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स्वाभिमान के अनन्य शिखर: महाराणा प्रताप

स्वाभिमान के अनन्य शिखर: महाराणा प्रताप


भारतीय इतिहास के फलक पर महाराणा प्रताप एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी आभा शताब्दियों बाद भी धुंधली नहीं हुई है। वे केवल एक योद्धा नहीं, अपितु मातृभूमि के प्रति अनन्य निष्ठा और स्वाभिमान के जीवित प्रतिमान हैं। जब सम्पूर्ण आर्यावर्त की रियासतें सत्ता के लोभ या भय में मुगल अधीनता स्वीकार कर रही थीं, तब प्रताप ने अरावली की कन्दराओं में घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया, किन्तु विदेशी सत्ता के समक्ष मस्तक नहीं झुकाया। प्रस्तुत लेख महाराणा प्रताप के शौर्य, उनके त्याग और अदम्य जिजीविषा को रेखांकित करता है, जो आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम की अलख जगाता है।


चित्तौड़ के महाराणा प्रताप भारत के वे महानायक हैं जो मुगल बादशाह अकबर के छल, बल और प्रलोभन से भी कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी अस्मिता और स्वत्व की रक्षा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन संघर्ष में समर्पित कर दिया। प्रताप के युद्ध कौशल की यह विशेषता थी कि उन्होंने न केवल आमने सामने के युद्ध में अपनी वीरता सिद्ध की, बल्कि छापामार युद्ध पद्धति से शक्तिशाली मुगल सेना को निरन्तर छकाया।

इस अजेय महानायक का जन्म राजस्थान के प्रसिद्ध कुम्भलगढ़ दुर्ग में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को विक्रम सम्वत 1697 में हुआ था, जो अंग्रेजी कलेण्डर के अनुसार 17 जून 1540 की तिथि है। प्रताप के पिता महाराणा उदयसिंह सुप्रसिद्ध योद्धा राणा सांगा के पुत्र थे।


बालक प्रताप

यह इतिहास का वह पृष्ठ है जहाँ पन्नाधाय के बलिदान की गाथा अंकित है, जिन्होंने अपने पुत्र का बलिदान देकर बचपन में उदयसिंह के प्राणों की रक्षा की थी। प्रताप की माता रानी जयवन्तीबाई कुम्भलगढ़ की राजकुमारी थीं और उनके पिता अखैराज सोनगरा एक ख्यातिप्राप्त सेना नायक थे।

प्रताप का जन्म उस कालखण्ड की उपज था जब चित्तौड़ पर बनवीर ने धोखे से अधिकार कर लिया था। ऐसी विषम परिस्थितियों में रानी जयवन्तीबाई ने कुम्भलगढ़ में ही प्रताप को जन्म दिया। बालक प्रताप का बचपन भील वनवासी समुदाय के बच्चों के साथ व्यतीत हुआ, जहाँ उन्हें 'कीका' के नाम से पुकारा जाता था।

इसी वनवासी समाज के सान्निध्य में उन्होंने प्राथमिक युद्ध कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया। यद्यपि बाद में महाराणा उदयसिंह ने चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर लिया और राजनैतिक कारणों से अन्य विवाह भी किए, जिससे रानी जयवन्तीबाई और प्रताप की ओर उनका ध्यान कुछ कम हुआ, तथापि माता के सुदृढ़ मार्गदर्शन ने प्रताप के व्यक्तित्व को निखारा।

महाराणा प्रताप ने 32 वर्ष की आयु में 1 मार्च 1572 को मेवाड़ का सिंहासन सम्भाला। सत्ता सम्भालते ही उन्होंने राज्य की उन्नति के लिए दूरदर्शी निर्णय लिए, जिनमें ग्राम विकास और वनोपज के व्यापार को प्रोत्साहन देना मुख्य था।

उन्होंने किलों और बावड़ियों के निर्माण पर भी बल दिया। अकबर ने प्रताप को अपनी अधीनता स्वीकार कराने के लिए अनेक सन्धि प्रस्ताव भेजे और षड्यन्त्र रचे, किन्तु प्रताप अपने शासन की स्वायत्तता पर अडिग रहे। जब शान्ति के सभी प्रयास विफल हो गए, तब अकबर ने सैन्य दमन का मार्ग चुना और चित्तौड़ पर निरन्तर आक्रमण आरम्भ कर दिए।

भारतीय इतिहास का सबसे भीषण युद्ध 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के तंग दर्रे में हुआ। इस युद्ध में महाराणा प्रताप के साथ मेवाड़ के निष्ठावान सेनानायक थे, जिनमें भील सेना के सरदार राणा पूंजा सोलंकी, ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर और उनके तीन पुत्र कुँवर शालीवाहन सिंह, भवानी सिंह, प्रताप सिंह तथा पौत्र बलभद्र सिंह सम्मिलित थे।


हल्दीघाटी का भीषण युद्ध 

सादड़ी के झाला बीदा, झाला मान सिंह और सरदारगढ़ के भीम सिंह ने भी इस युद्ध में अपने शौर्य का प्रदर्शन किया। अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व मुस्लिम सरदार हकीम खाँ सूरी कर रहे थे, जो साम्प्रदायिक सौहार्द और देशप्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है।

हल्दीघाटी के इस सँकरे मार्ग पर प्रताप ने अपनी 3000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों की लघु सेना के साथ मान सिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व वाली विशाल मुगल सेना का सामना किया। युद्ध इतना प्रचण्ड था कि केवल एक दिन में ही दोनों ओर के लगभग 17000 सैनिकों का रक्त बहा।

जब युद्ध के मध्य महाराणा प्रताप घायल हुए, तब झाला मान सिंह ने उनका छत्र धारण कर मुगलों को भ्रमित किया और प्रताप को सुरक्षित निकाला। इसी युद्ध में प्रताप के स्वामीभक्त अश्व चेतक ने अपनी वीरता का परिचय दिया।

घायल अवस्था में भी एक नाले को पार करते हुए बालिचा गाँव में चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए, जहाँ आज भी उसका स्मारक बना हुआ है। अकबर की सेना ने मेवाड़ में भारी लूटपाट की, परन्तु वे चित्तौड़ पर स्थायी अधिकार करने में विफल रहे। केवल तीन मास के भीतर ही प्रताप की सेना ने उन क्षेत्रों को पुनः मुक्त करा लिया जहाँ मुगलों ने अपनी छावनियाँ बनाई थीं।

महाराणा प्रताप के जीवन का दूसरा बड़ा संघर्ष 1582 में हुआ, जिसे दिवेर का युद्ध कहा जाता है। कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को 'मेवाड़ का मैराथन' की संज्ञा दी है। इस युद्ध ने मेवाड़ के खोये हुए सम्मान को पुनः स्थापित किया।

अरावली की गौद में ली थी महाराणा ने शरण
अरावली की गोद में ली थी महाराणा ने शरण 

हल्दीघाटी की असफलता के बाद स्वयं अकबर विशाल सेना के साथ मेवाड़ आया, परन्तु वह अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में प्रताप को ढूँढने में निष्फल रहा। इसके विपरीत प्रताप ने अपनी छापामार रणनीति से मुगल सेना की रसद सामग्री को छिन्न भिन्न कर दिया, जिससे मुगलों को भारी क्षति हुई।

अकबर ने शाहबाज खान और अब्दुल रहीम खानखाना जैसे सेनापतियों को भी भेजा, किन्तु 9 वर्षों तक चले निरन्तर आक्रमणों के उपरान्त भी मुगलों को असफलता ही हाथ लगी।

महाराणा प्रताप की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, 15000 अश्वरोही, 100 हाथी और 20000 पैदल सैनिक थे, जिनकी सम्पूर्ण व्यवस्था महाराणा स्वयं करते थे। संकट के समय में दानवीर भामाशाह ने अपनी संचित सम्पत्ति प्रताप के चरणों में अर्पित कर दी, जिससे मेवाड़ की सेना को पुनः संगठित करने में सहायता मिली।


दानवीर भामाशाह महाराणा को अपनी संपत्ति भेंट करते हुए 

महाराणा प्रताप का सम्पूर्ण जीवन संघर्ष और युद्धों की एक लम्बी श्रृंखला रहा। उन्होंने महलों के ऐश्वर्य के स्थान पर वनों की धूल को श्रेष्ठ माना ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वतन्त्रता की वायु में श्वास ले सकें। अन्ततः 19 जनवरी 1597 को इस अजेय योद्धा ने अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया। उनका जीवन आज भी हमें यह सन्देश देता है कि संसाधन कम होने पर भी यदि संकल्प दृढ़ हो, तो विश्व की किसी भी महाशक्ति को चुनौती दी जा सकती है।

-रमेश शर्मा
 
भोपाल

 

 

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