आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

लोकजीवन में मितान बदने की परंपरा

लोकजीवन में मितान बदने की परंपरा


आधुनिकता की दौड़ में जब आपसी सम्बन्ध कमजोर हो रहे हैं, ऐसे में इसका प्रभाव मित्रता पर भी पड़ा है। पहले मित्रता दो लोगों के साथ दो परिवारों के बीच भी होती थी।ऐसे क्षेत्रों जहां पश्चिमी जगत प्रभाव कम है, वहाँ के गांवों ने हमारी भारतीय संस्कृति को बचाकर रखा है। यह लेख छत्तीसगढ़ में मितान बदने की परम्परा पर आधारित है, आइए विस्तार से इस परंपरा को जानते और समझते है। 


शास्त्रों में भगवान श्रीराम और सुग्रीव ने अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता निभाई थी। इसी भाव का विस्तार हमें पूरे भारत में दिखता है। भगवान राम ने सुग्रीव के लिए बाली का वध किया था। श्रीराम के लिए सुग्रीव की वानर सेना ने अपना जीवन दांव पर लगा दिया था।

छत्तीसगढ़ में मितान भी अपने मित्र के घर विवाह या दुःख के समय सबसे पहले पहुंचता है। वह सुख और दुःख के हर अवसर पर परिवार के सगे सदस्य के समान कार्य करता है। सुख और दुःख के विशेष अवसरों पर सगे सम्बन्धियों की तरह मितान भी अपना मुंडन करवाता है। यह आचरण इस रिश्ते की मजबूती को स्पष्ट करता है।

छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है,
"माटी के देह हा माटी में मिल जाही, पर मितान के दिए बचन कभू न जाही।"


मितान बदने की परंपरा

इस परम्परा की एक प्रमुख बात है, मर्यादा है। मितान बनने के बाद दोनों व्यक्ति सम्मान हेतु जीवन भर एक दूसरे का नाम नहीं पुकारते हैं। वे जब भी मिलते हैं आदरपूर्वक 'सीताराम मितान' या 'जोहार मितान' कहकर अभिवादन करते हैं। यह सम्बन्ध व्यक्ति की मृत्यु के साथ भी समाप्त नहीं होता है। दादा के समय बने गंगाजल मितान का नाती दूसरे मितान के पोते को सगे रिश्तेदारों के समान मान सम्मान देता है।

मितान से संबंधित लोककथा
एक प्राचीन लोककथा बहुत प्रसिद्ध है। इसके अनुसार सैकड़ों वर्ष पूर्व वन क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा था। दो अलग अलग जातियों के किसान परिवार भुखमरी के कगार पर आ गए थे। एक किसान के पास खेत बोने के लिए बीज का दाना नहीं था। दूसरे किसान के पास हल चलाने के लिए मवेशी नहीं थे। दोनों के पास देने को कुछ नहीं था। उन्होंने जंगल से धंवई का फूल तोड़ा।

उन्होंने इसे एक दूसरे के हाथ में देकर जल छिड़का। उन्होंने कहा कि आज से हम मितान हुए और जो आधा पेट मेरे पास होगा वह तेरा भी होगा। दोनों ने मिलकर खेती की। उस अकाल में भी उनके घर अन्न से भर गए। तब से यह मान्यता स्थापित हो गई कि मितान बनने में धन दौलत की आवश्यकता नहीं होती है। इसमें निश्चल और निस्वार्थ भाव सबसे ऊपर होता है।


लाफिनकला गांव में मितान बनाने की परंपरा

पूरे भारत में इस तरह मित्र बनाने की परम्परा रही है। वर्ष भर में इसके लिए कई शुभ अवसर आते हैं। लोग इसे संस्कार और उत्सव की तरह मनाते हैं। पहले यह परम्परा हर घर में दिखती थी।
छत्तीसगढ़ में इसके प्रचलित रूप इस प्रकार हैं:
1.  जंवारा मितान: लोग नवरात्रि के बाद गेहूं और जौ के अंकुरित जंवारे कान में लगाते हैं। इसके बाद वे श्रीफल देकर यह सम्बन्ध बनाते हैं।
2.  गंगाजल मितान: समाज इसे सबसे पवित्र सम्बन्ध मानता है। इसमें गंगाजल छिड़ककर भाई या बहन बनते हैं।
3.  गंगा बारू मितान: इसमें गंगा की रेत हाथ में लेकर मित्रता का संकल्प लिया जाता है।
4.  गोवर्धन मितान: ग्रामीण दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा के समय यह सम्बन्ध बदते हैं।
5.  भोजली मितान: भादों महीने में भोजली विसर्जन के समय यह सम्बन्ध जुड़ता है।


भोजली मितान का अवसर

6.  महाप्रसाद मितान: लोग किसी भी त्योहार का प्रसाद बांटकर यह मित्रता करते हैं।
7.  गेन्दा फूल मितान: गेन्दे का फूल देकर यह सम्बन्ध बनाया जाता है।
8.  धंवई फूल मितान: धंवई के फूल से बहन का रिश्ता जोड़ा जाता है।
9.  दौना पान मितान: दौना में पान और सुपारी देकर यह रिश्ता पक्का किया जाता है।
10.  तुलसीदल मितान: लोग तुलसी का पत्ता खिलाकर यह सम्बन्ध बदते हैं।


ज्योति तिवारी जी और मंजू ठाकुर जी गढ़िया महोत्सव में दोनों भागवत सुनने के लिए गए, 
बुजुर्ग सासू मां ने दोनों को तुलसी दल खिलाकर मितान बनाया था :साभार Etv Bharat

मितान बदने की प्रक्रिया यह समाज को जोड़ने का एक बड़ा माध्यम भी है। समाज के विभिन्न वर्गों के लोग बिना किसी संकोच के एक दूसरे के साथ गंगाजल या महाप्रसाद मितान बद सकते हैं। मितान बनते ही दोनों परिवारों के बीच किसी प्रकार का भी भेद समाप्त हो जाता है। समाज में मितान की पत्नी को मितानिन का आदर मिलता है। उनके बच्चों को अपने बच्चों जैसा ही अधिकार मिलता है। परिवार के किसी भी मांगलिक कार्य में मितान की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है।

महासमुन्द जिले के लाफिन कला गांव में आज भी कुछ परिवार हैं। यहाँ दादा और परदादा के समय बने गंगाजल मितान के सम्बन्ध को पोते और परपोते पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बीमारी के समय सगा भाई भले दूर हो। ऐसी कठिन परिस्थिति में मितान का परिवार आधी रात को भी घर के दरवाजे पर खड़ा मिलता है।


दादा और परदादा के समय बने गंगाजल मितान

लाफिन कला के 77 वर्षीय जगदीश साहू और अरण्ड के 77 वर्षीय विष्णु यादव 'महाप्रसाद' मितान हैं। वे इस उम्र में भी अपनी रिश्तेदारी पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। मै और सन्तोष निषाद दोनों मितान है। सन्तोष निषाद के निधन के बाद मैंने (महेन्द्र कुमार पटेल) अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उनकी बहन का कन्यादान किया था। स्वर्गीय शिवचरण पटेल और स्वर्गीय छत्तर साय साहू ने 'गंगाजल' मितान बने थे। आज उनकी दूसरी पीढ़ी भी इस रिश्ते को निभा रही है। इसी तरह जगदीश प्रसाद साहू की पुत्री गिरजा साहू और भूवन साहू की पुत्री रेखा साहू ने 'महाप्रसाद' मितान बदने की परम्परा निभाई है।

पश्चिमी आधुनिकता के प्रभाव के कारण हमारी यह अनमोल परम्परा गांवों तक सिमटती जा रही है। दिखावे की प्रवृत्ति ने भी इसे बहुत प्रभावित किया है। राज्य के कुछ हिस्सों में युवा अब इस परम्परा को फिर से जीवित करने के लिए आगे आ रहे हैं। ग्रामीण लोग तीज और त्योहारों के साथ भोजली विसर्जन पर मितान दिवस का आयोजन कर रहे हैं। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को सीताराम मितान के महत्व की जानकारी देना है।


भोजली विसर्जन पर मितान दिवस का आयोजन

वर्तमान समय में युवा पश्चिमी जगत का मित्रता दिवस मना रहे हैं। वे अपनी निस्वार्थ जीवन पर्यंत निभाए जाने वाली हमारी समृद्ध परम्परा को भूल रहे हैं। आज हमारी जड़ों को फिर से देखने की आवश्यकता है। एक दूसरे के साथ कृष्ण और सुदामा के समान मित्रता निभानी चाहिए, हमारी संस्कृति ने मितान बदने यह उच्चतर मूल्यों वाली परंपरा आज भी जीवित रखी हुई है।

लेख:
महेंद्र कुमार पटेल
(लेखक शिक्षा, समाजसेवा, इतिहास तथा कला एवं संस्कृति के विषयों पर निरन्तर लेखन करते हैं।)

Follow us on social media and share!