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मुरिया दरबार

मुरिया दरबार

मुरिया दरबार

बस्तर अपने आप में भारत के प्राचीन परम्पराओं को सहेजे हुए है। बस्तर की परम्पराओं में आज भी हमें राजतन्त्र के कई पद चिन्ह नज़र आती है। ऐतिहासिक काल में विभिन्न राजतन्त्र में राजा का शासन ना होकर धर्म (नैतिकता, सत्य, क्षमा, कर्तव्य आदि का पालन) का शासन चलता था।  राजा अपनी प्रजा के सुख दुःख प्रतिदिन तो सुनते ही थे, लेकिन विशेष अवसरों पर भी राजा का दरबार लगता था। तीज- त्योहार जैसे अक्षय तृतीया, फागुन, दशहरा का दरबार एवं अन्य धार्मिक अवसर, विजय एवं युद्ध से वापसी, राज्याभिषेक और राजतिलक, विशेष अतिथि के आने से और न्याय और दंड हेतु दरबार लगता था।  

विशेष कर उल्लेखनीय है, कि मौर्य काल से लेकर विजयनगर साम्राज्य तक विभिन्न राजवंशो में विजयदशमी-दशहरा पर्व पर दरबार लगने का उल्लेख मिलता है। यह परम्परा पुरे भारत के साथ साथ हमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न रियासतों में भी देखने को मिलती है। आज भी बुजुर्ग रियासत काल की परम्पराओं का आज भी जिक्र करते है। 

छत्तीसगढ़ के रियासतों में बस्तर, कांकेर, नांदगाँव, खैरागढ़, छुई खदान, कवर्धा, रायगढ़, सक्ति, सारंगगढ़, सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगबखार जैसे विभिन्न रियासतों में दशहरे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, इस दिन कई रियासतों में दशहरे टिका का विशेष महत्व है। कई परगना के सरदार, गाँव के मुखिया, गौटियाँ आदि इस दिन अपने राजा के दरबार में उन्हें रुपये, बकरा, घी, अन्य उपहार  भेंट करते थे, बदले में राजा उन्हें पान का बीड़ा और कपडे देकर सम्मानित करता था। कई महत्वपूर्ण चर्चा और निर्णय इस समय पर लिए जाते थे।  इसके लिए दशहरा दरबार का आयोजन किया जाता था। 

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार  में शामिल हुए - News Riveting - Chhattisgarh English News Portal
बस्तर दशहरे के दौरान वर्ष २०२४ में मुरिया दरबार 

ऐसा ही एक दरबार लगाने की परम्परा हमें बस्तर दशहरे में देखने को मिलता है, जिसे मुरिया दरबार के नाम से जानते है। रियासत काल में राजा और ग्रामीणों के बीच मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है। जिसमें ग्रामीण और शहरी जन प्रतिनिधियों के बीच आवश्यक विषयों को लेकर चर्चा होती है। रियासत काल में जनता और राजा के मध्य दरबार के माध्यम से विभिन्न मुद्दों को लेकर विचार-विमर्श हुआ करता था। और यथासंभव समस्याओं का समाधान भी हो जाया करता था।

रियासत काल में मुरिया दरबार जनता और राजा के बीच सामाजिक संपर्क का मुख्य माध्यम था। गांव के मांझी, मुखिया, कोटवार, चालकी, नाईक, पाईक जैसे प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याएं इस दरबार में लाते थे। दरबार में कई समस्याओं पर गंभीरता से विचार किया जाता था और अगर कोई कठिनाई सामने आती थी तो उसका समाधान खोजने का प्रयास होता था। यह मंच केवल ग्रामीणों की शिकायतों तक सीमित नहीं था, बल्कि राज्य के कर्मचारियों की समस्याएं भी उस मंच पर रखी जा सकती थीं।

बस्तर दशहरा की विशिष्ट परंपराओं में मांझी और चालकी जैसे प्रतिनिधियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। रियासत काल के वनांचल में राजा अपने सूचना तंत्र और प्रचार व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए मांझी-चालकियों का सहयोग लेते थे। मांझी और चालकी निरंतर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए आदिवासी समाज और राजा के बीच पुल का कार्य करते रहे हैं। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के आयोजन में भी इनकी भूमिका दिखाई पड़ती है। पर्व की शुरुआत और समापन के समय मांझी-चालकी आयोजन की सूचना, व्यवस्था और संवाद की जिम्मेदारी निभाते हैं। आज भी यह परंपरा जारी है, जिससे समाज और शासन के बीच विश्वास और सहयोग की सामाजिक कड़ी मजबूत बनी हुई है।


दिल्ली के गणतंत्र दिवस परेड के अवसर पर  'मुरिया दरबार' की झांकी

रियासतकाल में मांझी का कार्यक्षेत्र एक परगना होता था, जिसे परगनिया या परगना मांझी कहा जाता था। मांझी अपने क्षेत्र में प्रशासनिक अधिकारी की तरह कार्य करता था, उसे धार्मिक, सामाजिक और न्यायिक अधिकार प्राप्त थे। वह अपने परगना के देवी-देवताओं के सेवादारों को दशहरा पर्व की सूचना देता, राजपरिवार से मिले बिसाहा पैसा का उचित उपयोग करता और सामाजिक दायित्व निभाता। पर्व में मांझी अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है, तथा सबकी पहचान हेतु लाल पगड़ी पहनता है। इनका प्रमुख कार्य परगना की समस्याओं का निवारण, सूचना प्रचार व्यवस्था को मजबूत बनाना और लगभग हर गांव की धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों को सुव्यवस्थित करना होता था। यह परंपरा आज भी कई जगहों पर जारी है।


लाल पगड़ी में बस्तर के परगना मांझी

बस्तर दशहरा के दौरान हमें नीली पगड़ी पहने हुए कुछ ही लोग नज़र आते है। नीली पगड़ी पहनने वाले लोगों को चालकी कहा जाता था। संभवतः इनका नामकरण चालुक्यवंश के राजाओं के समय नियुक्त होने के कारण हुआ। बस्तर के एक शिलालेख में चालकीवंश के राजा का उल्लेख मिलता है, जो बस्तर राजवंश के चालुक्यवंश होने का संकेत देता है। चालकीओं का कार्य केवल बस्तर दशहरा के आयोजन तक सीमित नहीं था, बल्कि वे जनता की समस्याओं के समाधान और पुलिस कार्यों में भी सहयोग करते थे।


नीली पगड़ी में चालकी एवं मेंबरीन 

आजादी के बाद लोकतंत्र में मांझी और चालकी के पद वंशानुगत हो गए, यानी उनकी मृत्यु या कार्य न करने पर उनके पुत्र या परिवार के सदस्य उनकी जगह ले लेते हैं। ये पद परंपरागत रूप से परिवार में चलते आए हैं।

ऐतिहासिक रूप से मुरिया दरबार राजा और जनता के बीच बस्तर दशहरा के दौरान चर्चा का माध्यम बनते आ रही है। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है, कि जन प्रतिनिधियों, शासन प्रशासन और बस्तर वासियों की सहभागिता के कारण यह आज भी प्रासंगिक बना हुआ है। 

लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर, 
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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