युवा: अतीत और भविष्य के मध्य का 'वर्तमान'
January 05, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

कुरुक्षेत्र में युद्ध का नवां दिन समाप्त हुआ। रात्रि में पितामह भीष्म अपने शिविर में अर्जुन को बुलाकर उनसे पूछते हैं—
“अर्जुन!”
“जी, प्रणाम पितामह!”
“आयुष्मान भव वत्स। आओ, मेरे समीप आकर बैठो और मेरे प्रश्न का उत्तर दो।”
“जी, पूछिए पितामह।”
“मैं कौन हूँ, वत्स?”
“यह कैसा प्रश्न हुआ, पितामह?”
“प्रश्न सर्वथा उचित है, वत्स। क्या तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दोगे?”
“जी, आप पितामह हैं।”
“और रणभूमि में?”
“निःसंदेह, वहाँ आप शत्रु हैं।”
“शत्रु हूँ तो मुझे वध करने के लिए आज वासुदेव को क्यों रथ से उतरना पड़ा? तुम्हारे धनुष से निकले शरों की दिशा मेरी ओर क्यों नहीं होती, अर्जुन? गुरु द्रोण से प्राप्त धनुर्विद्या में कोई खोट है क्या, या तुम्हें युद्ध के विधान का ही सम्यक ज्ञान नहीं है?”
यह कहते हुए भीष्म अपने आसन से खड़े हो जाते हैं और पूरे आक्रोश के साथ अर्जुन की ओर देखते हैं।
“क्षमा कीजिएगा, पितामह। आपके धनुष से निकले असंख्य शर प्रतिदिन दस हज़ार सैनिकों को वीरगति प्रदान कर रहे हैं, पर न जाने क्यों उनमें से एक भी शर मेरी ओर नहीं आता।”
अर्जुन हाथ जोड़कर विनम्र स्वर में अपनी बात कहते हैं।
बात को विषयांतर होता देख भीष्म कुछ क्षणों के लिए मौन हो जाते हैं। यह साधारण मौन नहीं था; इसके भीतर गूढ़ अर्थ छिपे थे। उसी अर्थ को टटोलने के लिए अर्जुन पुनः प्रश्न करते हैं—
“पितामह!”
“कहो, वत्स।”
“आप अपनी बात को स्पष्ट रूप से कहिए।”
“कल, युद्ध के दसवें दिन, मेरा वध होगा अर्जुन। यह गंगापुत्र भीष्म कल अंतिम बार युद्ध-रथ पर आरूढ़ होगा।”
“नहीं! यह सत्य नहीं हो सकता।”
“यही सत्य है, वत्स। वासुदेव तुम्हारे सारथी अवश्य हैं, किंतु मैं भी उन्हें भली-भाँति जानता हूँ।”
“तो क्या वासुदेव कल…?”
“नहीं-नहीं। यदि वासुदेव को ही मेरा वध करना होता, तो वे आज ही मुझे धराशायी कर देते। वध तो तुम ही करोगे, अर्जुन। आज संध्या मैंने शिखंडी को वासुदेव के शिविर में जाते देखा है। मैं उनकी योजना समझ चुका हूँ, और कल तुम भी उसे समय से पूर्व समझ जाओगे। मैंने तुम्हें यहाँ केवल यह कहने बुलाया है, वत्स—कल शर-संधान करते समय तुम मुझमें अपने पितामह को मत देखना। तुम्हें पितामह का नहीं, अपितु शत्रु पक्ष के सेनापति का वध करना है। तुम्हारे धनुष से निकला एक भी शर अपने लक्ष्य से चूके नहीं। अब जाओ, और कल विजयी बनो, यशस्वी बनो—यही मेरा आशीर्वाद है।”
“नहीं, पितामह। यदि मेरे शर से ही आपको कैवल्य प्राप्त होना है, तो यह कल कदापि नहीं होगा, क्योंकि सूर्य अभी दक्षिणायन में हैं।”
“अधर्म के पक्ष से युद्ध कर रहे सेनापति के लिए विधाता ने यही दंड चुना है, वत्स। उसे मुमुक्षु बनकर शर-शय्या पर, अपने क्षत-विक्षत शरीर के साथ, सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करनी होगी। मुझे इच्छा-मृत्यु का वरदान है, अर्जुन। मेरा देह मकर संक्रांति के दिन ही निष्प्राण होगा।”
सोचिए भीष्म की शक्ति अपरिमेय थी, किंतु उनकी आस्था केवल हस्तिनापुर के सिंहासन से बँधी थी। वे महाभारत में धर्म के पक्ष में न जाकर सिंहासन के आदेश का पालन करते हैं और लगभग अट्ठावन दिनों तक असह्य पीड़ा भोगते हैं। इस युग में भी जिसकी आस्था धर्म को छोड़कर केवल सत्ता या शासन से बँधी है, उसकी भी भीष्म-गति सुनिश्चित है।
उत्तरायण आध्यात्मिक चेतना के जागरण का सूत्र है। उत्तरायण का सूर्य अपनी ऊष्मा से हमारे लिए धर्म का मार्ग प्रशस्त करे। इस राशि-संक्रमण से उत्पन्न साधना का सिद्धिकाल हमारे जीवन को दिव्य बनाए। मकर संक्रांति हम सबके लिए शुभ हो।
लेख:
श्री करुणा सागर पंडा,
रायपुर छत्तीसगढ़
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