यज्ञोपवीत- एक सूत्र जो है पवित्रता का प्रतीक
February 11, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, विज्ञान और लोकजीवन के बीच संतुलन स्थापित करने वाले सूत्र होते हैं। भारतीय परंपरा में उत्सव जीवन को समझने, ऋतुओं को पहचानने और समाज को जोड़ने का माध्यम रहे हैं। ऐसे ही पर्वों में मकर संक्रांति का स्थान विशिष्ट है, क्योंकि यह पर्व एक साथ खगोलीय घटना, कृषि परंपरा, लोक-संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को अभिव्यक्त करता है।

हमारी संस्कृति के विषय में एक उत्सुकता सदैव से मेरे मन मस्तिष्क रही है। बचपन से ही मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता रहा जब हिंदू पंचांग के अनुसार होली, दीपावली, नवरात्र, रामनवमी जैसे अधिकांश पर्व हर वर्ष आगे-पीछे होते रहते हैं, तो मकर संक्रांति लगभग हर साल 14 जनवरी को ही क्यों आती है?
उस समय यह प्रश्न केवल एक बाल जिज्ञासा था, किंतु जैसे-जैसे भारतीय संस्कृति, पंचांग और परंपराओं को समझने का अवसर मिला, यह जिज्ञासा एक गंभीर शोध-विषय में परिवर्तित होती गई। तभी यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय परंपराएँ केवल आस्था पर आधारित नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे गहन खगोलीय गणना और वैज्ञानिक दृष्टि है। मकर संक्रांति इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
मकर संक्रांति की तिथि स्थिर क्यों रहती है?
भारतीय पंचांग प्रणाली को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि हमारे पर्व मुख्यतः दो प्रकार की गणनाओं पर आधारित होते हैं :-
चंद्र आधारित और सूर्य आधारित।
1. चंद्र आधारित पर्व (Lunar Calendar)
अधिकांश हिंदू पर्व चंद्रमा की गति और उसकी कलाओं (तिथियों) पर आधारित होते हैं। चंद्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा लगभग 29.5 दिनों में पूरी करता है। इस कारण अमावस्या, पूर्णिमा, होली, दीपावली, नवरात्र, रामनवमी जैसे पर्व हर वर्ष 10–11 दिन आगे-पीछे हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, जबकि सौर वर्ष 365 दिन का होता है।
2. सूर्य आधारित पर्व (Solar Calendar)
इसके विपरीत मकर संक्रांति सूर्य की गति पर आधारित पर्व है। यह पर्व उस क्षण को दर्शाता है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इस राशि परिवर्तन को ही संक्रांति कहा जाता है। सूर्य की यह खगोलीय स्थिति अत्यंत नियमित और गणनात्मक होती है।
सूर्य को एक राशि पार करने में लगभग 30.4 दिन लगते हैं और पूरे बारह राशियों का चक्र लगभग 365.24 दिनों में पूरा होता है। इसी कारण सूर्य का मकर राशि में प्रवेश लगभग हर वर्ष 14 जनवरी को ही होता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति होली–दीपावली की तरह तिथियों में भटकती नहीं, बल्कि लगभग स्थिर बनी रहती है।
कभी 15 जनवरी क्यों? : अयनांश (Ayanamsa) का प्रभाव
यह प्रश्न भी स्वाभाविक है कि कभी-कभी मकर संक्रांति 15 जनवरी को क्यों दिखाई देती है। इसका कारण पृथ्वी की धुरी (Axis) का पूरी तरह स्थिर न होना है। इस सूक्ष्म खगोलीय परिवर्तन को अयनांश (Ayanamsa) कहा जाता है। इसके कारण सैकड़ों वर्षों में संक्रांति की तिथि 13 से 14 और फिर 15 जनवरी की ओर खिसकती रही है।
यह परिवर्तन अत्यंत धीमा होता है और सामान्य जीवन में लगभग स्थिर ही प्रतीत होता है। प्राचीन भारतीय खगोलविद जैसे आर्यभट्ट और वराहमिहिर इन सूक्ष्म परिवर्तनों से परिचित थे और इसी कारण पंचांगों में समय-समय पर सुधार किए जाते रहे। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि भारतीय परंपराएँ अंधविश्वास नहीं, बल्कि गणना और अनुभव पर आधारित हैं।
उत्तरायण:
मकर संक्रांति के साथ ही उत्तरायण का आरंभ होता है। सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर गति करने लगता है, दिन बड़े होने लगते हैं और शीत ऋतु धीरे-धीरे विदा लेने लगती है। यह केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा का प्रतीक है। महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण में देह-त्याग का प्रसंग इस पर्व को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है। भारतीय दर्शन में उत्तरायण को सकारात्मकता, ज्ञान और मोक्ष की दिशा माना गया है।

छत्तीसगढ़ में मकर संक्रांति : लोकजीवन का पर्व
छत्तीसगढ़ में मकर संक्रांति का स्वरूप अत्यंत लोकप्रधान और सामूहिक है। यहाँ यह पर्व किसी एक वर्ग या अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज इसमें सहभागी होता है। ग्रामीण अंचलों में इस दिन नई फसल के अन्न से भोजन बनाना, दान करना और सामूहिक भोज आयोजित करना एक सामान्य परंपरा है।

चावल, तिल, गुड़ और कोदो-कुटकी जैसे स्थानीय अन्नों का प्रयोग इस पर्व को छत्तीसगढ़ी पहचान प्रदान करता है। यह पर्व यहाँ कृषक श्रम के सम्मान का दिन माना जाता है।
छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में मकर संक्रांति का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह पर्व सामूहिकता और समानता को प्रोत्साहित करता है। इस दिन जाति, वर्ग या सामाजिक भेदभाव के बिना लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, भोजन ग्रहण करते हैं और आपसी संबंधों को मजबूत करते हैं।
दान, लोकाचार और सामाजिक समरसता
दक्षिण कोसल क्षेत्र में मकर संक्रांति के दिन दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है। गरीबों, वृद्धों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और तिल-गुड़ देना पुण्यकारी माना जाता है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ी समाज की करुणा और संवेदनशीलता को दर्शाती है। लोकाचारों में भी इस पर्व की गहरी छाप दिखाई देती है। कई स्थानों पर लोकगीत, पारंपरिक खेल और ग्रामीण मेलों का आयोजन होता है। ये आयोजन केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति को जीवित रखने के माध्यम हैं।

भारत के विभिन्न प्रदेशों में मकर संक्रांति : विविधता में एकता का उत्सव
मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक एकता का ऐसा पर्व है, जो भौगोलिक विविधताओं के बावजूद एक ही भाव को प्रकट करता है प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और नवचक्र का स्वागत। देश के विभिन्न प्रदेशों में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, किंतु उसका मूल स्वर एक ही रहता है।

तमिलनाडु में यह पर्व पोंगल के रूप में चार दिनों तक मनाया जाता है, जहाँ सूर्य, भूमि और पशुधन को धन्यवाद दिया जाता है। पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी के माध्यम से अग्नि के चारों ओर सामूहिक उत्सव होता है, जो कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा है। असम में इसे माघ बिहू कहा जाता है, जहाँ सामूहिक भोज और लोकनृत्य इसकी पहचान हैं। गुजरात में मकर संक्रांति उत्तरायण के रूप में पतंग महोत्सव का रूप ले लेती है, जो उत्साह और उमंग का प्रतीक है। महाराष्ट्र में तिलगुल बाँटकर सामाजिक सौहार्द और मधुरता का संदेश दिया जाता है।
इन सभी परंपराओं में स्पष्ट दिखाई देता है कि मकर संक्रांति भारत के लोकजीवन में केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि कृषि, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन का उत्सव है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का सेवन केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विज्ञान से भी जुड़ा है। शीत ऋतु में तिल शरीर को ऊर्जा देता है और गुड़ ऊष्मा प्रदान करता है।
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिक आत्मा का उत्सव है। यह पर्व सिद्ध करता है कि हमारी परंपराएँ अनुभव, गणना और प्रकृति-बोध पर आधारित हैं। मेरी बचपन की वह छोटी-सी जिज्ञासा आज इस निष्कर्ष तक पहुँचती है कि मकर संक्रांति की तिथि की स्थिरता ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
यह हमें याद दिलाती है कि कुछ मूल्य, कुछ सिद्धांत और कुछ परंपराएँ समय के साथ नहीं बदलतीं। दक्षिण कोसल सहित सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रांति हमारी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने वाला एक स्थायी दीप है।
लेख:
श्री विकास जायसवाल
दुर्ग, छत्तीसगढ़
मकर संक्रांति: छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) की लोक-संस्कृति, खगोलीय विज्ञान और एक बचपन की जिज्ञासा
January 12, 2026