स्वतन्त्र भारत के निर्माण में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका
July 06, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

सद्गुरु कबीर एक विश्वविख्यात युग-दृष्टा संत हैं, जिनका स्थान भारतीय संत परंपरा में अद्वितीय है।। उनका जीवन और दर्शन इतना महनीय है कि उन पर जितना भी लिखा जाए, वह कम ही होगा। सद्गुरु कबीर को 'बंदीछोर पारखबोध-प्रकाशी' के रूप में बिरले ही पहचान पाए हैं। उनका सत्य उपदेश मूल 'बीजक' के रूप में संकलित है और यह सद्गुरु कबीर साहेब का मुख्य ग्रंथ माना जाता है। भारत और पूरे विश्व में संत कबीर को मानने वाले अनेक पंथ और संप्रदायों के लोग हैं, जो उनके विचारों को आत्मसात कर अपने जीवन को कल्याण के मार्ग पर ले जाते हैं।
क्या कबीरदास जी ने कोई पंथ चलाया?
जब हम कबीर पंथ की बात करते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या कबीरदास जी ने अपने नाम पर कोई पंथ चलाया? जी नहीं, कबीर ने अपने नाम पर कोई पंथ नहीं चलाया। उनके महान शिष्यों और अनुयायियों जैसे श्री श्रुति गोपाल साहेब, जागु साहेब, श्री भगवान साहेब, धनी धर्मदास साहेब, तत्त्व और जीवा ने उनके ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए इसका प्रचार-प्रसार किया। यही आगे चलकर 'कबीर पंथ' के नाम से जाना गया।
कबीर चौरा मठ, काशी (त्याग गद्दी)
कबीर पंथ के इतिहास में सर्वप्रथम काशी के कबीर चौरा मठ की त्याग गद्दी का नाम आता है। इस गुरु प्रणाली में प्रथम गद्दी पर सर्वश्री श्रुति गोपाल साहेब (सर्वाजीत) आसीन हुए।

कबीर चौरा मठ, काशी
उनके पश्चात श्री ज्ञान साहेब, श्याम साहेब, लाल साहेब, हरिसुख साहेब, शीतल साहेब, सुखदास साहेब, हुलास साहेब, माधव साहेब, कोकिल साहेब, राम साहेब, महादास साहेब, हरिदास साहेब, शरण साहेब, पुरण साहेब, निर्मल साहेब, रंगी साहेब, गुरु प्रसाद साहेब, प्रेम साहेब, राम विलास साहेब और अमृत साहेब जैसे परम त्यागी संत कबीर चौरा मठ के उत्तराधिकारी हुए। इनकी शाखाएँ मुख्य रूप से लहरतारा, मगहर, बलुआ, गया, बड़ौदा, नडियाद और अहमदाबाद आदि में स्थित हैं।
धनौती और विदुपुर गद्दी
कबीर मठ, धनौती: श्री भगवान साहेब ने कबीर से गुरु दीक्षा लेकर ‘गुरुगमबूझ’ नामक एक बीजक टीका लिखी और कबीर की वाणी का प्रचार किया। धनौती की गुरु परंपरा में 21 गोस्वामी हुए, जिन्होंने कबीर के ज्ञान को देश-विदेश तक पहुँचाया।
कबीर मठ, बिदुपुर: श्री जागु साहेब का जन्म विक्रम संवत 1470 में ओडिशा (कटक) के तुलसिया ग्राम में हुआ था। उन्होंने जगन्नाथ में सद्गुरु कबीर साहेब से भेंट कर दीक्षा ली। इनकी गुरु परंपरा में मथुरा साहेब, गरभू साहेब, वल्लभ साहेब, शिरोमणि साहेब, धरणी साहेब आदि से लेकर रघुनाथ साहेब तक त्याग गद्दी की परंपरा चलती रही।

कबीर मठ, बिदुपुर
धनी धर्मदास साहेब: वंशगद्दी परंपरा
धर्मदास साहेब का जन्म मध्य प्रदेश के बाँधवगढ़ में एक कसौधन बनिया परिवार में हुआ था। तीर्थ यात्रा के दौरान मथुरा में उनकी भेंट कबीर साहेब से हुई और प्रभावित होकर उन्होंने बाँधवगढ़ में गुरु दीक्षा ली।
कबीर साहेब ने धर्मदास जी और उनकी पत्नी आमीन को पान-परवाना देकर उनके वंश को स्थापित किया। उनके बड़े पुत्र नारायण दास की गद्दी बाँधवगढ़ में चली, जो 9 पीढ़ियों के बाद प्रभावशाली नहीं रही। इसके बाद छोटे पुत्र चुरामणि ने कुदुरमाल में अपनी गद्दी की स्थापना की, जिसे वंश परंपरा (रक्त संबंध) का मुख्य केंद्र माना गया।

धर्मदास जी की वंशगद्दी परम्परा के 42 वंशों के नाम
गद्दी का खंडन और दामाखेड़ा आगमन:
11वें वंशगुरु धीरज नाम साहेब और 12वें वंशगुरु उग्र नाम साहेब के कालखंड में वैचारिक मतभेदों के कारण कवर्धा गद्दी का नियमित संचालन खंडित हुआ।

कबीर धर्म नगरी, दामाखेड़ा
उग्र नाम साहेब ने दामाखेड़ा में गद्दी स्थापित की। 14वें वंश में गद्दी रिक्त होने पर गुरुमाता कलाप देवी ने गृन्धमुनि नाम साहेब को विधिवत गोद लिया और उन्हें गद्दी पर आसीन किया। वर्तमान में दामाखेड़ा (कबीर धर्मनगर) में 16वें वंश गुरु उदित मुनि नाम साहेब गद्दी पर हैं।
श्री कबीर आश्रम, खरसिया गद्दी
छत्तीसगढ़ के खरसिया (बिलासपुर/रायगढ़ क्षेत्र) में दामाखेड़ा से हटकर विरक्त गद्दी की स्थापना हुई।

श्री कबीर धर्म स्थान, खरसिया गद्दी
खरसिया पीठ के गुरु संत श्री काशी साहेब अत्यंत विद्वान थे। यहाँ वर्तमान में आचार्य पंथ श्री हुजूर अर्धनाम साहेब जी सर्वोच्च गुरु पद पर आसीन हैं। खरसिया पीठ त्याग और वैराग्य परंपरा का निर्वहन करती है।

खरसिया पीठ के प्रमुख आचार्य
कबीर आश्रम नादिया,राजनांदगांव
नादिया गद्दी (नादवंशीय): राजनांदगांव जिले के नादिया ग्राम में विक्रम संवत 1837 में यह मठ स्थापित हुआ। वर्तमान में यहाँ श्री मंगल साहेब गद्दी पर आसीन हैं।

कबीर आश्रम नादिया
कबीर निर्णय मंदिर, बुरहानपुर: यह गद्दी त्याग और वैराग्य गुरु परंपरा पर आधारित है। सद्गुरु पूरण साहेब ने यहाँ बीजक टीका 'त्रिज्या', 'निर्णयसार' आदि ग्रंथ लिखे। दामाखेड़ा की तरह यहाँ रक्त-संबंधी वंशगद्दी नहीं चलती, बल्कि 'शिष्य परंपरा' का पालन होता है। वर्तमान में आचार्य महान साहेब जी के मार्गदर्शन में यहाँ 'पारख सिद्धांत' का अध्ययन कराया जाता है।

कबीर निर्णय मंदिर और आश्रम, बुरहानपुर
कबीर केवल कबीरपंथियों के नहीं हैं; वे सर्वधर्म से ऊपर जन-जन के नायक हैं। भारत में लगभग एक करोड़ कबीरपंथी हैं। आपस में मिलते समय वे तीन बार "साहेब बंदगी" कहकर अभिवादन करते हैं। कबीर जैसा महान पुरुष इस दुनिया में दूसरा नहीं हुआ, जिन्होंने डंके की चोट पर अंधविश्वास और पाखंड का मान-मर्दन किया। कबीर युग-दृष्टा हैं, सर्ववंदनीय हैं और एक महान पुरुष हैं।
लेखिका:
डॉ. पद्मा साहू 'पर्वणी', खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)
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