मित्रता की लोक परंपराएं
August 01, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार
नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

हमने अक्सर प्रभु श्रीराम- सुग्रीव तथा श्रीकृष्ण- सुदामा की मित्रता के बारे में सुना है। जिसे भारतीय समाज में एक आदर्श मित्रता के रूप माना जाता है। इसी प्रकार की मित्रता के कई उदाहरण हमें मितानी परम्परा के रूप में मिलता है। लोग इसे मितान बदना भी कहते हैं। मितान बदने का अर्थ है, जीवन भर मित्रता निभाने का वचन देना है। मितानी परम्परा लंबे समय से चली आ रही एक लोक परम्परा है। इसमें दो व्यक्ति इस परंपरा के मध्यम से जीवन भर के लिए मित्रता का सम्बन्ध बनाते हैं।
यह मित्रता केवल दोनों मित्रों तक सीमित नहीं रहती। यह मित्रता दोनों परिवारों को भी हमेशा के लिए जोड़ देती है। इस मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने की एक सामाजिक रीति है। इस परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता इसके अनेक विधि और विधान हैं। किसी भी परिस्थिति में मितानी तोड़ने या छोड़ने का कोई नियम इस परम्परा में नहीं है।

मितान परंपरा
लोग अक्सर अपने समान आयु वाले साथियों के साथ पढ़ाई या काम करते हैं। विचार मिलने पर उनमें स्वाभाविक रूप से मित्रता हो जाती है। मितानी परम्परा में समान विचार वाले साथी एक दूसरे को मितान बनाते हैं। कई बार माता और पिता अपने छोटे बच्चों के लिए भी समान विचार वाले परिवारों में मितान का सम्बन्ध जोड़ते हैं। इस सम्बन्ध में व्यक्तिगत पहचान का कोई महत्व नहीं होता। गाँव में कम संख्या में रहने वाले समुदाय हो या बहुसंख्यक समुदाय इस बंधन के बाद कोई फर्क नहीं रह जाता।
इससे समाज में भाईचारा कायम होता है। इसके अतिरिक्त यदि दो व्यक्तियों के बीच लगातार अकारण मनमुटाव रहता है, तो उसे दूर करने के लिए भी गाँव के लोग उनकी मितानी करवा देते हैं। इसके बाद उनके सम्बन्ध हमेशा के लिए मधुर हो जाते हैं।
विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों पर अलग अलग प्रकार की मितानी होती है। जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद खिलाकर महाप्रसाद मितान और प्रयाग का गंगाजल पिलाकर गंगाजल मितान बनाते हैं। इसी तरह तुलसी पत्ता खिलाकर तुलसीदल मितान तथा नवरात्रि में जवारा लगाकर भोजली मितान बनाया जाता है। दौनापान और गोन्दाफूल या केंवरा मितान भी इसी का रूप है।

तुलसी
लोग बेलपत्र खिलाकर बेलपान मितान और रथयात्रा के पर्व पर गजामूँग मितान बनाते हैं। गोवर्धन पूजा के दिन गोवर्धन मितान बनाया जाता है। समान नाम वाले व्यक्तियों के बीच सहिनाँव मितान की परम्परा है।
पुरुषों के बीच की मित्रता को मितान कहते हैं। महिलाओं के बीच की मित्रता को मितानिन कहते हैं। यह परम्परा मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, पश्चिमी ओडिशा और झारखण्ड के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। विभिन्न अंचलों में मितानी के कुछ विशिष्ट रूप भी देखने को मिलते हैं।

मितानिन परंपरा दो परिवारों का मेल
छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में महिलाओं के बीच मितानी की एक अनूठी प्रथा सखी जोराना प्रचलित है। वहाँ दो विवाहित महिलाओं के बीच सखी का सम्बन्ध सन्तानों की संख्या और उनके जन्म क्रम के आधार पर जुड़ता है। यदि किसी महिला की पहली सन्तान पुत्री और उसके बाद दो पुत्र हैं, तो वह ठीक वैसी ही सन्तान क्रम वाली दूसरी महिला से सखी बदती है।
बस्तर अंचल में श्मशान घाट में तय होने वाले मित्रता के रिश्ते को मरई बदना कहा जाता है। यह इस रिश्ते की गम्भीरता और जीवन मरण के साथ को दर्शाता है। बस्तर में दशहरा के अवसर पर सोनपत्ती के माध्यम से भी मितानी बदी जाती है।

बस्तर में दशहरा में सोनपत्ती के माध्यम से
दौनापान और केंवरा के माध्यम से होने वाली मितानी प्रकृति के साथ लोक जीवन के गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। दौना की गन्ध से साँप दूर भागते हैं। इसके विपरीत केंवरा की महक साँपों को आकर्षित करती है।
लोग मितान बनने की प्रक्रिया को आस्था और सामाजिक रीतियों के साथ सम्पन्न करते हैं। लोग इस सम्बन्ध को देवस्थल के सामने बनाते हैं। इसे किसी शुभ अवसर, सार्वजनिक अथवा पारिवारिक कार्यक्रम में भी बनाया जाता है। लोग देवताओं को साक्षी मानकर यह संकल्प लेते हैं।
इस परम्परा में चावल के आटे या धान से चौक पूरते हैं। उसके ऊपर पीढ़ा रखते हैं। इसके बाद दूर्वा या दूबी से जल के छींटे देकर दोनों व्यक्तियों के माथे पर तिलक लगाते हैं। लोग फल, अक्षत और पुष्प अर्पित करते हैं।

धान या चावल आटे से चौक बनाने की परंपरा
वे एक दूसरे के कान पर फूल या दूबी लगाकर माला पहनाते हैं। इसके बाद दोनों व्यक्ति हाथों में नारियल लेकर सात बार गले मिलते हैं। वे नारियलों का आदान प्रदान करते हैं।
इसी के साथ वे एक दूसरे को जीवन भर के लिए मितान स्वीकार करते हैं। अन्त में वे वही नारियल फोड़कर प्रसाद बाँटते हैं। दोनों परिवार एक दूसरे के सुख और दुःख में हमेशा के लिए सहभागी बन जाते हैं।
छत्तीसगढ़ में एक कहावत है कि
"सुख में समधियान अउ बीपत में मितान।"
इसका अर्थ है कि सुख में समधी या भाई काम आते हैं। विपत्ति में मितान ही काम आता है। लोग मितान के माता और पिता को फूलबाबू, फूलदाई या फूलमाँ कहकर सम्मान देते हैं।
लोग मितान के बेटे को अपना बेटा और बहू को अपनी बहू मानते हैं। महिलाएँ रक्षाबन्धन में अपने भाई के मितान को भी राखी बाँधती हैं। मितान एक दूसरे का व्यक्तिगत नाम नहीं लेते। वे एक दूसरे को मितान, मितानिन, महाप्रसाद, गुइया, सखी या गिया कहकर बुलाते हैं।

रक्षाबंधन-अपने भाई के मितान को राखी
वे एक दूसरे को प्रणाम, जोहार या सीता राम कहकर अभिवादन करते हैं। मितान के नाता, जनम भर के नाता। यह सम्बन्ध जीवन भर चलता है। मितान के निधन के बाद भी उनकी आगे की पीढ़ियाँ इस सम्बन्ध को निभाती हैं। लोग हर त्योहार में मितान के घर सिर चाउर देते हैं। लोग इसमें कच्चा अनाज, तेलई रोटी, शृंगार की सामग्री और पैसे देते हैं।

मितान के घर सिर चाउर देने की परंपरा
सतयुग के कालखण्ड में भगवान शिव के भक्तों के बीच बेलपान की मितानी परम्परा रही है। लोग बेलपान मितानी को भगवान शिव की उपासना से जोड़ते हैं। शिव के प्रति आस्था रखने वाले लोग मैत्री सम्बन्ध बनाते हैं। इनमें विशेष रूप से महिलाएँ शामिल होती हैं।
लोग बेलपत्र अर्पित करते हैं और शिव को साक्षी मानकर मित्रता का संकल्प लेते हैं। यह परम्परा आज भी अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है। बेलपान मितानी बनाते समय दोनों पक्ष एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होते हैं। वे एक दूसरे के कान में बेलपत्र लगाते हैं। वे हाथ जोड़कर सीता राम बोलकर एक दूसरे का स्वागत करते हैं।

बेलपान मितानी और भगवान शिव
एक अन्य मान्यता के अनुसार बस्तर के काकतीय वंश के राजा पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की थी। वहाँ वे पुरी के तत्कालीन राजा गजपति महाराज से मिले थे। वहाँ उन्हें रथपति की उपाधि मिली थी। राजा ने उन्हें रथ भेंट किया था। राजा पुरुषोत्तम देव पुरी से महाप्रसाद खाजा भी साथ लाए थे।
लोक मान्यता है कि उन्होंने लोगों को पुरी का महाप्रसाद खिलाकर मितान बनाया था। उसी समय से महाप्रसाद मितानी परम्परा की शुरुआत हुई। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसी आत्मीयता को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में काम करने वाली महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को मितानिन नाम दिया है।

महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को मितानिन
गर्भधारण और प्रसव के समय मितानिन गाँव की महिलाओं और बच्चों की सहायता करती है। वह एक सच्ची सहयोगी और सहेली के रूप में काम करती है। लोग सच्ची मित्रता को साथ बिताए समय और निभाए गए दायित्वों से पहचानते हैं।
आज समाज को विश्वास, संवेदना और सामुदायिक सहयोग की आवश्यकता है। मितान परम्परा अतीत की विरासत होने के साथ भविष्य के समाज के लिए एक प्रेरणा है। यह परम्परा हमें विश्व बन्धुत्व का सन्देश देती है।
समय के साथ इसका प्रभाव निरन्तर कम हो रहा है। हमें अपनी इस समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को याद रखना चाहिए। आने वाले समय में भी इसके महत्व को सहेज कर रखना चाहिए।
लेख:
योगिता साहू
कृषि-उद्यमी एवं लोक संस्कृति की अध्येता
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