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छत्तीसगढ़ में ‘मानस’-गायन का सांगीतिक वैशिष्ट्य

छत्तीसगढ़ में ‘मानस’-गायन का सांगीतिक वैशिष्ट्य


संस्कृति की विकास-यात्रा में संगीत की संगति की अनिवार्यता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता क्योंकि जीवन की लयबद्धता, रागात्मकता, मधुरता का नाम संगीत है, जो प्राणिमात्र के श्वास-प्रश्वास में, हर्ष-विषाद में, प्रेम-करुणा में व्यक्त-अव्यक्त रूप से जुड़ा है तथा प्रकृति के कण-कण में, क्षण-क्षण में व्याप्त है। मानस-जीवन के विविध द्वंद्वों के बीच सामंजस्य या संगति ही संगीत है, जिस में मानव की बौद्धिक तीक्ष्णता, आंतरिक भावप्रवणता, और मानसिक गतिमयता की त्रिवेणी समरस होकर प्रवाहित होती रहती हैं।

परंपरा की दृष्टि से भारतीय संगीत दो प्रमुख शीर्षों में वर्गीकृत है - ‘मार्ग’ तथा ‘देशी’, जिन्हें प्राचीन ग्रंथ ‘नारदीय शिक्षा’ में क्रमशः ‘साम’ तथा ‘गांधर्व’ कहा गया है तथा आधुनिक काल में क्रमशः ‘शिष्ट’ या ‘शास्त्रीय’ तथा ‘लोक’-संगीत कहा जाता है। ‘नारदीय शिक्षा’ से यह भी विदित होता है कि शास्त्रीय और लोक-संगीत की धाराएँ अतिप्राचीन काल से साथ-साथ प्रवाहित होती रही हैं तथा दोनों में परस्पर आदान-प्रदान चलता रहा है। शास्त्रीय संगीत को शिष्ट कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं लेना चाहिए कि लोक-संगीत अशिष्ट होता है। वस्तुतः ‘लोक’ शब्द व्यापक अर्थ लिए हुए है, जिस को संगीत के संदर्भ में ‘सहज, अनायास, प्राकृत’ कहना उपयुक्त प्रतीत होता है।


शास्त्रीय और लोक-संगीत की धाराएँ

तुलसीकृत ‘श्रीरामचरितमानस’ लोकभाषानिबद्ध प्रबंध-काव्य है, जिसे देश-विदेश में धर्मग्रंथ की प्रतिष्ठा प्राप्त है। इस प्रकार, ‘मानस’-गायन धार्मिक संगीत के अंतर्गत आता है, जिस में शास्त्रीय और लोक-संगीत का अद्भुत समन्वय मिलता है। तुलसी ने अपनी मानसेतर रचनाओं में भिन्न-भिन्न पदों के गायन के लिए राग-निर्देश भी किए हैं, परंतु ‘मानस’ में यह राग-निर्देश नहीं है, केवल छंद-निर्देश है - सोरठा, दोहा, चौपाई, छंद, और श्लोक, जिस से ताल-चयन में सुविधा होती है। ‘मानस’ को तुलसी ने लोक को समर्पित कर दिया है। यही कारण है कि व्यक्ति, स्थान, काल, आदि के भेद से ‘मानस’ की गायन-शैली में भी भिन्नता स्वभावतः मिलती है।

‘मानस’-गायन छत्तीसगढ़ की धर्मप्राण जनता का ‘सत्संग’ है, अर्थात् ‘मानस’ में प्रयुक्त संगीत कला-मात्र नहीं, भगवत्प्राप्ति का सहज-श्रेष्ठ मार्ग है तथा विशृंखलित मानव-समाज को ऐक्य-सूत्र में पिरोने का पुण्य प्रयास है। इस अंचल में ‘मानस’-गायन को ‘रमायन’ कहा जाता है।


छत्तीसगढ़ की मानस गायन परंपरा

छत्तीसगढ़ में गाँव-गाँव और नगर-नगर में ‘मानस’-मंडलियाँ हैं, जहाँ दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, अथवा मासिक ‘मानस’-गायन नियमित रूप से किया जाता है। वार्षिक ‘मानस’-समारोह के अंतर्गत क्षेत्रीय स्तर की प्रतियोगिताएँ भी होती हैं, जिन में मौलिक प्रतिभाओं को प्रोत्साहित-पुरस्कृत किया जाता है। इस के अतिरिक्त, व्यक्तिगत अनुष्ठानों (यथा-जन्मोत्सव, विवाहोत्सव, अथवा कामनापूर्ति में भी ‘मानस’-गायन श्रद्धापूर्वक करवाया जाता है तथा अन्यान्य धार्मिक पर्वों (यथा-गणेश-पूजा, दुर्गा-पूजा, नवरात्र, दशहरा, आदि) में भी इस का आयोजन किया जाता है।

‘मानस’-गायन प्रायः समवेत (कोरस) रूप में होता है, जिस में जाति, धर्म, लिंग, वय, वर्ग, आदि का भेद-भाव नहीं होता। प्रमुख गायक द्वारा कोई तर्ज उठाया जाता है, जिसे मंडली के अन्य सदस्य दुहराते हैं। महिला-‘मानस’-मंडलियों में इस के अलावा एक अन्य पद्धति भी अपनाई जाती है, जिस में पूरी मंडली दो भागों में बँटी रहती है। एक के द्वारा तर्ज उठाया जाता है, दूसरे के द्वारा उसे दुहराया जाता है। सामान्यतः तर्ज को भजन से प्रारंभ कर के अंतरा में ‘मानस’ की पंक्तियाँ गाई जाती हैं।


मानस मंडलियों की सामूहिक प्रस्तुति

गायन प्रायः मध्य लय से प्रारंभ होता है और द्रुत लय में समाप्त होता है। गमत की शैली में कहीं-कहीं चौगुन तक द्रुत करने का चलन है, तो कहीं-कहीं दुगुन तक। आदि से अंत तक सामान्य मध्य लय के निर्वाह की परिपाटी भी मिलती है। प्रायः चार चौपाइयों या आठ चौपाइयों अथवा एक दोहे के बाद तर्ज बदल दिया जाता है। एक ही तर्ज में एक से अधिक अंतरा लेने पर बीच-बीच में केवल वाद्य-संगीत का प्रयोग गायकों के विश्राम अथवा श्रोताओं के मनोरंजन के लिए किया जाता है, जिसे यहाँ ‘म्यूजिक’ कहा जाता है। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में पूजा के समय गीत न गाए जाने तथा केवल वाद्य-वादन का उल्लेख है, जिस से यह कहना संगत है कि ‘मानस’-गायन (अथवा सामान्य गायन) में बीच-बीच में वाद्य-संगीत-मात्र का चलन अति प्राचीन से विहित रहा है, फिल्मी गीतों के प्रभाव से नहीं।

छत्तीसगढ़ में प्रचलित ‘मानस’-गायन की शैलियाँ पाँच प्रमुख शीर्षों में वर्गीकृत की जा सकती हैं :-

(1) शास्त्रीय - शुद्ध राग-रागिनियों पर आधारित

(2) पारंपरिक - श्लोक कथा दोहे आदि के आलाप से प्रारंभ तथा बिना बाह्य पदों के केवल ‘मानस’ की पंक्तियों का बँधी-बँधाई रूढ़ शैली में गायन

(3) आंचलिक - पंडवानी, पंथी, सुआ, करमा, ददरिया, भरथरी, डंडा, जसमगीत, गमत, आदि की शैलियों में ‘मानस’-गायन

(4) सरवर - बिना किसी वाद्य-यंत्र के स्वर के आरोह-अवरोह के निश्चित आवर्तन के साथ गायन (यह शैली प्रायः व्यक्तित ‘-पाठ में अपनाई जाती है)

(5) इस में सुगम गायन की शैली अपनाई जाती है, जिस में समकालीन भजन, फिल्मी भजन, स्वरचित हिंदी अथवा छत्तीसगढ़ी-भजन के अलावा पैरोडी का भी चलन है।


लोकधुनों में मानस गायन

छत्तीसगढ़ में ‘मानस’-गायन में भिन्न-भिन्न वाद्य-यंत्रों का प्रयोग किया जाता है, यथा - हारमोनियम, तबला, ढोलक, मंजीरा, बाँसुरी, बैंजो, मीराकस, चिमटी, ढपली, सिंथेसाइजर, आदि। प्रमुखता गायन की होती है, अतः कहीं-कहीं केवल ताली बजा कर भी सुमधुर ‘मानस’-गायन होता है। वाद्ययंत्रों के समन्वित प्रयोग से गायन को प्रभाव-सक्षम बनाने का उद्देश्य होता है, न कि चमत्कार-प्रदर्शन।

छत्तीसगढ़ में ‘मानस’-गायन में राम के अलावा कृष्ण, शिव, गणेश, सरस्वती, दुर्गा, साईं बाबा, आदि देवी-देवताओं की स्तुति के भजन तथा तुलसी के अलावा कबीर, नानक, सूर, मीरा, आदि के पद भी गाए जाते हैं। आजकल स्वरचित हिंदी अथवा छत्तीसगढ़ी-भजन भी ‘मानस’-गायन में खूब चल रहे हैं। ज्यादातर कहरवा, दादरा ताल चलते हैं, पर छंदों में अधिकतर रूपक का चलन है। इस के अलावा दीपचंदी भी चलती है। ‘मानस’-गायन प्रायः व्याख्या-संचालित होता है, जिस में एक दोहा अथवा चार या आठ चौपाइयों के बाद प्रवचन के माध्यम से ‘मानस’ के गूढ़ तत्वों से श्रोता अवगत होते जाते हैं। इस प्रकार, गायन की एकरसता को भीरसता से बचा लिया जाता है और दूसरे दर्जे के लिए अंतराल भी मिल जाते हैं। गायन और प्रवचन दोनों प्रभावशील होते हैं - एक में संगीत का माधुर्य होता है, तो दूसरे में वाणी का वैदग्ध्य।


मानस गायन और कथा व्याख्या

आधुनिक युग में मनुष्य एक ओर इलेक्ट्रॉनिकी के विकास के फलस्वरूप कम्प्यूटर, टी.वी., वीडियो, आदि से जुड़ता चला जा रहा है, तो दूसरी ओर उस की सर्जनात्मक प्रतिभा कुण्ठित होती जा रही है। बड़े-बड़े नगरों में संगीत की शास्त्रीय शिक्षा की यत्किंचित सुविधा का लाभ प्रायः अभिजात वर्ग तक सिमट कर रह जाता है। ऐसी स्थिति में ‘मानस’-मंडलियों में भजन-भाव में तल्लीन गायकों, वादकों, एवं श्रोता-समाज को देख कर एक विचित्र अनुभूति होती है - ‘कहियत भिन्न न भिन्न’।

लेख-
डॉ. चित्तरंजन कर,
रायपुर, छत्तीसगढ़

साभार: "छत्तीसगढ़ की संस्कृति" पुस्तक, वर्ष 2002.

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