आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

मकर संक्रांति- सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व

मकर संक्रांति- सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का एक अनूठा त्योहार है जो तिथि के बजाय सूर्य की खगोलीय स्थिति पर आधारित है। यह पर्व तब मनाया जाता है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह पावन पर्व प्रतिवर्ष जनवरी को मनाया जाता है। हर 80 वर्षों में सूर्य भ्रमण के कारण होने वाले अंतर की पूर्ति के लिए संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ़ जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, संक्रांति को देवता माना गया है जिन्होंने संकरासुर दानव का वध किया था। अगले दिन को किंक्रांति कहा जाता है, जब देवी ने किंकरासुर नामक राक्षस का वध किया था।

मकर संक्रांति- तिल-गुड़ और पतंग उड़ाने का त्यौहार 
मकर संक्रांति- तिल-गुड़ और पतंग उड़ाने का त्यौहार 

मकर संक्रांति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरे भारत में यह अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। तमिलनाडु में 'पोंगल', गुजरात और उत्तराखंड में 'उत्तरायण', पंजाब और हरियाणा में 'माघी' या 'लोहड़ी', असम में 'भोगाली बिहु', उत्तर प्रदेश में 'खिचड़ी', पश्चिम बंगाल में 'पौष संक्रांति', छत्तीसगढ़ में छेरछेरा और कर्नाटक में 'मकर संक्रमण' के नाम से यह पर्व मनाया जाता है। यह विविधता में एकता का प्रमाण है कि भाषा और भौगोलिक सीमाएं भले ही अलग हों, लेकिन संस्कृति का धागा पूरे देश को एक सूत्र में पिरोता है।

आध्यात्म और ज्योतिष की दृष्टि से भी मकर संक्रांति का बहुत महत्त्व है । मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं, जो देवताओं का दिन माना जाता है। इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं, क्योंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं। महाभारत में भीष्म पितामह ने इसी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा में 58 दिनों तक बाणों की शैय्या पर लेटे-लेटे काटे और अपनी इच्छा मृत्यु के लिए इस दिन को चुना।

भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन  त्यागी थी अपनी देह
भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन  त्यागी थी अपनी देह

उत्तरायण में मृत्यु पाने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए इस काल को अत्यंत शुभ माना जाता है जबकि दक्षिणायन में मृत्यु होने पर यम लोक जाने की संभावना अधिक रहती है इसीलिए सामान्यतः हर घर में दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करना, पढ़ाई करना या कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित है यही छोटी-छोटी बातें जो हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी हुईं है हमारी पारंपरिक ज्ञान परंपरा की साक्ष्य हैं।

सूर्य का उत्तरायण होना शुभ फलदायी होता है 
सूर्य का उत्तरायण होना शुभ फलदायी होता है 

मकर संक्रांति से रथसप्तमी तक का पर्वकाल विशेष फलदायी होता है। इस अवधि में किया गया दान और धार्मिक कृत्य सौ गुना फल देता है। इस दिन नए बर्तन, वस्त्र, अन्न, तिल, गुड़, गाय, स्वर्ण या भूमि का यथाशक्ति दान करना चाहिए। मकर संक्रांति पर्व की एक और बहुप्रचलित परंपरा है और वह है “पतंग उड़ाना”। इसे आनंद, विजय और उन्नति के प्रतीक स्वरुप देखा जाता है।

इसकी पौराणिक मान्यतानुसार इस दिन प्रभुराम ने भी पतंग उड़ाई थी और इन्द्रलोक तक पहुँच गए थे इसमें जीवन दर्शन भी निहित है कि जीवन में चाहे आप कितनी ही ऊंचाइयों पर पहुँच जायें आपकी इन्द्रियों पर सदैव आपका नियंत्रण होना चाहिए और कभी अपनी उपलब्धियों पर अभिमान नहीं करना चाहिए अन्यथा जैसे पतंग कट कर नीचे गिर जाती है उसी प्रकार आप भी जीवन में कभी भी अधोगति की ओर जा सकते हैं। आज इस प्रथा का प्रचलन इतना अधिक बढ़ गया है कि प्रतिवर्ष गुजरात में इंटरनेशनल काईट फैस्टिवल का आयोजन किया जाता है।

मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने का होता है विशेष उत्साह 
मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने का होता है विशेष उत्साह 

सुहागिनें इस दिन हल्दी-कुमकुम का 'उपायन' देती हैं, जो तन, मन और धन से दूसरे में विद्यमान देवत्व की शरण जाने में का प्रतीक है। आजकल प्लास्टिक और स्टील के बर्तन देने की प्रथा चल पड़ी है, लेकिन सात्त्विक वस्तुएं जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ, अगरबत्ती, कर्पूर या उबटन देना अधिक श्रेयस्कर है।

इस दिन तीर्थ स्नान और तिल का महत्व का विशेष महत्त्व होता है । मकर संक्रांति के दिन गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों में स्नान करना महापुण्य का कारण बनता है। मान्यता है कि इस दिन से गंगाजी का सागर में मिलना आरम्भ हुआ क्योंकि इसी दिन गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में मिली थीं।

तिल में सात्त्विक तरंगें ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता होती है। इस दिन तिल का तेल लगाना, तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल का सेवन, तिल होम और तिल दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। सर्दी के मौसम में तिल का सेवन स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है । तिल के सेवन से शरीर में आन्तरिक ऊष्मा बढ़ती है और उसकी मालिश से त्वचा में सर्दी से आया रूखापन दूर होता है।

तिल का तेल है विशेष गुणकारी
तिल का तेल है विशेष गुणकारी

इस दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक वातावरण अत्यधिक चैतन्यमय होता है। ब्रह्मांड की चंद्रनाड़ी (इड़ा) सक्रिय रहती है, जिससे रज-सत्त्व तरंगों की मात्रा बढ़ती है। साधना करने वालों के लिए यह काल अत्यंत अनुकूल होता है। ऋषि-मुनियों ने ग्रहों की गति और उनके प्रभाव को समझकर धर्माचरण की ऐसी व्यवस्था बनाई जिससे सभी को लाभ मिले।


नाड़ी विज्ञान की मानव जीवन में है विशेष भूमिका

यह पर्व केवल भारत तक सीमित नहीं है विश्वभर में भी मकर संक्रांति के पर्व को लेकर लोगों में बहुत उत्साह रहता है । बांग्लादेश में 'शंक्रेन', नेपाल में 'माघे संक्रांति', थाईलैंड में 'सॉन्कर्ण', म्यानमार में 'थिनज्ञान', श्रीलंका में 'उजाहवर थिरुनल' और कंबोडिया में 'मोहा संगक्रान' के नाम से यह त्यौहार मनाया जाता है। यह भारतीय संस्कृति के विश्वव्यापी प्रभाव का प्रमाण है।

वर्तमान में काले वस्त्र पहनने की प्रथा देखी जाती है, लेकिन हिंदू धर्मशास्त्र में काला रंग तमोगुणी माना जाता है। इसलिए इस शुभ दिन काले वस्त्र से बचना चाहिए। मकर संक्रांति का सार यही है कि यह दिन आपसी कलह भुलाकर प्रेम बढ़ाने का है। तिलगुड़ के साथ "तिल-गुड़ घ्या, गोड़ गोड़ बोला" (तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो) की परंपरा इसी भावना को दर्शाती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अंधकार के बाद प्रकाश का आगमन निश्चित है और सामूहिक उत्सव ही जीवन की वास्तविक खुशी है।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

Follow us on social media and share!