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नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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मातृ-परक परमतत्व त्रिपुर सुंदरी

मातृ-परक परमतत्व त्रिपुर सुंदरी

वैदिक वाड़मय के परिशीलन से रुद्राणी भवानी आदि देवियां रूद्र शिव की पत्नियों में परिकल्पित की गई है। महाभारत की दुर्गा स्तुति शक्ति पूजा का प्रथम शास्त्रीय निर्देश है। श्री कृष्णा के आदेश से अर्जुन ने महाभारत युद्ध में विजयार्थ दुर्गा स्तुति की। साहित्य में निराला की राम की शक्ति पूजा से सभी परिचित है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार प्रकृति के राजस,सात्विक एवं तमस गुणों के अनुरूप गुप्त रूपी देवी (शक्ति) लक्ष्मी सरस्वती तथा महाकाली के रूप में आविर्भूत होती है।

यह तीनों शक्तियां सृष्टि रक्षण एवं प्रलय के कारण है और यह ही अपने लीला जगत में ब्रह्मा विष्णु और महेश की रचना कर अपने सहायक के स्वरूप में लेती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अखिल धारा देवी सृष्टि के प्रारंभ में महाकाली के नाम से वर्णित है जो ब्रह्मा को सृष्टि रचना के लिए प्रेरित करती है वही प्रलय के समय प्रलयकारी के रूप में अवतीर्ण होती है ।ऐश्वर्या एवं संपदाओं की प्रदात्री यह शक्ति लक्ष्मी के नाम से भी जानी जाती है। संहार रूपा यह देवी ज्येष्ठा देवी के नाम से भी विश्रुत है।

शक्ति उपासना (तन्त्र पूजा) में देवी को आनंद भैरवी त्रिपुर सुंदरी एवं ललिता के नाम से भी उल्लिखित किया गया है। शाम्भव दर्शन की दार्शनिक दृष्टि में शिव तथा शक्ति विश्व के मूलाधार तत्व है शिव प्रकाश है शक्ति स्फूर्ति है प्रकाश रूप शिव जब स्फूर्ति रूप शक्ति से सम्मिलित होता है तो वह बिंदु रूप धारण करता है दोनों की संयुक्त सत्ता नाद का विकास करती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार जो शिव शक्ति के मिश्रित परम तत्व को समझ लेता है, वह त्रिपुर सुंदरी को प्राप्त कर लेता है। अतः शाक्त उपासना का परम नि:श्रेयस त्रिपुर सुंदरी की प्राप्ति है,और उनके अनुसार परम तत्व मातृ परक है।

त्रिपुरा सुंदरी मंदिर तलवाड़ा ग्राम से ५ किलोमीटर एवं राजस्थान के बांसवाड़ा से लगभग १४ किलोमीटर हरियाली की गोद में उमराई के एक छोटे से गांव में माताबारी में स्थित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में बाला त्रिपुर सुंदरी मंदिर के चारों ओर तीन किले (गढ़) थे। तीन नगर शक्तिपुरी शिवपुरी और विष्णुपुरी में स्थित होने के कारण देवी का नाम त्रिपुर सुंदरी मंदिर पड़ा।

सिंह वाहिनी मां भगवती त्रिपुर सुंदरी की चिकने श्याम पाषाण से निर्मित मूर्ति नयनाभिराम है। जिसका आयाम लगभग ५ फीट है।इस मूर्ति में मां की अष्टादश भुजाओं में विभिन्न आयुध है। पार्श्व में नवदुर्गा की प्रतिकृतियां अंकित है। माता के श्री चरणों में सर्वत्र सिद्धि प्रदान करने वाला सिद्धि युक्त श्रीयंत्र निर्मित है। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि मंदिर के पीछे त्रिदेव दक्षिण में काली और उत्तर में अष्टभुजा सरस्वती मंदिर था। जिसके अवशेष आज भी प्राप्त होते हैं।यह भी कहा जाता है की देवी मां सिंह रूपी मयूर कमलासनी तथा प्रातः काल में कुमारी का मध्याहृ में सुंदरी अर्थात युवा तथा सांय काल में प्रौढ़ रूप धारण करने वाली होने के कारण त्रिपुर सुंदरी कहलाती है।

वर्तमान में श्रीत्रिपुर सुन्दरी का भव्य शक्तिपीठ प्रतिष्ठित है। गर्भगृह में आद्यशक्ति की श्याम पाषण से निर्मित अष्टादश भुजा वाली नेत्ररंजक प्रतिमा प्रतिष्ठित है। देवी सिंह पर आरूढ़ १८ भुजाओं से युक्त अपने करों (हस्त) में दिव्य आयुध धारण किये हुए है। देवी के वाहन सिंह के पृष्ठ (पीठ) पर अष्टदल कमल, जिस पर आसीन देवी शक्ति स्वरूप का दाहिना चरण कुछ मुड़ा हुआ है प्रतीत होता है जैसे देवी भगवती ने आसुरी शक्तियों को दबा रखा है और बांये चरण पर श्रीयंत्र आधृत है। देवी की प्रतिमा के पृष्ठ भाग में प्रभामंडल में अष्ट लघु देवी मूर्तियाँ शिल्पित है जो अपने-अपने वाहनों पर आसीन है। प्रत्येक देवी के कर में आयुध धारण है। देवी प्रतिमा के पृष्ठ भाग पर ५२ भैरव एवं ६४ योगनियों की सुन्दर लघु प्रतिमाएं अंकित है।

वांगड़ प्रदेश के राजा महाराजा भी त्रिपुर सुंदरी के उपासक थे। इसे वांगड़ की धरोहर और भारत के शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। वांगड क्षेत्र का यह त्रिपुरा सुन्दरी शक्तिपीठ जनमानस के अटूट विश्वास, असीम श्रद्धा एवं पूर्ण भक्तिभावना का केन्द्र है और मां आदिशक्ति की उपासना में तन-मन-धन न्योछावर करते है। 

प्रमाणित
आलेख सामुख्य अध्ययन एवं मन्दिर ट्रस्ट से वार्ता एवं जानकारी के आधार पर लिखित ...। 

लेख -
डॉ अदिति गौड़ (हिन्दी विभाग)
गोविन्द गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय
बांसवाडा राजस्थान

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