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महाराणा सांगा के सैन्य अभियान  और वागड का योगदान

महाराणा सांगा के सैन्य अभियान  और वागड का योगदान


इतिहास में राणा सांगा यानि महाराणा संग्राम सिंह  एक ऐसे शूरवीर योद्धा  और हिन्दू राष्ट्र  के स्वप्न दृष्टा रहे हैं जिनकी मिसाल  मेवाड तो क्या समूचे हिन्दुस्तान  में ढूंढे नहीं मिलती।  मध्यकाल में जब अधिकांश  राजा महाराजा  विदेशी आक्रामक से बचने के लिये या तो हाथ पांव मार रहे थे या उनके समक्ष घुटने टक्कर उनकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे।ऐसे प्रतिकूल  समय में भी मेवाड के महाराणा सांगा यानि संग्राम सिंह  हिन्दू साम्राज्य और मेवाड के विस्तार  के लिये  निरन्तर विदेशी आक्रान्त राज्यों पर आक्रमण का दुस्साहस  ही नहीं कर रहे थे अपितु की सुल्तानों को  हराकर ,बन्दी बनाकर उनसे कर तक वसूल करने में सफल रहे थे।

इस अदम्य साहसी योद्धा ने अपने जीवनकाल में खतौनी,बाडी(धौलपुर),गागरौन, मन्दसौर,ईडर ,बयाना सहित खानवा के अंतिम युद्ध तक  यही कोई  सौ  लडे जिनमें खानवा  के अंतिम युद्ध  के सिवा किसी में भी पराजय का मुंह नहीं देखा। हर युद्ध  में वह निरन्तर  विजयी रहे।इन युद्धों मे उनके शरीर पर अस्सी घाव लगे ।एक हाथ और एक पैर स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त  हुए तदुपरांत भी उन्होने राष्ट्र धर्म  हित अंतिम समय तक  युद्ध  का भाव नहीं छोड़ा। सांगा के इन सैन्य अभियानों में वागड़  सदैव उनके साथ रहा। वागड़ की भूमिका से पूर्व  वागड की पृष्ठभूमि  को भी जान लेना सुविधाजनक रहेगा।

मेवाड़ के महाराणा राणा सांगा
मेवाड़ के महाराणा राणा सांगा

गुजरात, मालवा और मेवाड से घिरा बांसवाड़ा, डूंगरपुर  तथा  आंशिक रूप से उदयपुर व प्रतापगढ   का क्षेत्र  वागड कहलाता है ।माही अनास ,सोम ,जाखम और चाप जैसी बारहमासी नदियों से सिंचित ,उपजाऊ,सघन वनों से आच्छादित  भू भाग अपने वन प्रांत(वन- वगडा) के कारण वागड के नाम से जाना जाता है। सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक  यहां मालवा के परमार शासकों का साम्राज्य  रहा। तत्पश्चात् गुजरात  के सिद्धराज जयसिंह  के आक्रमण  का शिकार  हुआ  और तेरहवीं शताब्दी में मेवाड के गुहिल वंशी सामंत सिंह ने यहां गुहिल वंश की स्थापना की।तब से वागड एक प्रकार  से मेवाड  का हिस्सा अथवा सहयोगी रहा तथा समय समय पर मेवाड के सैन्य  अभियानों में सक्रिय  सहभागी रहता रहा।

किन्तु विशेष रूप से मेवाड के महाप्रतापी महाराणा संग्राम  सिंह की रीति नीति केवल मेवाड की सुरक्षा की नहीं  थी। उनका सपना आसपास के विधर्मी और विदेशी शासकों पर आक्रमण  कर उन्हे अपने अधीन कर मेवाड का विस्तार  विशाल हिन्दू राष्ट्र  के निर्माण  के साथ ही पड़ौसी हिन्दू रियासतों की रक्षा करना भी रहा। जिस समय मेवाड में महाराणा सांगा का शासम था उसी काल में वागड यानि डूंगरपुर  में सामन्त सिंह की तेरहवीं पीढी के रावल गंगादास के पुत्र उदय सिंह का शासन था।अपने पिता गंगादास  जिन्होंने ईडर के भाण के विरूद्ध  राणा सांगा  का साथ दिया ,उन्हीं की भांति कुशल योद्धा  और युद्धप्रिय  उदय सिंह  भी अपने अंतिम समय तक सांगा के सैन्य  अभियान का हिस्सा बनकर वीरगति को प्राप्त  हुए। 

मेवाड़ के महाराणा राणा सांगा
वागड़ की ऐतिहासिक डूंगरपुर विरासत

इस श्रृंखला में उदय सिंह के कुंवर पदे में महाराणा रायमल के सहयोग में माण्डल गढ और खैराबाद  के युद्धों में  सम्मिलित रहे।इन युद्धों में मेवाड की विजय का उल्लेख  एकलिंग जी के दक्षिणी द्वार पर वि.सं 1531की लिखी प्रशस्ति के साथ ही रायमलरासो में मिलता है। तत्पश्चात् ईडर के राव भाण की मृत्यु हो जाने पर उसके अल्यवय उत्तराधिकारी रायल को हटाकर  उसके चाचा भीम के गद्दी हथिया लेनेपर रायमल ने  चित्तौड जाकर  सहायता मांगी।सांगा ने अपनी पुत्री का ब्याह रायमल से करवाया तथा  उसकी सहायता के लिये सेना भेजी।

इस युद्ध  में भाग लेने के लिये उन्होने माघ सुदी चतुर्थी,वि.सं.1570(3,जनवरी,1514)को एक पत्र महारावल  उदय सिंह  को लिखा।उदय सिंह  के सैन्य  इस युद्ध  में भाग लेने तथा भीम को बेदखल कर रायल को ईडर का राज्य दिलाने का उल्लेख  इतिहास ग्रंथों में मिलता है। हिजरी सन्920(वि.सं 1571,ई.सन्-1514)में गुजरात के सुल्तान  मुजफ्फर शाह द्वितीय  ने जब भारमल(भीम) के समर्थन  में अहमदनगर के किलेदार निजामुल मुल्क को सेनापति बनाकर भेजा जिसने रायमल को   हटाकर  भारमल को पुन:गद्दी पर बिठा दिया तब राणा सांगा ने क्रुद्ध  होकर ईडर पर आक्रमण किया जिसमे महारावल उदय सिंह  सैन्य  शामिल  हुआ।

ईडर के दुर्ग की विरासत
ईडर के दुर्ग की विरासत

निजामुद्दीन मुल्क भागकर अहमदनगर के दुर्ग  में छिप गया।सेना नें उसे वहां जा घेरा।इस युद्ध  में वागड के चौहान  डूंगरपुर सिंह  और उनके पुत्र  कान्ह सिंह  की बहादुरी और बलिदान का उल्लेख भी इतिहास  में मिलता है(इनकी कहानी पृथक से लेखक के सोशल मीडिया अकाउंट पर उपलब्ध है।)। यद्यपि इस अपमान  से क्रोध से पगलाये सुल्तान ने डूंगरपुर पर  आक्रमण  करदिया तथा महारावल  को बहुत  नुकसान  उठाना पडा किन्तु  रावल इसकी परवाह  करने वालों में से नही थे।

वि.सं 1583(ई.सन् 1526) में जब  इब्राहिम लोदी को हराकर  बादशाह  बना तब महाराणा ने हिन्दुस्तान राज्य की स्थापना के उद्देश्य  से उसपर आक्रमण  कर बाबर को पराजित किया।इस अभियान में भी महारावल  मेवाड की ओर से लडे। हि .सन्.13,जमादि युस्सानी933,(चैत्र सुदी14,वि.सं.1584,/17मार्च 1527) को एक बार पुन: महाराणा सांगा और बाबर की सेनाओं का आमना सामना बनाना के निकट खानवा के मैदान में हुआ।

खानवा के ऐतिहासिक युद्ध का दृश्य
खानवा के ऐतिहासिक युद्ध का दृश्य

इस युद्ध  में भी  सदा की भांति महारावल  उदयसिंह अपने छोटे पुत्र  और बांसवाडा राज्य के स्वामी जगमाल के साथ ससैन्य महाराणा की ओर से सम्मिलित  हुए।  कालचक्र कभी स्थिर नहीं रहता।हालात बदलते रहते हैं।समय का खेल,कुछ माह  पूर्व  ही बनाना में इसी बाबर को हराने वाले निन्यानवे युद्धों के विजेता महाराणा सांगा नियति के हाथों का शिकार होकर घायल होकर अचेत हो गये।किसी तरह प्राण रक्षा हेतु उन्हे रणभूमि से हटाना पडा।किन्तु सेना नें हथियार  नहीं डाले।लडते -लडते  महारावल उदयसिंह वहीं खानवा के मैदान में  वीर गति को प्राप्त  हुए  तथा युवराज  (महारावल बांसवाडा) बुरी तरह घायल हुए। इसतरह पटाक्षेप हुआ  एक अनवरत चलती धर्म  और राष्ट्र  संस्कृति हेतु समर धर्मी  सिंहों की अमर कथा का।

लेख-
घनश्याम सिंह भाटी"प्यासा"
राजस्थान 

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