिर भी वह पैसा कुएँ में गिरता नहीं था, यह क्या बात है?"

मेरे चारो भाई एक-दूसरे का मुख देखने लगे। किसी से इसका उत्तर नहीं बना। तब तो उसने नम्रता पूर्वक कहा- "आप चारों भाइयों में से एक भाई मेरी इस धर्म-मर्यादा के भीतर खड़े हो जायँ।" यह सुनकर भीम उसकी धर्म-रेखा के भीतर खड़े हो गये। तब उसने फिर दूसरा प्रश्न पूछा- "एक दिन मैं मार्ग में आ रहा था। मार्ग में क्या देखता हूँ कि पाँच कुएँ हैं? चार तो इधर-उधर है। एक बीच में है। उन पाँचों कुओं से पानी उबलता था। जब आस-पास के कुएँ खाली हो जाते थे, तब बीच के कुएँ से पानी उबलकर चारों को भर देता था, किंतु जब बीच का कुआँ खाली हो जाता था, तब चारों मिलकर भी उसे भर नहीं सकते थे, यह क्या बात है ?"

मेरे तीनों भाइयों में से किसी से इसका उत्तर नहीं बना, तब अर्जुन उस धर्म- रेखा के भीतर खड़े हो गये। तब उसने तीसरा प्रश्न पूछा-वह बोला- "एक दिन रास्ते में मैंने देखा, एक गो के बछिया पैदा हुई है। पैदा होते ही, बछिया गौ का दूध न पीकर, गौ ही बछिया का दूध पी रही है।"

यह सुन कर नकुल-सहदेव एक-दूसरे की ओर देखने लगे कि यह सब अद्भुत ही अद्भुत प्रश्न पूछता है। जब इसका भी कोई उत्तर न बना, तो नकुल उस धर्म-परिधि के भीतर चले गये। फिर उसने चौथा प्रश्न पूछा ।

वह कहने लगा-“एक दिन मैं मार्ग में आ रहा था। सम्मुख मैंने एक जानवर देखा। वह कई बार मुख से बुरे-बुरे शब्द करके मल-द्वार से घास खाने लगा। यह क्या बात है ?"

सहदेव से भी कुछ उत्तर न बना तो वह भी धर्म-रेखा के भीतर जाकर खड़ा हो गया।

मैं बड़ी देर तक प्रतीक्षा करता रहा। चारों में से एक भी अभी तक नहीं आया, क्या बात हो गयीं ? मैंने सेवकों को भेजा। सेवकों ने आकर मुझ से कहा- "महाराज ! एक घोड़ेवाला द्वार पर खड़ा है। उसी के समीप चारो कुमार खड़े हैं, भीतर आते ही नहीं।

मुझे भी बड़ा कुतूहल हुआ। मैं उठकर बाहर गया। मैंने समझा इन लोगों को घोड़ा अच्छा लगा है, इसे लेना चाहते है। क्या बात है, यह देता नहीं या सौदा नहीं बना। अतः मैंने कहा- "क्यों भाई, तुम घोड़ा बेचोगे नहीं?"

उसने कहा- "अन्नदाता ! मैं तो बेचने के ही लिए आया हूँ।"

मैंने कहा- "तब फिर मेरे भाई क्यों खड़े हैं ? इसे अश्वशाला में बाँध दो। जितने चाहो, रुपये ले जाओ।"

उसने कहा- "अन्नदाता ! आपके यहाँ धन की क्या कमी ? यही बात मुझसे इन कुमारों ने कही थी; किंतु धन की आवश्यकता मुझे भी नहीं। आप मेरे चार प्रश्नों का उत्तर दे दें, फिर घोड़े को मैं अवश्य अश्वशाला में बाँध दूंगा।"

धर्मराज ने कहा “पूछो, क्या प्रश्न हैं तुम्हारे ?"

उसने वही पहिला प्रश्न पूछा। अगाध कूप में पैसे के सहारे अधर में लाख मन लोहा लटका था-यह क्या बात है ?

मैंने उसे डाँटते हुए कहा- "तू बड़ा धूर्त है रे ! हमारे राज्य में तू कलियुग की बातें करता है। ऐसा तो कलियुग में होगा। कलियुग में और तो कुछ धर्म-कर्म बनेगा नहीं, जो दया-वश एक मुठ्ठी अन्न किसी को दान दे देंगे, वह एक पैसे भर दान ही से लाखों मन लोहे रूपी अधर्म को लटकाये, रखेंगे। जो दया-दान को भी छोड़ देंगे, वे उस लोहे को लेकर संसार रूपी मोह-कूप में गिर पड़ेंगे।"

यह सुनकर उस व्यक्ति ने पूछा- "महाराज, बीच का एक कुआँ तो आस- पास के चार खाली कुओं को भर देता है, किंतु बीच के खाली एक कुएँ को चारों मिलकर भी नहीं भर सकते, यह क्या बात है ?"

मैंने और उत्तेजित होकर कहा- "तू बड़ा अधर्मी है, धूर्त कहीं का ? फिर कलियुग की ही बातें मुँह से निकालता है। ऐसा तो कलियुग में होगा। पिता अपने चारों पुत्रों का पालन-पोषण करेगा, उनका पेट भरेगा, उन्हें योग्य बनायेगा, किंतु कलियुगी पुत्र वृद्धावस्था में उनकी बात भी न पूछेंगे । सब मिलकर भी अपने माता-पिता का पेट न भर सकेंगे। उन्हें अनाथालय की शरण लेनी पड़ेगी या भूखों मरेंगे।”

यह सुनकर वह व्यक्ति बोला- "महाराज, गौ का दूध बछिया को पीना चाहिए। गौ बछिया का क्यों पी रही थी ?"

मैंने उसे डाँट कर कहा- “बस, खबरदार ! बहुत हो गया। मालूम होता है तू साक्षात् कलियुग ही है। अरे, धूर्त ऐसा तो कलियुगी पिता करेंगे। लड़की पैदा हुई, कि उसीके सहारे कर्ज लेना आरम्भ कर देंगे। कर्ज खाते रहेंगे, लड़की सयानी होगी, तो उसे बेच देंगे; फिर दूसरी लड़की के नाम से कर्ज लेंगे। ऐसे कन्या-विक्रय करनेवाले नीच, अधम, पापी राक्षस पिता कलिकाल में बहुत होंगे। ऐसी बेची हुई कन्या के जो पुत्र होंगे, वे अपने पितरों को पिंडदान देने के भी अधिकारी न होंगे। कन्या को बेचनेवाला, कन्या के धन से आजीविका चलाने वाला, सब से बड़ा पापी है। ऐसे पापी का मुख देखना भी घोर पाप है, कलियुग में ऐसे ही पापी बहुत होंगे।" 

यह सुनकर उसने फिर पूछा- "महाराज ! भयंकर बुरे-बुरे शब्द करनेवाला और मलद्वार से घास खानेवाला जन्तु कौन था ?"

यह सुनकर मुझे बहुत क्रोध आया और मैंने तलवार निकालकर कहा- "अब मुझे निश्चय हो गया है। तू कपट वेष बनाये साक्षात् कलियुग ही है। अरे, नीच ! ऐसे कवि (प्रस्तुत प्रसंग में विद्वान/बुद्धिजीवी) तो कलियुग में होंगे, जो सत्य त्यागकर, मनमानी ऊटपटांग रचना करके अर्थ का अनर्थ करेंगे। अनुकूल मार्ग को छोड़कर प्रतिकूल मार्ग का आश्रय लेंगे। मैने तेरे चारों प्रश्नों का उत्तर दिया। अब तू सच-सच बता कि तू कौन है ? नहीं तो मै तेरा सिर अभी धड़ से पृथक् करता हूँ।"

यह सुन कर वह बोला-"प्रभो ! वास्तव में मैं कलियुग ही हूँ। अब मेरे राज्य करने का समय है, किंतु जब तक आप साक्षात् धर्मावतार पृथ्वी के सम्राट् हैं, तब तक मेरी गति नहीं, मेरा अधिकार नहीं, मेरी पूछ नहीं। आप तो धर्मात्मा हैं, किसो के भाग को हड़पना नहीं चाहने। अतः अब सिंहासन मुझे मिलना चाहिए। मेरा साम्राज्य होना चाहिए।"

यह सुन कर मैंने हँसते हुए कहा- "अरे, धूर्त ! मैं पहिले ही समझ गया था कि तू अधर्म का मित्र है। मैं जानता हूँ, अब तेरे साम्राज्य का समय है; किंतु भैया ! जब तक आनन्दकंद देवकीनन्दन श्री कृष्णचन्द्र इस अवनि पर विराजमान है तब तक तो हम सिंहासन को छोड़ नहीं सकते। जब वे स्वधाम पधार जायेंगे, तब हम भी हिमालय चले जायँगे। उस समय तेरी जो इच्छा हो सो करना। श्री कृष्ण के रहते हुए तू मेरे राज्य में बसने का विचार भी मत करना।" मेरी यह बात सुन कर कलियुग प्रसन्न होता हुआ चला गया।
 

राष्ट्रीय पाक्षिक ‘भारती’ के जून 1957 अंक में प्रभदत्त ब्रह्मचारी के लेख से साभार

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