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आधुनिक भारत: युवा पीढ़ी और मानसिक संघर्ष की विकट चुनौतियाँ

आधुनिक भारत: युवा पीढ़ी और मानसिक संघर्ष की विकट चुनौतियाँ


प्रस्तुत लेख समकालीन भारत के उस पक्ष को उजागर करता है जिसे प्रायः भौतिक चकाचौंध की ओट में छिपा दिया जाता है। भारत को विश्व पटल पर युवाओं का देश कहा जाता है, जहाँ नवीन ऊर्जा और असीमित सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। तथापि, विकास की इस तीव्र अंधी दौड़ में हमारे युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य गम्भीर संकट के दौर से गुजर रहा है। यह लेख केवल आँकड़ों का विश्लेषण नहीं है, अपितु उन सूक्ष्म संवेगात्मक रिक्तियों की पड़ताल है जो आधुनिक परिवारों और समाज में घर कर गई हैं। लेखक ने पौराणिक आख्यानों और लोक गीतों के माध्यम से यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया है कि संसाधन और तकनीक कभी भी मानवीय संवेदनाओं और भावनात्मक समर्थन का स्थान नहीं ले सकते। यह विमर्श आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता है।


भारत विश्व का सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाला राष्ट्र है। जब भी वैश्विक मंच पर जनसांख्यिकीय लाभांश की चर्चा होती है तो भारत का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। आधुनिक युग में हमने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है।

संसाधनों में वृद्धि हुई है और निर्धनता की दर में भी निरन्तर गिरावट देखी गई है। इन उपलब्धियों के कोलाहल के मध्य एक कटु सत्य यह भी है कि भारतीय युवाओं में अवसाद, मानसिक तनाव और मनोवैज्ञानिक व्याधियों में चिन्ताजनक वृद्धि हुई है।

यूनिसेफ जैसी अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इस गम्भीर स्थिति पर अपनी चिन्ता प्रकट की है। प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो के सन्दर्भों के अनुसार, भारत में लगभग 60 प्रतिशत मानसिक विकार 35 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों में पाए जाते हैं। यह आँकड़ा हमारे राष्ट्र के भविष्य के स्वास्थ्य पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह अंकित करता है।

प्राचीन काल की तुलना में आज का परिदृश्य पूर्णतः भिन्न है। पूर्व समय में भौतिक संसाधन न्यून थे और शारीरिक श्रम की प्रधानता थी। निर्धनता भी चरम पर थी, परन्तु उस समय के युवाओं में मानसिक व्याधियाँ आज की तुलना में नगण्य थीं।

वर्तमान में हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के युग में जी रहे हैं, जहाँ कठिन से कठिन कार्य पलक झपकते ही सम्पन्न हो जाते हैं। विडम्बना यह है कि जैसे-जैसे जीवन सरल हुआ है, वैसे-वैसे मानसिक जटिलताएँ बढ़ती गई हैं। युवा किसी भी समाज की रीढ़ होते हैं।


कितना उचित है मनोविकार की कीमत पर भौतिक विकास 

वे वह सृजन शक्ति हैं जो राष्ट्र को स्वरूप और दिशा प्रदान करते हैं। यदि यह शक्ति ही मानसिक रोगों से ग्रसित होगी तो राष्ट्र का भविष्य संकट में पड़ सकता है।युवाओं में मानसिक बीमारियों की इस तीव्र वृद्धि के पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारण उत्तरदायी हैं।

भारत एक प्रधान सामाजिक देश है जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके सामाजिक परिवेश से होती है। वर्तमान दौर में बेरोजगारी, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और शैक्षणिक दबाव ने युवाओं को मानसिक रूप से झकझोर दिया है। राजस्थानी लोकभाषा की एक मार्मिक काव्य पंक्ति इस मानसिक स्थिति को भलीभाँति अभिव्यक्त करती है:

म्हारी जोड़ी रो साधु न मिल्यो म्हारी हेली किण संग करा मैं स्नेह रे जो म्हारी बोली लखे म्हारी हेली भाग पुरबला होय रे

इस भजन का भावार्थ है कि मुझे मेरी अन्तर्वेदना को समझने वाला कोई साथी नहीं मिला। मैं किससे अपने मन की बात साझा करूँ और किससे स्नेह प्राप्त करूँ? यदि मुझे मेरी भावनाओं को समझने वाला कोई मिल जाता तो मेरा जीवन धन्य हो जाता और मैं इस संसार सागर से सरलता से पार हो जाता। यह लोक अभिव्यक्ति उस 'इमोशनल गैप' या भावनात्मक शून्यता को दर्शाती है जिससे आज का युवा जूझ रहा है।


भावनात्मक स्तर पर एकांकी युवा 

युवावस्था में व्यक्ति को अपने सहोदरों, मित्रों या किसी सच्चरित्र सुहृद से उस भावनात्मक सम्बल की अपेक्षा होती है जो उसे कठिन परिस्थितियों में टूटने से बचा सके। यहाँ किसी अनैतिक सम्बन्ध का समर्थन नहीं है, अपितु एक ऐसे निश्छल साथ की आवश्यकता है जो संकट में संवेदनात्मक सुरक्षा प्रदान करे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अपनी प्रार्थना में "परम् वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्र" के माध्यम से माँ भारती को परम वैभव पर प्रतिष्ठित करने का संकल्प लेते हैं। यह विचारणीय है कि यदि युवा स्वयं स्वस्थ और ऊर्जावान नहीं होंगे तो राष्ट्र को उस परम गौरव तक कैसे ले जाया जा सकेगा?

श्रीमद्भागवत माहात्म्य में देवर्षि नारद और भक्ति देवी के प्रसंग के अनुसार, जिस प्रकार कोई माता अपनी सन्तान को दुःखी देखकर प्रसन्न नहीं हो सकती, उसी प्रकार माँ भारती भी अपने युवाओं को मानसिक संघर्ष में घुटते देख प्रसन्न नहीं हो सकती हैं।

समाज में हम अक्सर देखते हैं कि समान परिस्थितियों और मध्यमवर्गीय परिवेश में पले-बढ़े दो व्यक्तियों का जीवन मार्ग भिन्न हो जाता है। एक व्यक्ति सफलता के शिखर को छूता है और दूसरा निराशा के वशीभूत होकर आत्मघाती कदम उठा लेता है।

इसका मूल कारण वह समर्थन और साथ है जो एक को मिला और दूसरा उससे वंचित रह गया। हमारे धर्म ग्रन्थों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ घोर संकट में भी आत्मीय साथ ने परिस्थितियों को बदल दिया। राजा नल ने जब अपना राज्य खोया तो पत्नी दमयन्ती उनके साथ खड़ी रहीं।

पाण्डव जब द्यूत में हारकर वनवास गए तो भाइयों और द्रौपदी का साथ उनकी शक्ति बना। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के संघर्ष में रानी तारामती उनके साथ अडिग रहीं। इसी प्रकार भक्त प्रह्लाद और ध्रुव को जब उनके पिता के तिरस्कार का सामना करना पड़ा तो उनकी माताओं ने उन्हें संबल प्रदान किया।

आज के समय में इन प्रेरक प्रसंगों को पढ़ने और आत्मसात करने वालों की संख्या अत्यन्त सीमित रह गई है। पारिवारिक कलह, एकाकीपन, ऋण का बोझ और सामाजिक प्रतिष्ठा का खोना ऐसे कारण हैं जो युवाओं को अन्धकार की ओर धकेलते हैं।


परस्पर और निःस्वार्थ सहयोग है मजबूत संबंधों की नींव 

प्रसिद्ध शिक्षाविद् विकास दिव्यकीर्ति जी ने अपने एक व्याख्यान में इस पीड़ा को स्वर दिया है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार पिता की इच्छाओं को पूर्ण करने के दबाव में उनके मन में अत्यधिक कटु विचार आने लगे थे।

उनका वह कथन किसी का अपमान करने के लिए नहीं था, वरन् उस मानसिक दबाव की अभिव्यक्ति था जो एक युवा अनुभव करता है जब उसे अपनी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है। यदि अभिभावकों का भावनात्मक समर्थन सकारात्मक रूप में मिले तो ऐसे नकारात्मक विचार मन में जन्म ही नहीं लेंगे।

वर्तमान का सबसे बड़ा संकट संवादहीनता है। जब युवा किसी विशेष परिस्थिति में अपने परिजनों से भावनात्मक सहयोग की अपेक्षा करता है और उसे वह प्राप्त नहीं होता, तो वह निराश होकर अपने अन्तर्मन में सिमट जाता है। वह यह सोचने लगता है कि कोई उसकी भावनाओं को समझने वाला नहीं है।

यह भावनात्मक दूरी उसे भीतर ही भीतर कुण्ठित करती रहती है। आज के समाचार पत्र ऐसी हृदयविदारक घटनाओं से भरे रहते हैं जहाँ किसी मेधावी छात्र या युवा ने फाँसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। सामाजिक प्रतिष्ठा की प्राप्ति में असफलता, रोजगार छिन जाने का भय, सहोदरों के मध्य मिलने वाले स्नेह में पक्षपात का अनुभव या करियर की चिन्ता युवाओं को भीतर से तोड़ देती है।


आपसी स्नेह देता है विकट परिस्थितियों में संबल 

अतः यह अनिवार्य है कि परिजन और प्रियजन युवाओं की भावनाओं और अपनी सोच के मध्य के अन्तर को समझें। हमें युवाओं के लिए एक ऐसा वातावरण निर्मित करना चाहिए जहाँ वे बिना किसी संकोच के अपने दुःख और अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकें।

भौतिक संसाधन और परीक्षाएँ मनुष्य ने ही बनाई हैं और युवा वह ऊर्जा है जो इन्हें संचालित करने में सक्षम है। कोई भी परीक्षा मनुष्य की जीवनी शक्ति से बड़ी नहीं होती। ईश्वर की कृपा और आत्मीय जनों का साथ युवाओं के लिए उस नौका के समान है जो उन्हें मानसिक विकारों के समुद्र से पार ले जा सकती है। हमें सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा कि हमारा युवा अनैतिक और आत्मघाती मार्गों का त्याग कर एक स्वस्थ और सुदृढ़ राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दे सके।

-विशाल प्रजापति

 

 

 

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