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जनजातीय समाज के प्रति मिथ्या धारणाएँ एवं उनका कारण

जनजातीय समाज के प्रति मिथ्या धारणाएँ एवं उनका कारण

अनुसूचित जनजातीय वर्ग के बारे में प्रायः लोगों के मन में यह धारणा बनी हुई है कि वह जंगलों में रहने वाला गरीब और पिछड़ा समाज है। वास्तविकता भले ही ऐसी न हो; परन्तु जैसा अंग्रेज कहते गए, वैसा ही हम मानते गए। और यह इसका दुष्प्रभाव ही है कि अनु. जनजातीय वर्ग के विषय में हमारे मन में वैसी छवि कभी बन ही नहीं पाती, जैसी असल में है।

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बस्तर का जनजातीय समाज

चूँकि छत्तीसगढ़ की एक तिहाई जनसंख्या जनजातीय समाज की है, अर्थात् यहाँ हर तीसरा व्यक्ति जनजातीय समाज से होता है;  इसलिए जनजातीय समाज के विषय में हम फिर भी थोड़ी-बहुत समझ रखते हैं। कुछ-कुछ बाते जानते हैं। किन्तु महानगरों या ऐसे प्रान्तों के बारे में विचार कीजिए, जहाँ आज जनजातीय समाज नहीं है, तो ध्यान में आता है कि वहाँ के लोग आज भी अंग्रेजी धारणाओं को लेकर ही जी रहे हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि जनजातीय समाज एक ऐसा समाज है, जिसे मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है। पर क्यों? क्योंकि अंग्रेजों ने हमें यही सिखाया है कि सारा संसार असभ्य है, Uncivilized है। और उसे सभ्य बनाने का, Civilized करने का बड़ा भार गोरों के ऊपर है। और ऐसा नहीं है कि अंग्रेज केवल ऐसा मानते भर थे, बल्कि वे ऐसा सारे संसार में घूम-घूमकर कहते भी थे। 

अंग्रेज कहा करते थे कि उनके साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता है। ऐसी पुस्तकें लिखी गईं, ऐसी फिल्में बनाई गईं, जिनमें एक ओर तो अंग्रेजों का गुणगान किया गया, और दूसरी ओर भारत के समाज को दीन-हीन दिखाया गया। जनजातीय समाज को तो पत्ते पहने ही दिखाया जाता रहा, असभ्य तरीकों से नाचता-गाता दिखाया गया। पर क्या ऐसा वास्तव में है? नहीं न। भारत में हमारे आस-पास तो ऐसा समाज हमें नहीं दिखता।

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ब्रिटिश साम्राज्य

दरअसल अंग्रेजों ने या यूरोपीयों ने इन षड्यन्त्रों को इतनी बारीकी से गढ़ा है कि संसार भर में यही बात प्रचलित हो गई कि गोरों के अलावा सभी असभ्य हैं। उदाहरण के लिए भारत में जनजातीय समाज से पूछिये कि फिल्मों में तो जनजातियों को पत्ते पहने दिखाया जाता है, पर तुम तो ऐसे नहीं हो। तो वह भोलेपन से कह देगा कि अमेरिका में ऐसे होते होंगे, हमारे फिल्म बनाने वालों ने उनकी नकल कर दी होगी। वहीं अमेरिका के रेड इण्डियन्स सोचते हैं कि भारत में ऐसे होते होंगे। तो कुल मिलाकर पूरी दुनिया में ऐसे विचार जानबूझकर डाले गए, ताकि गोरों की प्रभुता कायम रहे। जनजातीय समाज की तो ऐसी छबि बना दी गई कि यदि कोई व्यक्ति उनके पास जाएगा, तो वे उसे खा जाएंगे। 

दुर्भाग्यवश हमने अब तक ऐसी ही फिल्मों या पुस्तकों के माध्यम से जनजातीय समाज को देखने-जानने-समझने का प्रयास किया है। पर क्या यह समाज आज नहीं है? है। तो फिर हम एक जीवन्त समाज को कैमरे की नजर से ही देखने का प्रयास क्यों करते हैं? पशुओं को कैमरे में, प्राणी संग्रहालयों में, चिड़ियाघरों में इसलिए देखा जाता है, क्योंकि वे हमसे बात नहीं कर सकते। वे हिंसक भी हो सकते हैं। पर जनजातीय समाज तो अपने ही है न! वे तो हमसे बात कर सकते हैं न! तो फिर हम क्यों उनके पास जाकर ही, उनके साथ रह कर ही उन्हें देखने-जानने-समझने के प्रयास नहीं करते? हमें यह समझने और समझाने की आवश्यकता है। आज आवश्यकता है कि जनजातीय समाज की अनुभूति हम उसके वास्तविक स्वरूप में करें।

पर यहाँ भी हम अंग्रेजी षड्यन्त्रों में फंसे रह जाते हैं। सामान्यतः जब हम किसी भी मानव-समूह का, दूसरे अर्थों में किसी समाज का अध्ययन करते हैं, तो हम उनके पास जाते हैं, उनके साथ रहते हैं। परन्तु अंग्रेजों ने हमसे यह कह दिया कि जनजातीय समाज का अध्ययन Anthropology Department के अन्तर्गत करना है, तो हम वही करने लगे। अब ये Anthropology Department यानी क्या? तो जन्तु-विज्ञान के अध्ययन के लिए अंग्रेजों ने Zoological Survey of India (भारतीय जन्तु सर्वेक्षण) की स्थापना की। इसी के अन्तर्गत एक Anthropology Department बनाया, जो जनजातीय समाज का अध्ययन करने के लिए कार्य करने वाला था। Zoology यानी जन्तुविज्ञान में वैज्ञानिक सभी आकार और आकृति के जानवरों का अध्ययन करते हैं।

The return of 'scientific' racism - Socialist Worker
 जनजातीय व्यक्ति का शारीरिक मापन करता मानवशास्त्री।

वे इस विभाग में इस बात का पता लगाते हैं कि जानवर क्या करते हैं, वे क्या खाते हैं, कैसे रहते हैं, आपस में कैसे बातचीत करते हैं, इत्यादि। और देखिए कैसी विडंबना थी कि जनजातीय समाज का अध्ययन भी वही शाखा कर रही थी, जो जानवरों का अध्ययन करती थी। अर्थात् अंग्रेजों ने हमारे जनजातीय समाज को पशुवत ही देखा। और पहले हमने कहा ही कि जैसा अंग्रेज कहते गए, वैसा हम मानते गए। तो हम भी Anthropology के अन्तर्गत यही अध्ययन करने लगे कि जनजातीय समाज के लोगों की नाक कैसी है? होंठ कैसे है? रंग कैसा है? पर जरा विचार कीजिए कि भला क्या इन सबसे किसी मानव-समाज को समझा जाता है? नहीं न।

पर जैसा गाँव या नगरों के समाज को समझा जाता है, वैसा जनजातीय समाज को न अंग्रेजों ने समझा और न उनके बाद हमने समझा। जनजातीय समाज को म्यूजियम की वस्तु या दुर्लभ प्राणी समझा जाने लगा। और इसे परम दुर्भाग्य कहना चाहिए कि अभी पिछले कुछ समय पहले ही हमने ऐसे दृश्य देखे हैं, जहाँ सरकारी कार्यक्रमों में समेत अन्य कार्यक्रमों में जनजातीय समाज को एक छोटी झोंपड़ी/गुफा बना कर बैठा दिया गया। क्या जनजातीय समाज संग्रहालय की वस्तु है? नहीं।


एक प्रदर्शनी में अब भी अंग्रेज़ी दृष्टि: छत्तीसगढ़

और इसीलिए जब हम इन सबके पीछे के कारणों पर गहराई से विचार करते हैं, तो पाते हैं कि अंग्रेजों की अधकचरी समझ पर आधारित दृष्टि ने और जैसा आगे हम चर्चा करेंगे कि भारत पर अपनी प्रभुता कायम रखने के लिए गोरों ने जो षड्यन्त्र रचे, उन सबने इतिहास को लेकर हमारी दृष्टि को ही दूषित कर दिया। जिस वन्य समाज को, जिस जनजातीय समाज को वेदों ने नमो वन्याय च कक्ष्याय च नमः (शुक्ल यजुर्वेद 16.34) कहकर नमस्कार किया, हमने उन्हें पिछड़ा, गरीब और यहाँ तक कि Head-Hunter भी समझ लिया।

अतः अब हमें हमारी इस दोषपूर्ण दृष्टि को कैसे ठीक करें इस विषय पर विचार करना होगा, वरना इस विकास की अंधी दौड़ में हम अपने ही बंधू-भगनियों से दूर होते चले जाएँगे। अब समय आ गया है कि हम अपनी इस दूषित दृष्टि का त्याग करें। अनुसूचित जनजातीय वर्ग केवल Anthropology Department के अंतर्गत होंट और कपाल के माप लेने का विषय नहीं, वह भारत की आत्मा है। यह केवल देखकर नहीं, अनुभव करके समझा जा सकता है। यही भारत की दृष्टि है  “सर्वे भवन्तु सुखिनः”  जहाँ कोई “Uncivilized” नहीं, सभी एक ही सृष्टि के आत्मबंधु हैं।


लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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