धूलपंचमी को मेला के अवसर पर पीथमपुर के कालेश्वरनाथ
March 08, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

छत्तीसगढ़ में देवियां ग्रामदेवी और कुलदेवी के रूप में पूजित हुई। विभिन्न स्थानों में देवियां या तो समलेश्वरी या महामाया देवी के रूप में प्रतिष्ठित होकर पूजित हो रही हैं। राजा-महाराजा, जमींदार और मालगुजार भी शक्ति उपासक हुआ करते थे। वे अपनी राजधानी में देवियों को ‘‘कुलदेवी’’ के रूप में स्थापित किये हैं। देवियों को अन्य राजाओं से मित्रता के प्रतीक के रूप में भी अपने राज्य में प्रतिष्ठित करने का उल्लेख तत्कालीन साहित्य में मिलता है।
यहां देवियों की अनेक चमत्कारी किंवदंतियां प्रचलित हैं। ..चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है। नवरात्रि में देवियों की कृपा प्राप्त करने के लिए देवि दर्शन की जाती हैं। ग्रामीणजनों में देवियों की प्रसन्न करने के लिए ‘‘बलि’’’ दिये जाने और मातासेवा गीत गाकर किये जाने की परंपरा है। उड़ियान राज से जुड़े चंद्रपुर में चंद्रसेनी माता के दरबार में ग्रामीणजनों द्वारा बलि देकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की बढ़ती भीढ़ बढ़ती जा रही है और देवी स्थल शक्तिपीठ के रूप में विकसित होते जा रहे हैं।
रतनपुर की महामाया:-
दक्षिण-पूर्वी रेल्वे के बिलासपुर जंक्शन और जिला मुख्यालय से लगभग 22 कि.मी. की दूरी पर महामाया की नगरी रतनपुर स्थित है। यह हैहहवंशी कलचुरी राजाओं की विख्यात् राजधानी रही है। इस वंश के राजा रत्नदेव ने महामाया के निर्देश पर ही रत्नपुर नगर बसाकर महामाया देवी की कृपा से दक्षिण कोसल पर निष्कंटक राज किया। उनके अधीन जितने राजा, जमींदार और मालगुजार रहे, सबने अपनी राजधानी में महामाया देवी की स्थापना की और उन्हें अपनी कुलदेवी मानकर उनकी अधीनता स्वीकार की। उनकी कृपा से अपने कुल-परिवार, राज्य में सुख शांति और वैभव की वृद्धि कर सके।
पौराणिक काल से लेकर आज तक रतनपुर में महामाया देवी की सत्ता स्वीकार की जाती रही है। राजा रत्नदेव भटकते हुए जब यहां के घनघोर वन में आये और सांझ होनें के कारण एक पेड़ पर चढ़कर रात्रि गुजारी। पेड़ की डगाल को पकड़कर सोते रहे। अचानक अर्द्धरात्रि में पेड़ के नीचे देवी महामाया की सभा लगी दिखाई दी। उनके निर्देश पर ही उन्होंने यहां अपनी राजधानी स्थापित थी। यही देवी आज जन आस्था का केंद्र बनी हुई है। मंत्र शक्ति से परिपूर्ण दैवीय कण यहां के वायुमंडल में बिखरे हैं जो किसी भी उद्दीग्न व्यक्ति को शांत करने के लिए पर्याप्त हैं। यहां के भग्नावशेष हैहहवंशी कलचुरी राजवंश की गाथा सुनाने के लिए पर्याप्त है। महामाया देवी और बूढ़ेश्वर महादेव की कृपा यहां के लिए कवच बना हुआ है। पंडित गोपालचंद्र ब्रह्मचारी भी यही गाते हैं:-
रक्षको भैरवो याम्यां देवो भीषण शासनः
तत्वार्थिभिःसमासेव्यः पूर्वे बृद्धेश्वरः शिवः।।
नराणां ज्ञान जननी महामाया तु नैर्ऋतै
पुरतो भ्रातृ संयुक्तो राम सीता समन्वितः।।
देवी महामाया मंदिर ट्रस्ट बनाकर अराधकों द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया है। दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए धर्मशाला, यज्ञशाला, भोगशाला और अस्पताल आदि की व्यवस्था की गयी है। नवरात्र में श्रद्धालुओं की भीड़ ‘‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है…’’ का गायन करती चली आती है।
सरगुजा की महामाया और समलेश्वरी देवी:-
वनांचल प्रांत झारखंड की सीमा से लगा छत्तीसगढ़ का वनवासी बाहुल्य वनाच्छादित जिला मुख्यालय अम्बिकापुर चारों ओर से सड़क मार्ग और अनुपपुर से विश्रामपुर तक रेल्वे लाईन से जुड़ा पूर्व फ्यूडेटरी स्टेट्स है। यहां की पवित्र पहाड़ी पर महाकवि कालिदास का आश्रम था। विश्व की प्राचीनतम् नाट्यशाला भी यहां की रामगढ़ पहाड़ी में स्थित है। त्रेतायुग में श्रीराम और लक्ष्मण लंका जाते देवियों की इस भूमि को प्रणाम करने यहां आये थे।
अम्बिकापुर में आज भी महामाया और समलेश्वरी देवी एक साथ विराजित हैं। तभी तो छत्तीसगढ़ गौरव के कवि पंडित शुकलाल पांडेय गाते हैं:-
यदि लखना चाहते स्वच्छ गंभीर नीर को
क्यों सिधारते नहीं भातृवर ! जांजगीर को ?
काला होना हो पसंद रंग तज निज गोरा
चले जाइये निज झोरा लेकर कटघोरा
दधिकांदो उत्सव देखना हो तो दुरूग सिधारिये
लखना हो शक्ति उपासना तो चले सिरगुजा जाईये।।
कवि की बातों में सच्चाई है तभी तो सरगुजा आज अद्वितीय शक्ति उपासना का केंद्र है। छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि सुदूर उड़ीसा के संबलपुर तक समलेश्वरी देवी, रतनपुर में महामाया देवी और चंद्रपुर में चंद्रसेनी देवी सरगुजा की भूमि से ही ले जायी गयी। मराठा शासकों के सैनिक और सामंतों द्वारा महामाया को नहीं ले सकने पर उसके सिर को काटकर रतनपुर ले आये लेकिन आगे नहीं ले जा सके और रतनपुर में ही प्रतिष्ठित कर दिये।
चंद्रपुर की चंद्रसेनी देवी:-
महानदी और मांड नदी से घिरा चंद्रपुर, जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत रायगढ़ से लगभग 32 कि.मी., सारंगढ़ से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां चंद्रसेनी देवी का वास है। किंवदंति है कि चंद्रसेनी देवी सरगुजा की भूमि को छोड़कर उदयपुर और रायगढ़ होते हुये चंद्रपुर में महानदी के तट पर आ जाती हैं। महानदी की पवित्र शीतल धारा से प्रभावित होकर यहां पर वह विश्राम करने लगती हैं। वर्षों व्यतीत हो जाने पर भी उनकी नींद नहीं खुलती। एक बार संबलपुर के राजा की सवारी यहां से गुजरी और अनजाने में चंद्रसेनी देवी को उनका पैर लग जाता है और उनकी नींद खुल जाती है। फिर स्वप्न में देवी उन्हें यहां मंदिर निर्माण और मूर्ति स्थापना का निर्देश देती हैं।
संबलपुर के राजा चंद्रहास द्वारा मंदिर निर्माण और देवी स्थापना का उल्लेख मिलता है। देवी की आकृति चंद्रहास जैसे होने के कारण उन्हें ‘‘चंद्रहासिनी देवी’’ भी कहा जाता है। इस मंदिर की व्यवस्था का भार उन्होंने यहां के जमींदार को सौंप दिया। यहां के जमींदार ने उन्हें अपनी कुलदेवी स्वीकार करके पूजा अर्चना करने लगा। आज पहाड़ी के चारों ओर अनेक धार्मिक प्रसंगों, देवी-देवताओं, वीर बजरंग बली और अर्द्धनारीश्वर की आदमकद प्रतिमा, सर्वधर्म सभा और चारों धाम की आकर्षक झांकी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है। कवि तुलाराम गाोपाल की एक बानगी पेश है:-
खड़ी पहाड़ी की सर्वोच्च शिला आसन पर
तुम्हें देख बराह रूप में चंद्राकृति पर
जब मन ही में प्रश्न किया सरगुजहीन बाली
महानदी की बीच धार की धरती डोली।
बस्तर की दंतेश्वरी देवी:-
विशाल भूभाग में फैले बस्तर को यदि देवी-देवताओं की भूमि कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां के हर गांव के अपने देवी-देवता हैं। हर गोव में ‘‘देव गुड़ी’’ होती है, जहां किसी न किसी देवी-देवता का निवास होता है। लकड़ी की पालकी में सिंदूर से सने और रंग बिरंगी फूलों की माला से सजे विभिन्न आकृतियों वाली आकर्षक मूर्तियां प्रत्येक देव गुड़ी में देखने को मिल जायेगी। ये यहां के गांवों के आस्था के केंद्र हैं। सम्पूर्ण बस्तर की अधिष्ठात्री दंतेश्वरी देवी हैं जो यहां के काकतीय वंशीय राजाओं की कुलदेवी है। इन्हें शक्ति का प्रतीक माना जाता है और शंखिनी डंकनी नदी के बीच में दंतेश्वरी देवी का भव्य मंदिर है। भारत के शक्तिपीठों में एक दंतेवाड़ा में शक्ति का दांत गिरने के कारण यहां की देवी दंतेश्वरी देवी के नाम से प्रतिष्ठित हुई, ऐसा विश्वास किया जाता है। देवी के नाम पर दंतेवाड़ा नगर बसायी गयी जो आज दंतेवाड़ा जिला का मुख्यालय है।
बस्तर के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दृष्टिपात करने से पता चलता है कि राजा प्रताप रूद्रदेव के साथ दंतेश्वरी देवी आंध्र प्रदेश के वारंगल राज्य से यहां आयी। मुगलों से परास्त होकर राजा प्रताप रूद्रदेव वारंगल को छोड़कर इधर उधर भटकने लगे। देवी अराधक तो वे थे ही, वे उन्हीं के शरण में गये। तब देवी मां का निर्देश हुआ कि ‘‘ मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन घोड़े पर सवार होकर तुम अपनी विजय यात्रा आरंभ करो, जहां तक तुम्हारी विजय यात्रा होगी वहां तक तुम्हारा एकछत्र राज्य होगा…।’’ राजा के निवेदन पर देवी मां उनके साथ चलना स्वीकार कर ली। लेकिन शर्त थी कि राजा पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। अगर राजा पीछे मुड़कर देखेंगे, तब देवी मां आगे नहीं बढ़ेंगी। राजा को उनके पैर की घुंघरूओं की आवाज से उनके साथ चलने का आभास होता रहेगा। राजा प्रताप रूद्र्र्रदेव ने विजय यात्रा आरंभ की और देवी मां उनकी विजय यात्रा के साथ चलने लगी। जब राजा की सवारी शंखिनी डंकनी नदी को पार करने लगी तब देवी मां के पैर की घुंघरू सुनायी नहीं देता है तब राजा पीछे मुड़कर देखने लगे जिससे देवी आगे बढ़ने से इंकार कर दी और वहीं प्रतिष्ठित हुई। बाद में राजा ने उनके लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया और उनके नाम पर दंतेवाड़ा नगर बसायी। बस्तर में कोई भी पूजा-अर्चना और त्योहार दंतेश्वरी देवी की पूजा के बिना पूरा नहीं होता। दशहरा के दिन यहां रावण नहीं मरता बल्कि दंतेश्वरी देवी की भव्य शोभायात्रा निकलती है जिसमें बस्तर के सभी देवी-देवता शामिल होते हैं। नवरात्र में बस्तर का राजा दंतेश्वरी देवी के प्रथम पुजारी के रूप में नौ दिन मंदिर में निवास करके पूजा-अर्चना करते थे। इसी प्रकार खैरागढ़ में दंतेश्वरी देवी की काष्ठ प्रतिमा स्थापित है जो खैरागढ़ राज परिवार की कुलदेवी है।
डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी:-
राजनांदगांव जिलान्तर्गत 25 कि.मी पर स्थित दक्षिण-पूर्वी रेल्वे के डोंगरगढ़ स्टेशन में ट्रेन से उतरते ही सुन्दर पहाड़ी उसमें छोटी छोटी सीढ़ियां और उसके उपर बमलेश्वरी देवी का भव्य मंदिर का दर्शन कर मन प्रफुल्लित हो श्रद्धा से भर उठता है। प्राचीन काल में यह कामावती नगर के नाम से विख्यात् था। यहां के राजा कामसेन बड़े प्रतापी और संगीत कला के प्रेमी थे। राजा कामसेन के उपर बमलेश्वरी माता की विशेष कृपा थी। उन्हीं की कृपा से वे सवा मन सोना प्रतिदिन दान किया करते थे। उनके राज दरबार में कामकंदला नाम की अति सुन्दर राज नर्तकी थी। कामकंदला वास्तव में एक अप्सरा थी जो शाप के कारण पृथ्वी में अवतरित हुई थी। राजनर्तकी को यहां कुंवारी रहना पड़ता था। इस राज दरबार में माधवानल जैसे कला और संगीतकार भी थे। एक बार राजदरबार में दोनों का अनोखा समन्वय देखने को मिला और राजा कामसेन उनकी संगीत साधना से इतने प्रभावित हुए कि वे माधवानल को अपने गले का हार दे दिये। मगर माधवानल ने इसका श्रेय कामकंदला को देते हुए उस हार को उसे पहना देता है। इससे राजा अपने को अपमानित महसूस किये और गुस्से में आकर माधवानल को देश निकाला दे दिया। इधर कामकंदला उनसे छिप छिपकर मिलती रही। दोनों एक दूसरे को प्रेम करने लगे थे लेकिन राजा के भय से सामने नहीं आ सकते थे। फिर उन्होंने उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की शरण में गया और उनका मन जीतकर उनसे पुरस्कार में कामकंदला को राजा कामसेन से मुक्त कराने की बात कही। राजा विक्रमादित्य ने दोनों के प्रेम की परीक्षा ली और दोनों को खरा पाकर कामकंदला की मुक्ति के लिए पहले राजा कामसेन के पास संदेश भिजवाया। उसने कामकंदला को मुक्त करने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप दोनों के बीच घमासान युद्ध होने लगा। दोनों वीर योद्धा थे और एक महाकाल के भक्त थे तो दूसरा विमला माता के भक्त। दोनों अपने अपने इष्टदेव का आव्हान करते हैं। तब एक तरफ महाकाल और दूसरी ओर भगवती विमला मां अपने अपने भक्त को सहायता करने पहुंचे। फिर महाकाल विमला माता से राजा विक्रमादित्य को क्षमा करने की बात कहकर कामकंदला और माधवानल को मिला देते हैं और दोनों अंतध्र्यान हो जाते हैं। बाद में राजा कामसेन की नगरी काल के गर्त में समा जाती है। वही आज बमलेश्वरी देवी के रूप में छत्तीसगढ़ वासियों की अधिष्ठात्री है। अतीत के अनेक तथ्यों को अपने गर्भ में समेटे बमलेश्वरी पहाड़ी अविचल खड़ा है। यह अनादिकाल से जग जननी मां बमलेश्वरी देवी की सर्वोच्च शाश्वत शक्ति का साक्षी है। लगभग एक हजार सीढ़ियों को चढ़कर माता के दरबार में पहुंचने पर जैसे सारी थकान दूर हो जाती है, मन श्रद्धा से भर उठकर गा उठता है:-
तेरी होवे जै जैकार, नमन करूं मां करो स्वीकार।
तेरी महिमा अनुपम न्यारी जग में सबसे बलिहारी है।
तू ही अम्बे, तू ही दुर्गा, बमलेश्वरी तेरी सिंह की सवारी।
नैया सबकी पार लगे मां तरी जै जैकार…..।
इसी प्रकार रायगढ़, सारंगढ़, उदयपुर, चांपा में समलेश्वरी देवी, कोरबा जमींदारी में सर्वमंगला देवी, जशपुर रियासत में चतुर्भुजी काली माता, अड़भार में अष्टभुजी देवी, झलमला में गंगामैया, केरा, पामगढ़ और दुर्ग और कुरूद में चंडी दाई, खरौद में सौराईन दाई, शिवरीनारायण में अन्नपूर्णा माता, मल्हार में डिडनेश्वरी देवी, रायपुर में बिलासपुर रोड में तथा पंडित रविशंकर शुक्ला विश्वविद्यालय के पीछे बंजारी देवी का भव्य मंदिर है। छुरी की पहाड़ी में कोसगई देवी, बलौदा के पास खम्भेश्वरी देवी की भव्य प्रतिमा पहाड़ी में स्थित हैं। नवरात्र में यहां दर्शनार्थियों की अपार भीड़ होती है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
आलेख
प्रो (डॉ) अश्विनी केसरवानी, चांपा, छत्तीसगढ़
धूलपंचमी को मेला के अवसर पर पीथमपुर के कालेश्वरनाथ
March 08, 2026
छत्तीसगढ़ में संक्रांति पूजा
January 14, 2026
18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
December 16, 2025
पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान
November 26, 2025
संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत
October 19, 2025
छत्तीसगढ़ में दशहरा की अद्भूत परम्परा
October 02, 2025
धर्म एवं आस्था का केन्द्र माँ बमलेश्वरी
September 27, 2025
ऐश्वर्य की महादेवी महानदी
July 04, 2025
शक्ति रुपेण संस्थिता : छत्तीसगढ़ की देवियां
April 12, 2024
धर्म एवं आस्था का केन्द्र माँ बमलेश्वरी
April 11, 2024
पीथमपुर धूल पंचमी मेले में शिव बारात
March 30, 2024
आध्यात्म और पर्यटन का संगम गिरौदपुरी का मेला
March 19, 2024
खेलत अवधपुरी में फाग, रघुवर जनक लली
March 15, 2024
छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को समेटने वाले ठाकुर जगमोहन सिंह
March 11, 2024
लखनेश्वर दर्शन करि कंचन होत शरीर : शिवरात्रि विशेष
March 08, 2024
शिवरीनारायण का माघी मेला
February 22, 2024
राम से बड़ा राम का नाम
January 30, 2024
जहाँ श्रीराम जानकी मंदिर में रावण का पहरा है
January 20, 2024
मकर संक्रांति पर्व का महत्व एवं गंगा सागर स्नान दर्शन
January 14, 2024
छत्तीसगढ़ के गौरव पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय
January 04, 2024
छत्तीसगढ़ के प्रकाशमान संत बाबा गुरु घासीदास
December 18, 2023
पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान
November 30, 2023
ऐश्वर्य की महादेवी महानदी
November 06, 2023
छत्तीसगढ़ का लोक उत्सव दशहरा
October 24, 2023
छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्ति स्थल
October 17, 2023
छत्तीसगढ़ में रामानंद सम्प्रदाय के मठ एवं महंत
October 09, 2023
प्रतिभाशाली मुकुट काव्य के मुकुट मनोहर
September 30, 2023
राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ का गणेशोत्सव
September 19, 2023
कुशल प्रशासक, शिक्षाशास्त्री और साहित्यकार बल्देवप्रसाद मिश्र
September 12, 2023
छत्तीसगढ़ी का व्याकरण रचने वाले काव्योपाध्याय हीरालाल
September 11, 2023
छत्तीसगढ़ में रासलीला और श्रीकृष्ण के लोक स्वरूप
September 07, 2023
लंका पर चढ़ाई करने के लिए श्री रामचंद्र जी ने इस दिन को चुना
August 30, 2023
महर महर करे भोजली के राउर : भोजली तिहार
August 30, 2023
स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी : छत्तीसगढ़
August 15, 2023
चित्रोत्पला गंगा की सांस्कृतिक विरासत
July 27, 2023
वर्षा ॠतु में छत्तीसगढ़ी लोक जीवन की उमंग
July 13, 2023
छत्तीसगढ़ की नाट्य परंपरा
May 25, 2023
नदियाँ और उनका सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व : संदर्भ छत्तीसगढ़
May 19, 2023
ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर
June 14, 2026
राम : मर्यादा, करुणा, और आदर्श के शाश्वत प्रतीक
June 13, 2026
राष्ट्रीय सीमाओं में सिसकती संवेदनाएँ
June 12, 2026
वैश्विक महासंकट और भारतीय ऋषि परम्परा के समाधान
June 11, 2026
छत्तीसगढ़ परिचय: डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी की अद्वितीय कृति
June 10, 2026
मध्यप्रदेश के तीज त्यौहारों के विविध रंग
June 08, 2026
धरती आबा बिरसा मुंडा: जनजातीय अस्मिता और स्वाधीनता के अमर पुरोधा
June 08, 2026
आठिचूड़ी: तमिल सन्त अव्वैयार के नीति सूत्र और उनका जीवन दर्शन
June 07, 2026
मेवाड़ की गवरी में नरसिंह का प्राचीन स्वरूप
June 06, 2026
रामचरितमानस में पर्यावरणीय संरक्षण : वैदिक ज्ञान और रामराज्य का अद्भुत सन्देश
June 05, 2026
मौन का विसर्जन: हेमचन्द्र विक्रमादित्य और २२ विजयों का विस्मृत इतिहास
June 04, 2026
छिन्दवाड़ा का ऐतिहासिक गौरव: देवगढ़
June 03, 2026
वनवासी राम
June 01, 2026
पुरुषोत्तम मास: भारतीय विज्ञान और अध्यात्म की समृद्ध परम्परा का संगम
June 01, 2026
कांचीपुरम का कैलाशनाथ मन्दिर: एक प्राचीन विश्वविद्यालय
May 31, 2026
जन्म तिथि विशेष: भारतीय संस्कृति और मूर्तिमान वीरता की प्रतीक- महारानी अहिल्याबाई होल्कर
May 31, 2026
मर्यादा पुरुषोत्तम: आदर्श जीवन का प्रतिमान
May 30, 2026
वनवास की पावन यात्रा
May 29, 2026
श्रीराम से पढ़िए नेतृत्व के पाठ
May 28, 2026
मल्हार और राम
May 27, 2026
ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर
June 14, 2026
राम : मर्यादा, करुणा, और आदर्श के शाश्वत प्रतीक
June 13, 2026
राष्ट्रीय सीमाओं में सिसकती संवेदनाएँ
June 12, 2026
वैश्विक महासंकट और भारतीय ऋषि परम्परा के समाधान
June 11, 2026
छत्तीसगढ़ परिचय: डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी की अद्वितीय कृति
June 10, 2026
मध्यप्रदेश के तीज त्यौहारों के विविध रंग
June 08, 2026
धरती आबा बिरसा मुंडा: जनजातीय अस्मिता और स्वाधीनता के अमर पुरोधा
June 08, 2026
आठिचूड़ी: तमिल सन्त अव्वैयार के नीति सूत्र और उनका जीवन दर्शन
June 07, 2026
मेवाड़ की गवरी में नरसिंह का प्राचीन स्वरूप
June 06, 2026
रामचरितमानस में पर्यावरणीय संरक्षण : वैदिक ज्ञान और रामराज्य का अद्भुत सन्देश
June 05, 2026
मौन का विसर्जन: हेमचन्द्र विक्रमादित्य और २२ विजयों का विस्मृत इतिहास
June 04, 2026
छिन्दवाड़ा का ऐतिहासिक गौरव: देवगढ़
June 03, 2026
वनवासी राम
June 01, 2026
पुरुषोत्तम मास: भारतीय विज्ञान और अध्यात्म की समृद्ध परम्परा का संगम
June 01, 2026
कांचीपुरम का कैलाशनाथ मन्दिर: एक प्राचीन विश्वविद्यालय
May 31, 2026
जन्म तिथि विशेष: भारतीय संस्कृति और मूर्तिमान वीरता की प्रतीक- महारानी अहिल्याबाई होल्कर
May 31, 2026
मर्यादा पुरुषोत्तम: आदर्श जीवन का प्रतिमान
May 30, 2026
वनवास की पावन यात्रा
May 29, 2026
श्रीराम से पढ़िए नेतृत्व के पाठ
May 28, 2026
मल्हार और राम
May 27, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
वह धरती, जहाँ आज भी हैं श्री राम के पदचिह्न
April 17, 2026