छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य : कितना पुराना है इतिहास?
November 01, 2022
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

किसी ज़माने में राजे -महाराजे भले ही सोने -चाँदी के बर्तनों में भोजन करते रहे हों, लेकिन उस दौर में सामान्य प्रजा के घरों में काँसे और पीतल के बर्तनों का ही प्रचलन था। आधुनिक युग में भी अधिकांश भारतीय घरों में काँसे और पीतल के बर्तनों की खनक लम्बे समय तक सुनाई पड़ती रही, लेकिन पहले एल्युमिनियम और बाद में स्टेनलेस स्टील के बर्तनों के आने से इनका प्रचलन अब लगभग नहीं के बराबर रह गया है।
फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में शादी -ब्याह में शगुन के रूप में कुछ बर्तन काँसे और पीतल के भी दिए जाते हैं। जैसे -काँसे की थाली, काँसे के लोटे, पीतल की कलशी आदि। लेकिन बावज़ूद इसके, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बर्तनों के बाज़ार में स्टेनलेस स्टील के बर्तनों ने अपनी ज़ोरदार बढ़त बनाकर पुराने जमाने के काँसे और पीतल के बर्तनों के कुटीर उद्योग को एक कोने में ढकेल दिया है।
इसमें दो राय नहीं कि भारत के परम्परागत हस्त शिल्प में काँसा और पीतल के बर्तन कारीगरों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता था। हाथों की कारीगरी और कड़ी मेहनत से ये बर्तन तैयार होते थे। आज भी बन रहे हैं, लेकिन कम मात्रा में। दरअसल कच्चे माल (ताम्बा, जस्ता और रांगा )की बढ़ती कीमतों की वजह से लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

छत्तीसगढ़ के पुसौर (जिला -रायगढ़ ) में कभी यह देसी और परम्परागत बर्तन उद्योग अपनी बुलंदियों पर था, जो अब ढलान पर आकर दम तोड़ रहा है। ओड़िशा की सीमा से लगभग लगे और महानदी के नज़दीक बसे पुसौर को वर्ष 2008 में ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बना दिया गया। यह कस्बे नुमा एक बड़े गाँव की तरह है। ओड़िशा की सीमा पर होने के कारण यहाँ ओड़िया भाषा और उत्कल संस्कृति का बहुत गहरा असर महसूस किया जा सकता है। बहरहाल, हम अब यहाँ के डूबते बर्तन उद्योग पर नज़र डालें।
यहाँ बर्तन बनाने का काम कसेर लोग करते थे। इस समुदाय के वरिष्ठ नागरिक वल्लभ कसेर बताते हैं कि बीस -पच्चीस साल पहले पुसौर के लगभग 70 घरों में काँसे और पीतल के बर्तन बनते थे। गलियों में इन धातुओं की खनक गूंजती रहती थी। लेकिन अब केवल चार पांच घरों में ही यह काम होता है, जैसे तैसे गुजारा चल रहा है। अधिकांश कसेरों ने अपने कच्चे -पक्के, अधपके मकानों में किराना स्टोर या दूसरी तरह की दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुओं की दुकानें खोल रखी हैं।
केदारनाथ महाणा 17 वर्ष की उम्र से बर्तन बना रहे हैं। आज वह 65 साल के हैं। उन्होंने और उनके भाई रघुनाथ ने अपने पिता स्वर्गीय दशरथ महाणा से यह काम सीखा था। केदारनाथ का बड़ा बेटा भारतीय सेना में बरेली में पदस्थ है। छोटा लड़का काँसे पीतल के काम को छोड़कर ट्रेक्टर से माल परिवहन का बिजनेस कर रहा है। घर के दो एकड़ की खेती भी संभाल रहा है।

वल्लभ कसेर ने बताया कि बाज़ार में ताम्बा 700 रुपए और रांगा 2000 रुपए किलो मिलता है। जस्ते की कीमत 300 से 500 रुपए या उससे भी कुछ अधिक हो सकती है। नये बर्तन बनवाने के लिए कोई साहूकार (दुकानदार) कच्चा माल लाकर दे तो वे एक दिन में तीन -चार किलो काँसे के नये बर्तन बना सकते हैं। इसके लिए कसेरों को 230 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मज़दूरी मिल जाती है। काँसे के पुराने बर्तनों को गलाकर नया बनवाना हो तो उसके लिए 100 रुपए प्रति किलो की मजदूरी लेते हैं, जबकि पीतल के नये बर्तन बनवाने की मजदूरी 250 रुपए और पुराने को नया बनवाने की मजदूरी 50 से 60 रुपए किलो प्रचलित है। बाज़ार में बर्तन कारोबारी काँसे के नये बर्तन 1400 से 1500 रुपए किलो के भाव से बिकते हैं।
कुछ इसी तरह का अर्थशास्त्र पीतल के बर्तनों का भी है, जिनकी कीमत 900 रुपए से 1100 रुपए के आस -पास है। यानी कारीगर को जितनी मज़दूरी मिलती है, उनके द्वारा निर्मित बर्तन उससे कहीं अधिक रेट पर बाज़ार में बिकते हैं। हालांकि अब इन प्राचीन बर्तनों का बाज़ार सिमटता जा रहा है। वल्लभ कसेर आज से करीब 29 साल पहले अपने तीन -चार नौकरों के साथ बैलगाड़ियों में बर्तन लेकर आस -पास के गाँवों में फेरे लगाकर अपना बिजनेस करते थे। उन्होंने 2012 तक यह काम किया।फिर कड़ी मेहनत के बावज़ूद लागत नहीं निकलने पर उन्होंने यह काम छोड़ दिया।

जीवन बीमा निगम के एजेंट बन गए। उस काम को भी छोड़ दिया। अब खेती करते हैं। उन्होंने मेरी मुलाकात कुछ उन कसेरों से भी करवाई जो आज बर्तनों के इस कुटीर उद्योग को सिर्फ किसी तरह खींच रहे हैं। प्रदीप कसेर, नारायण कसेर और सहदेव कसेर ,ये तीन भाई भी अपने मकान के बरामदे में धौंकनी आदि लेकर बैठे मिले। उनके दो भाइयों में से एक सरकारी नौकरी में है और दूसरा किसी की दुकान में नौकरी कर रहा है। वल्लभ कसेर के अनुसार छत्तीसगढ़ में पुसौर के अलावा चाम्पा, सक्ति और बाराद्वार भी इन बर्तनों के कुटीर उद्योग का प्रमुख केन्द्र हुआ करते थे, लेकिन अब वहाँ भी पहले जैसी बात नहीं रह गयी है।
काँसे और पीतल के बर्तन बनाने वाले अधिकांश कारीगरों को सारा काम बैठकर और झुककर करना पड़ता है, इसलिए कुछ वर्षों के बाद उनकी कमर और घुटनों में दर्द होने लगता है। बाज़ार में मांग कम, मेहनत ज़्यादा और मज़दूरी भी संतोषप्रद नहीं। ऐसे में स्टेनलेस स्टील के बर्तनों का मुकाबला कर रहे इस कुटीर उद्योग का दम फूलना और दम तोड़ने की हालत में पहुंचना बहुत स्वाभाविक है।
पुसौर में एक दिलचस्प बात यह देखने को मिली कि बर्तन बनाने वाले अधिकांश कारीगर स्थानीय रामलीला मंडली के कलाकार भी हैं। उनके बारे में फिर कभी। आज तो बस, इतना ही।
आलेख और तस्वीरें :
श्री स्वराज करुण,
वरिष्ठ साहित्यकार एवं ब्लॉगर रायपुर, छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य : कितना पुराना है इतिहास?
November 01, 2022
छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार
July 22, 2022
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के युग प्रवर्तक साहित्यकार पण्डित माधवराव सप्रे
June 19, 2022
महा मानव महात्मा गाँधी और छत्तीसगढ़ : पुण्यतिथि विशेष
January 30, 2022
ग़ुलामी के बन्धनों में जीना याने स्वयं की ज़िन्दगी को तबाह करना: लाला लाजपत राय
January 28, 2022
छत्तीसगढ़ी के प्रथम नाटक के रचयिता : पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय
January 04, 2022
पुसौर के धातु शिल्पकार एवं बर्तन उद्योग
November 24, 2021
छत्तीसगढ़ के लोक-देवता पर पहला उपन्यास : देवी करिया धुरवा
October 27, 2021
माता कौशल्या के जीवन पर पहला उपन्यास : कोशल नंदिनी
September 23, 2021
साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी : जन्म शताब्दी
December 17, 2020
कृषि संस्कृति और ऋषि संस्कृति आधारित त्यौहार : नवाखाई
August 23, 2020
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के बलिदानी
August 15, 2020
छत्तीसगढ़ भी आए थे भगवान बुद्ध
June 12, 2020
प्राचीन काल से अद्यतन सेवारत : नर्स दिवस विशेष
May 12, 2020
इशारों की भाषा है ग़ज़ल : पद्मश्री मदन चौहान से एक साक्षात्कार
February 05, 2020
सभ्यता एवं लोक संस्कृति संवाहक चित्रोत्पला गंगा महानदी
November 24, 2019
दक्षिण कोसल का पारम्परिक भित्ति चित्र सुलो कुठी
November 21, 2019
दक्षिण कोसल में लघु पत्रिका आंदोलन : एक वो भी ज़माना था !
September 28, 2019
नाचा : छत्तीसगढ़ का लोकनाट्य
September 25, 2019
छत्तीसगढ़ का कथक नृत्य का रायगढ़ घराना
September 06, 2019
संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
चौहान सम्राटों की इष्टदेवी: महाशक्ति चामुण्डा
October 16, 2026
जनजातीय युवती वल्ली और भगवान कार्तिकेय का विवाह
October 16, 2026
शत्रु पर विजय का वरदान प्राप्त होता है बगुलामुखी देवी मन्दिर
October 15, 2026
विज्ञान, मानवीय संवेदना एवं राष्ट्र के प्रेरणापुंज - डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
October 15, 2026
भील जनजाति की लोकआस्था में रायकुंडा की महिषासुरमर्दिनी
October 15, 2026
सप्तमातृका: छत्तीसगढ़ और बस्तर की शक्ति परम्परा
October 15, 2026
हाड़ौती अंचल के प्रमुख देवी मन्दिर
October 14, 2026
प्रतियोगी परीक्षा की विफलता से राष्ट्रपति पद तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की जीवन यात्रा
October 14, 2026
डंगचघिन दाई : दारिका नटनी की समाधि से लोकदेवी तक
October 13, 2026
राजा विक्रमादित्य की आराध्या: हरसिद्धी देवी
October 12, 2026
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026
सर्वपितृ अमावस्या: तर्पण और श्राद्ध का महात्म्य
October 10, 2026
भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
पितृपक्ष: लोकजीवन में पुरखों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
October 09, 2026
भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता
October 08, 2026
बैगा समुदाय में बच्चों के खेल
October 07, 2026
सौम्यता: भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव
October 06, 2026
हमारे भारत की जिजीविषा की प्रतीक : महारानी दुर्गावती
October 05, 2026
संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
चौहान सम्राटों की इष्टदेवी: महाशक्ति चामुण्डा
October 16, 2026
जनजातीय युवती वल्ली और भगवान कार्तिकेय का विवाह
October 16, 2026
शत्रु पर विजय का वरदान प्राप्त होता है बगुलामुखी देवी मन्दिर
October 15, 2026
विज्ञान, मानवीय संवेदना एवं राष्ट्र के प्रेरणापुंज - डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
October 15, 2026
भील जनजाति की लोकआस्था में रायकुंडा की महिषासुरमर्दिनी
October 15, 2026
सप्तमातृका: छत्तीसगढ़ और बस्तर की शक्ति परम्परा
October 15, 2026
हाड़ौती अंचल के प्रमुख देवी मन्दिर
October 14, 2026
प्रतियोगी परीक्षा की विफलता से राष्ट्रपति पद तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की जीवन यात्रा
October 14, 2026
डंगचघिन दाई : दारिका नटनी की समाधि से लोकदेवी तक
October 13, 2026
राजा विक्रमादित्य की आराध्या: हरसिद्धी देवी
October 12, 2026
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026
सर्वपितृ अमावस्या: तर्पण और श्राद्ध का महात्म्य
October 10, 2026
भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
पितृपक्ष: लोकजीवन में पुरखों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
October 09, 2026
भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता
October 08, 2026
बैगा समुदाय में बच्चों के खेल
October 07, 2026
सौम्यता: भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव
October 06, 2026
हमारे भारत की जिजीविषा की प्रतीक : महारानी दुर्गावती
October 05, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
राम वनगमन पथ की रामलीलाओं पर छत्तीसगढ़ का पहला संदर्भ ग्रंथ प्रकाशित
November 25, 2022