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भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान : विवाह संस्कार

भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान : विवाह संस्कार

भारतीय दर्शन में मानव जीवन को चार आयुवर्गों में विभाजित कर आश्रम व्यवस्था निर्मित की गई है। शास्त्रों के अनुसार 0 से 25 वर्ष ब्रह्मचर्य, 25 से 50 वर्ष गृहस्थ, 50 से 75 वर्ष वानप्रस्थ तथा 75 से 100 वर्ष संन्यास आश्रम का काल माना गया है। इन चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि यहीं से समाज, वंश और संस्कृति की निरंतरता सुनिश्चित होती है।


भारतीय सामाजिक व्यवस्था में प्रचलित आश्रम व्यवस्था

शास्त्र यह भी बताते हैं कि यदि मनुष्य अपने जीवन को पाप और संकटों से मुक्त करना चाहता है, तो उसे देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से उऋण होना अनिवार्य है। पितृ ऋण से उऋण होने का प्रमुख माध्यम गृहस्थ आश्रम ही है, और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का द्वार है विवाह संस्कार। यही कारण है कि भारतीय समाज में विवाह को सभी आश्रमों का मूल माना गया है।


मोक्ष प्राप्ति के लिए उपरोक्त ऋणों से उऋण होना अनिवार्य है 

विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो वंशों और दो सामाजिक इकाइयों का स्थायी गठबंधन है। भारतीय समाज अपने स्वरूप में आरण्यक, ग्रामीण और नगरीय तीनों रूपों में विद्यमान है, इसलिए विवाह की पद्धतियाँ भी विविध और विशिष्ट हैं। विशेष रूप से जनजातीय समाज में विवाह संस्कार केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, आर्थिक सहयोग और नैतिक उत्तरदायित्व की व्यवस्था है।

अरण्यक समाज में एकविवाह, बहुपत्नी विवाह तथा बहुपति विवाह-तीनों स्वरूप प्रचलित रहे हैं। गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि जहाँ स्त्री-पुरुष अनुपात संतुलित है, वहाँ एकविवाह ही अपनाया जाता है। किन्तु जहाँ लैंगिक असंतुलन या विशेष सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ होती हैं,वहाँ बहुपत्नी या बहुपति विवाह की प्रथा दिखाई देती है।

बहुपत्नी विवाह के पीछे केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक तर्क भी निहित है। जनजातीय समाज में स्त्रियाँ पुरुषों के साथ आर्थिक कार्यों में सहभागी होती हैं। वे परिवार की उत्पादन प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए यहाँ बेटी को बोझ नहीं, बल्कि सहायक तत्व माना जाता है। यही कारण है कि जनजातीय समाज में दहेज जैसी कुप्रथा का कोई स्थान नहीं है।


कृषिकार्य में हाथ बटाती जीवनसंगिनी

इसी क्रम में बहुपति विवाह की परंपरा भी दिखाई देती है। कई बार वधु मूल्य चुकाने में असमर्थता या स्त्रियों की संख्या कम होने की स्थिति में एक स्त्री से दो पुरुष विवाह कर लेते हैं। जब ऐसे पुरुष भाई होते हैं तो इसे भ्रातृक बहुपति विवाह कहा जाता है, और जब भाई नहीं होते तो अभ्रातृक या मातृसत्तात्मक बहुपति विवाह। इन प्रथाओं के मूल में सामाजिक समरसता और व्यावहारिक संतुलन की स्पष्ट समझ दिखाई देती है।

जनजातीय समाज में विवाह की कई रोचक और वैविध्यपूर्ण पद्धतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें क्रय विवाह, सेवा विवाह, हरण विवाह, हठ विवाह और सह-पलायन विवाह प्रमुख हैं। प्रत्येक पद्धति समाज की किसी विशेष परिस्थिति और आवश्यकताओं से जुड़ी हुई है।

उरांव जनजाति का मूल क्षेत्र झारखंड माना जाता है, जबकि छत्तीसगढ़ के उत्तरी सरगुजा संभाग में इनका संकेन्द्रण है। इनके लिए विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि सृष्टि के विकास का अनिवार्य चरण है। यहाँ विवाह केवल मनुष्यों के मध्य नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और पर्वों के साथ भी जुड़ा हुआ है। इस दृष्टिकोण में ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ की अवधारणा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

विवाह से पूर्व पेल्लों ऐरना, एड़प्पा रेना (घरबरी) और सिंदरी पाही जैसी रस्मों का निर्वहन किया जाता है। इन रस्मों के पूर्ण होने के बाद ऊडू खेस अर्थात वधु मूल्य का निर्धारण किया जाता है, जिसमें धान, कपड़े और कुछ राशि दी जाती है। यहाँ दहेज का कोई प्रचलन नहीं है और वधु मूल्य भी पूरी तरह क्षमता पर आधारित होता है।


वधुमूल्य और अन्य रस्म - उरांव समुदाय 

उरांव समाज में विवाहोत्सव तीन से चार दिनों तक चलता है। कांको अत्तखा, मंडप निर्माण, हल्दी चढ़ोनी, पारघोनी, सिंदूर दान, बेला पूजा और टिकावन जैसी रस्में न केवल सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती हैं, बल्कि सामाजिक सहयोग और मितव्ययिता का भी सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।


प्राकृतिक संसाधनों से तैयार मंडप 

हल्बा समुदाय का संकेन्द्रण छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और ओडिशा में है। इस समाज में दूध लौटावा, घुसपैठ और चूड़ी पहनावा विवाह प्रमुख रूप से प्रचलित हैं। दूध लौटावा विवाह संवाद और समझौते पर आधारित है। विवाह के बाद वधु के माता-पिता कुछ समय तक ससुराल में रहते हैं और दूध-दही लौटाने की परंपरा निभाई जाती है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि संबंधों में खटास आने पर भी उन्हें उपयोगी और स्थायी बनाया जा सकता है। घुसपैठ विवाह पीड़ित महिला के सम्मान और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ी प्रथा है, जबकि चूड़ी पहनावा विवाह विधवा या परित्यक्ता स्त्री के पुनर्विवाह की संवेदनशील व्यवस्था है।

गोंड समाज में जन्म, विवाह और देव पूजा जैसे संस्कार “गायता” द्वारा संपन्न कराए जाते हैं। यहाँ बड़े विवाह, मंझली विवाह, लमसेना विवाह, ढूकु विवाह और उढ़रिया विवाह प्रचलित हैं। कन्या की सहमति अनिवार्य है।


विवाहोत्सव आरम्भ करने हेतु पूजा करते हुए गायता 

माहला जाना (जिसमें वर पक्ष द्वारा कन्या को देखने जाने से लेकर अन्य कार्यक्रमों तक प्रत्येक बार यथासामर्थ्य सहयोग राशि और अन्य सामग्री डी जाती है) , खर्रा पोजा, पेन कोडांग, माडो परघानी, सगा मड़वा, तेल-हल्दी, कोडवर्किंगं, भांवर, टिकावन और एर्र हिदकाना जैसी रस्में प्रकृति, पंचतत्व और पूर्वजों से गहरे जुड़ाव को दर्शाती हैं। यहाँ प्रत्येक प्रतीक- हल्दी, चावल, सुपारी, वृक्ष, मंडप - किसी न किसी दार्शनिक अर्थ से जुड़ा है।


कन्या की सहमति के पश्चात माहला में आई सामग्री से भोज की तैय्यारी

कंवर समुदाय में रंग-बुला, नौ मड़वा, बरोखी, डमकच लोकगीत, तीन मना, कन्या परिछना, तेल पियाना और गुड़ भात नेंग जैसी रस्में सामाजिक संतुलन और आर्थिक सहयोग को सुनिश्चित करती हैं। मुरिया जनजाति में माहला, सगा जानती, जोड़ा-नापनी और अन्य रस्में संवाद, सहमति और सामूहिक निर्णय की परंपरा को जीवित रखती हैं।


मंडप में पारंपरिक रस्मों का निर्वहन करती कन्या- कंवर समुदाय 

यदि हम सनातन धर्म के श्रुति ग्रंथों में वर्णित विवाह की आठ पद्धतियों को देखें, तो जनजातीय समाज की विवाह परंपराएँ उनसे अलग नहीं दिखाई देतीं। विवाह को दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध मानने की दृष्टि यहाँ भी उतनी ही सशक्त है।

इससे स्पष्ट होता है कि जनजातीय समाज भारतीय सनातन परंपरा से अलग नहीं, बल्कि उसी की जीवंत, व्यवहारिक और संवेदनशील अभिव्यक्ति है। इन विवाह संस्कारों में सामाजिक संतुलन, स्त्री सम्मान, आर्थिक सहयोग और प्रकृति के साथ सामंजस्य की जो गहरी समझ दिखाई देती है, वह आधुनिक समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख है।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परम्परा

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