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मध्य हिमालय की लोक संस्कृति

मध्य हिमालय की लोक संस्कृति

मध्य हिमालय का गढ़वाल एवं कुमाऊँ क्षेत्र प्रचीन काल से ही आध्यात्मिक साधना, चिन्तन, धर्म आदि की तपस्थली रहा है। पुरातन काल से ही मध्य-हिमालय का यह भू-भाग ऋषियों, मुनियों संन्यासियों व आध्यात्मिक जिज्ञासा रखने वाले व्यक्तियों की प्रेरणा के केन्द्र के रूप में जाना जाता रहा है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परम्पराओं से अत्यन्त अभिभूत यह क्षेत्र अनेक नदियों का उद्‌गम स्थल भी हैं। गंगा, जमुना, अलकनन्दा, मंदाकिनी, पिंडर, टोस, धौली इत्यादि नदियाँ वहाँ की संस्कृति और साहित्य के सन्दर्भ में प्रेरणादायिनी सिद्ध हुई है।

शताब्दियों पूर्व जातियों और प्रजातियों के आवागमन व समागम के परिणाम स्वरूप इस प्रदेश में विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों का विकास हुआ, इसमें बद्री-केदार, गंगोत्री तथा यमुनोत्री प्रमुख तीर्थ स्थल बन गये। इस क्षेत्र की महिमा का वर्णन वैदिक ग्रन्थों से लेकर पुराणों एवं महाकाव्यों तक में वर्णित है। महाभारत में हिमालय के इस भूभाग को पवित्र भूमि, देवताओं का निवास तथा तीर्थों का धाम कहा गया है और महाकवि कालिदास ने 'देवात्मा हिमालय कहा है।

बौद्ध ग्रन्थों में भी अनेक बार 'गन्ध मादन' का उल्लेख आया है। पर्वतों में अधिक प्रसिद्ध मेरु पर्वत गढ़वाल हिमालय का ही अंग था। मानसखण्ड में कूर्मांचल के दस तीर्थ दारुक वन, पाताल भुवनेश्वर, चन्द्रदष्टू द्रोण, पाटन, पंचसिर, मल्लिकार्जुन, गणनाथ केतुमान आदि कई पर्वत शिखरों का उल्लेख किया गया है इनमें से कुछ आज भी जागेश्वर पंचचूली, पिंडार, दूनागिरि, बालेश्वर, गौरी घाट, नन्दादेवी, त्रिशूल के नाम से जाने जाते हैं।

पर्वतों की भाँति मध्य हिमायल की नदियों का वर्णन भी प्राचीन साहित्य में अनेक रूपों में हुआ है। इनमें अलकनन्दा भागीरथी, यमुना, सरस्वती, नन्दा, अपरनन्दा, अश्वरथा, तमसा, जाह्नवी, मालिनी, शैलोदा, मन्दाकिनी आदि उल्लेखनीय हैं। कुमाऊँ की शैलोदा रथस्था (रामगंगा) सरयू आदि गंगा की सात धाराओं में गिनी जाती थी। गंगा और यमुना के समान ही अलकनन्दा गढ़वाल की प्रसिद्ध नदी है। मन्दाकिनी भी इसकी सहायक नदी है।

मध्य हिमालय के इस क्षेत्र की सीमा सगय-समय पर बदलती रही। ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में इस प्रदेश को छोटे-छोटे क्षेत्रों में विभक्त किया जाता रहा है। प्राचीन साहित्य में इससे सम्बद्ध अनेक क्षेत्रों के नाम आये हैं और ये क्षेत्र संस्कृति की दृष्टि से एक दूसरे से पृथक् रहे है। केदार खण्ड के (40/27/29) के अनुसार पूर्व में बौद्धांचल से लेकर पश्चिम में रामसा नदी तक केदारखण्ड की सीमा थी।

उत्तर में श्वेताग गिरि और उत्तर पश्चिम में किन्नर देश टिहरी गढ़वाल की सीमा पर पड़ता है। बौद्धांचल अब विस्मृत हो गया है किन्तु कत्यूरी ताम्रलेखों से स्पष्ट है कि वह गढ़वाल और कुमाऊँ की सीमा पर स्थित रहा होगा। अब गढ़वाल और कुमाँऊ दोनों मिलकर उत्तराखण्ड कहलाते है।

मध्य हिमालय के इस क्षेत्र में आठ जिले आते हैं-देहरादून, पिथौरागढ़, अल्मोडा, नैनीताल, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली और पौड़ी गढ़वाल। इसका क्षेत्रफल 51,122 वर्ग किलोमीटर और 1991 की जनगणना के अनुसार कुल जनसख्या 58,94,352 थी।

अनेक सर्वेक्षणों एवं उत्खननों से जो परिणाम आज सामने आये हैं उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि गंगा घाटी पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान की भाँति ही उत्तराखण्ड में भी आर्य सभ्यता से सम्बद्ध संस्कृति का प्रादुर्भाव आज से लगभग तीस हजार वर्ष पूर्व हो चुका था।

गढ़वाल-कुमाऊँ का क्रमबद्ध इंतेहास नहीं मिलता। वैदिक परम्परा के बाद इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के पुरातात्विक अवशेष नहीं मिलते, फिर भी कुमाँऊ के बागेश्वर, वैजनाथ और द्वाराहाट रथानों पर बुद्ध की मूर्तियां उपलब्ध हुई है।

महामारत के वर्णन में उत्तराखण्ड में स्थित पंच प्रयागों (यथा-देव प्रयाग, रुद्र प्रयाग, कर्ण प्रयाग, नन्द प्रयाग तथा विष्णु प्रयाग) का उल्लेख बहुत ही महत्त्वपूर्ण है तथा इन स्थलों की प्राचीनता एवं धार्मिकता का बोध कराता है। पुरातत्व यह सिद्ध करता है कि पाण्डवों का उत्तराखण्ड के इस क्षेत्र से जुड़ना केवल परम्परागत ही नहीं अपितु साक्ष्यों पर भी आधारित है।

महाभारत की परम्परायें इस क्षेत्र से जुड़ी हैं। आज भी यहां पाण्डव-लीला होती है तथा दुर्योधन और कर्ण से सम्बन्द्ध पूजा इस क्षेत्र में प्रचलित है। पुरातात्त्विक आधार पर थापली तथा पुरोला के अवशेषों से यह स्पष्ट हो चुका है कि पाण्डवों का इस अन्चल में आगमन हुआ तथा तत्कालीन संस्कृति से यह भूभाग प्रभावित रहा।

पुरावशेषों से यह सिद्ध होता है कि आज से लगभग तीन या चार हजार वर्ष पूर्व हिमालय के इस अन्चल में विभिन्न समुदायों तथा प्रजातियों से सम्बद्ध लोगों का निरन्तर आगमन प्रारम्भ हो गया था। इन आगन्तुक जातियों में 'खस' सर्व प्रथम थे, जिनके बारे में यह निश्चय किया जाता है कि वह आर्यों की एक शाखा थी और क्रमशः कागड़ा, और गढ़वाल कुमाँऊ की ओर अग्रसर हुई थी। खसों के बाद क्रमशः उत्तर-मुद्रक, लगण, परतंगण, किरात आदि जातियो ने आकर इस क्षेत्र को अपनाया।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि पाषाणकाल में खस, दरद, तंगण, अभिसार, परतंगण, किरात आदि प्रजातियों के दल अपने पैतृक निवास से प्रवजन की दीर्घकालीन प्रक्रिया से गुजरने के बाद हिमालय के विभिन्न भागों में पहुंचे।

पुरातात्विक उत्खननों ने यहां के ऐतिहासिक पुरातत्व पर भी प्रकाश डाला है। ऐतिहासिक स्थानों की श्रृंखला में श्रीनगर के पास राणिहाट नामक स्थान के उत्खन्न एवं पर्यवेक्षण ने यह सिद्ध किया है कि ईसा पूर्व की तीसरी चौथी शताब्दी के आरम्भ से ही यहा एक ऐसी सुदृढ़ सभ्यता का प्रादुर्भाव हो चुका था जिसने अपने मकानों को बनाने में ईंटों का प्रयोग किया था, लोहे के शस्त्रों का निर्माण किया था तथा सुगढ़ मृ‌द्भाण्डों का भी प्रयोग किया था।

लोहे के बड़े-बड़े पिण्डों और लौह-मिट्टी की उपलब्धि के आधार पर यह कहना युक्तिसंगत होगा कि आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व राणिहाट के समीप एक पहाड़ से ही लौह धातु की खानों की उपयोगिता का ज्ञान यहां के निवासियों को हो गया था।

गढवाल का प्रथम राजवंश 'कत्यूरी' अपने को परम महेश्वर कहता था, इसलिए उसके राज्य-काल में बौद्ध धर्म को यथेष्ट प्रोत्साहन नहीं मिला। किन्तु किसी समय गढ़वाल बौद्ध धर्म का केन्द्र रहा होगा जिससे उसके प्रभाव को मिटाने के लिए शंकराचार्य को बदरीनाथ की मूर्ति का उद्धार करने वहां जाना पड़ा।

कत्यूरी ताम्रलेखों में उल्लिखित बुद्धांचल बौद्धों का पवित्र पर्वत था। स्कन्दपुराण के केदार खण्ड में तमसा तट से बौद्धांचल तक गढ़वाल की सीमा मानी गई है। मौर्यकाल में यह क्षेत्र बौद्धधर्म के लिए प्रसिद्ध रहा होगा।

मौर्यकाल में मध्य-हिमाचल में कुणिन्द प्रभावशाली रहे होंगे। यमुना और व्यास के तटवर्ती भू-भाग तथा शिवालिक पहाड़ियों में कुणिन्द फैले हुए थे। कांगड़ा और पंजाब में कुणिन्दों के कुछ सिक्के मिले हैं जो अमोधिमूर्ति (प्रथम शताब्दी ई. पू.) के माने जाते हैं। गढ़वाल में भी कुणिन्दों के सिक्के मिले हैं।

मध्य हिमाचल में कत्यूरीकर्तृपुरीय राज्य की स्थापना की, जो गढ़वाल कुनाऊँ पर तेरह पीढ़ियों (850-1050 ई.) तक शासन किया। 'ललित शूर' इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था। उसके कुछ ताम्रलेख पांडुकेश्वर और जोशीमठ में उपलब्ध हैं। बीरदेव सम्भवतः इस वंश का अन्तिम राजा था।

समस्त उत्तरी भारत में गुर्जर प्रतिहारों और उनके साथ ही पंवारों, चौहानों आदि राजपूतों का उदय एक नई शक्ति के रूप में हो रहा था। गढ़वाल और कुमाऊँ में कत्यूरी अपना प्रभाव खो चुके थे। कुछ काल की अराजकता के बाद कुमाँऊ में चद्रवंश और गढ़वाल में पंचार वंश का आधिपत्य स्थापित हो गया।

अजयपाल के एकीकरण से पूर्व यहां सम्भवतः चौहानों की कई जातियों का अधिकार था। लोहबागढ़, चाँदपुर के गढ़पति चौहान थे। मंगलसिंह काण्डारागढ़ का, सोनपाल मिलंग का गढ़पति था। अन्य गढ़ियों पर असवालों, विष्टों, नेगी, रावतों आदि का अधिकार हो चला था। मुहम्मद गौरी के आक्रमणों को रोकने की शक्ति न रही तो मैदानों से कई जातियां पहाड़ों में आश्रय के लिए आई और उन्होंने भी कई ठकुराइ‌यों स्थापित की।

कुमाऊँ पर चन्दों का शासन 1790 ई. तक रहा। ये राजा प्रभावशाली थे, पर प्रायः युद्धरत रहे। मुगल सरदारों और बादशाहो में भी ठनी रही। 1790 से 1815 ई. तक गोरखा शासन रहा। गढ़वाल के पंवार वंशी राजा प्रतापी और शूर थे।

मुगलों का गढ़वाल कुमाऊँ से क्या सम्बन्ध रहा। यह कहना कठिन है, किन्तु जो ऐतिहासिक संकेत मिलते है उससे स्पष्ट है कि मुगलों की दृष्टि में यह क्षेत्र महत्त्वपूर्ण था। गढ़वाल के प्रारम्भिक राजा 'माल' (नाम का अन्तिम शब्द) थे, बाद में 'शाह' कहलाने लगे। कहा जाता है कि यह उपाधि उन्होंने मुगलों से ही प्राप्त की थी।

इस बात के भी संकेत मिलते हैं कि कर वसूली के लिए अकबर का ध्यान गढ़वाल कुमाऊँ की ओर गया। पहाड़ी प्रदेश अकबर के अधिकार में नहीं था किन्तु उसे गंगाजल बहुत प्रिय था जिसे वहीं से मंगाकर वह पीता था। जहाँगीर के साथ गढ़वाल के सम्बन्ध संभवतः अच्छे थे। उसने 1621 ई. में गढ़वाल के जमींदार श्यामसिंह (राजा श्यामशाह) को एक घोड़ा और एक हाथी भेजा था जैसा कि जहाँगीरनामा से स्पष्ट है।

 यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि सुलेमान सिकोह औरंगजेब के भय से भाग कर गढ़वाल के राजा पृथ्वीपति शाह की शरण में पहुंचा और जब उसने सुलेमान सिकोह को लौटाना स्वीकार नहीं किया तो औरंगजेब ने आक्रमण कर सारा इन भाबर का इलाका गढ़बाल नरेश के हाथ से छीन लिया। किन्तु इसके लिए औरंगजेब को नाकों चने चबाने पड़े। औरंगजेब के साथ सम्पूर्ण राजशक्ति और सिरमौर कुमाऊँ की सेनाएं थी।

जनजीवन और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी इस काल में पहाड़ी क्षेत्र मध्यप्रदेश से असम्बद्ध रहा। नाथ-सिद्धों और कबीर पन्थियों ने उत्तरी भारत के समान हिमालय को भी प्रभावित किया। गढ़वाल कुमाऊँ के इतिहास में सबसे बड़ी घटना गोरखा आक्रमण के रूप में घटी जिसका स्मरण आज भी गढ़वाल और कुमाऊँ के लोग गोरखैणे के नाम से करते हैं। यह काल 1700 ई. से 1803 ई. तक था। समय गोरख्योल रहा।

1804 में देहरादून के खुड़बुडा नामक स्थान पर उनका मुकाबला करते हुए महाराजा प्रद्युम्नशाह का प्राणान्त हो गया और गढ़वाल पूर्णतः गोरखों के अधिकार में आ गया। तभी अंग्रेजों ने उनकी बढ़ती हुई शक्ति को रोकने का प्रयास किया और 1815 में गढ़वाल और कुमाऊँ को गोरखों से मुक्त कराने में सफल हुए। उसी उपलक्ष्य में वे आधे गढ़वाल के स्वामी बन बैठे। फलतः गढ़वाल दो भागों में विभक्त हो गया। टिहरी गढ़वाल पर वर्षों तक पंवार वश का ही शासन रहा जिससे मुक्ति पाने के लिए स्थानीय जनता के अपूर्व क्रान्ति की और सुमन, नागेन्द्रदत्त सक्लानी और भोलू सिंह ने अपना बलिदान दिया। बहुत समय तक गढ़वाल कुमाऊँ का पूरा क्षेत्र कुमाऊँ कमिश्नरी कहलाता रहा।

गढ़वाल-कुमाऊँ का यह प्रदेश एक प्रादेशिक इकाई ही नहीं है वरन भारत का सूक्ष्म रूप है। इसके इतिहास, लोक विश्वासों और लोक संस्कृति में कोल, भील, किरात, किन्नर यक्ष, गन्नाधर्गव, खश शक, हूण, द्रविड आदि अनेक जातियों की संस्कृति का समावेश है। यहां से भी जातियों का प्रसार हुआ है और यहां भी अनेक करणों में समय-समय पर अनेक जातियां आती रही है। अतः कहीं-कहीं समान नृवंशीय तत्त्वों के कारण गढ़वाल कुमाऊँ का मध्य हिमालय क्षेत्र राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, बंगाल जैसे सुदूर प्रदेशों की आश्चर्यजनक निकटता प्रकट करता है।

मध्य हिमालय प्राचीनकाल से ही धार्मिक भावना से ओतप्रोत क्षेत्र रहा है। हिमालय में शास्त्र सम्मत धर्म और लोक धर्म दोनों ही परम्पराएं समान रूप से अपना अस्तित्व बनाए हुए गिलती है। इस बात को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि धर्म, पूजा, व्रत, त्योहार, धार्मिक संस्कारों आदि सभी दृष्टि से वहां हिन्दू धार्मिक तथा शास्त्रीय पद्धति का अनुसरण किया जाता है। वेदों में सूर्य, चन्द्र, अग्नि, मरुत आदि प्राकृतिक शक्तियों की पूजा के उदाहरण मिलते हैं। हिमालय के लोकजीवन में भी कभी ऐसी प्रणालियों का समावेश रहा है।

पर्वतीय लोक जीवन में अग्नि को परम्परागत गौरव प्राप्त हुआ है। धार्मिक अनुष्ठानों, विशेषतः विवाह के अवसर पर अग्नि का 'मांगल" गाया जाता है। रात में भूत-प्रेतों और सांसारिक बाधाओं से बचने के लिए प्रायः अग्नि प्रदीप्त की जाती है। यह विश्वास भी वैदिक परम्परा के ही अनुकूल है। बाद में हिमालय में अग्नि देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुई और वही आली-माली, ज्याला, झाला आदि नामों से प्रसिद्ध हुई।

नदियों के प्रति पूजा का भाव भारतीय समाज की विशेषता रही है। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों के प्रति पवित्रता की भावना हिन्दू समाज में आदिकाल से विधमान है ।

 

                                   

गढ़वाल के कई मन्दिरों में गंगा और यमुना की मूर्तियां मिलती हैं और उनकी विधिवत् पूजा होती है आदि बदरी के मन्दिरों में गंगा और यगुना का अंकन हुआ है। गंगोत्री आदि तीर्थों में भी गंगा के मन्दिर और मूर्तियां मिलती है।

गढ़वाल की अनेक गंगाओ मुख्यतः भागीरथी और अलकनन्दा के तट पर मकर और विष्णु संक्रान्ति के अवसर पर कई मेले लगते हैं। प्राचीन काल में ये मेले गगामह कहलाते थे। नदियों और पर्वतो की भाँति वृक्षो, वनस्पतियों तथा पशु-पक्षियों के प्रति देवत्त्व और आत्मीयता का भाव मिलता है। प्रारम्भ में मानव, प्रकृति से भयग्रस्त था किन्तु बाद में उसने उसके प्रति आत्मीयता का भाव उपार्जित करने का प्रयास किया। फलतः उसने प्रकृति के अणु-अणु में अपनी और उसकी विभिन्नता के बीच धड़कते हुए प्राणों की एकसूत्रता का अनुभव किया। इसी भाव से उराने फूलों-वृक्षों आदि में भी मानवीय प्राण तत्व का समावेश ही नहीं किया वरन् उससे निकटता स्थापित करने का भी प्रयास किया।

लोक मानस में किसी एक जन्म की किशोरी दूसरे जन्म में फूल बनकर जन्म लेती है जिसका सुन्दर उदाहरण फ्यूली के फूल से सम्बद्ध लोक विश्वास है जिसके अनुसार फ्यूली का पीला फूल-फूल मात्र नहीं वरन् किसी जन्म की मानवी आत्मा की अधूरी लालसा के करुण अवसान का भावपूर्ण प्रतीक भी है। चैत के महीने में औजी वादक गढ़वाल में उनका गीत गाते हैं।

गढ़वाल कुमाऊँनी लोक गीतों में फूलों के प्रति अपार ममता और पवित्रता का भाव व्यक्त हुआ है। एक लोक गीत में कहा गया है कि रायमासी माशी का फूल कैलाश पर खिलता और वह शिव-पार्वती के सिर पर शोभायमान होता है। खाई के एक लोकगीत में यही बात बुरांशं के फूल के सन्दर्भ में कही गई है।

इसी रहस्यमय देवता के कारण फूलों को प्रसन्न रखने और उन्हें न तोड़ने की भावना लोक गीतों में मुखर हुई है। क्योंकि तोडने से फूल रूष्ट होते बताएं गए हैं। कुमाऊँ में विशेषतः चैत के महीने में फूल देई का त्योहार मनाया जाता है। बालिकाओं की टोलियां नाचते-गाते घर-घर जाकर फूल बिखेरती है।

कुमाऊँ में माघ पंचमी पर खेतों से हरे जौं लेकर बांटने और उन्हें सिर पर धारण करने की परम्परा है। बालक उन्हें अपनी टोपी पर और बालिकाएं अपनी धमेलियों पर खोंस लेती हैं और माता-पिता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नवरात्र के अवसर पर देवी की पूजा में देव मंदिरों और घरों में जौं की 'हरियाली' उगाई जाती है और उसे नवें दिन बांट दिया जाता है। लोग उसे देवी के प्रसाद के रूप में टोपियों के ऊपर धारण करते हैं। जौ के समान हल्दी की पवित्रता भी लोक में प्रसिद्ध है।

गिरि, वन, नदियों, फूल, पौधों की भाँति पशु-पक्षियों के संबंध में भी मिन्न-भिन्न परंपराएं विद्यमान हैं। लोक में बिल्ली को मारना पाप माना जाता है। मुक्ति पाने के लिए सोने की बिल्ली बनाकर दान देने की प्रथा है।

श्री जोगेन्द्र सिंह
मध्य हिमालय की लोक संस्कृति
"संस्कृति: अंक -01"
 

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