नागपंचमी: आस्था और भारतीय परंपरा
August 16, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

प्रकृति से लेकर चराचर जगत का अभिनव स्वरूप जब नित निखरता सृजन की ओर अग्रसर होता है तो ऐसे समय में ऋतुराज वसंत का पदार्पण होता है। सूर्य देव के उत्तरायण होते ही समूची प्रकृति भी अपना कलेवर बदलती मनमोहक हो उठती है। वसंत के आगमन से पेड़- पौधों के पीत पात झर उसके पलक पांवड़े बन बिछ जाते हैं, अनेक रंगों में सजी संवरी नई कोंपले उग आती हैं।
ठंडक में उष्णता लिए चलती बयार वातावरण मे मादकता भर देती है। फूटती आम्र मंजरियों का पराग लेने मतवाले भंवरे गुंजायमान कर उठते हैं। कहीं कोयल की कूक, कहीं नगाड़े सी प्रतिध्वनि करते महोक, तो कहीं फूलों पर इठलाती रंगबिरंगी तितलियां, ऐसी मधुर छटा वसंत ऋतुराज वसंत में दिख पड़ती है। वसंत आगमन होते ही समूची प्रकृति का सौंदर्य देखते ही बनता है। प्रसन्न मन स्वमेव हुलक उठता है। वसंत तो काम का सहचर है और इसी के साथ मदनोत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई ताकि अभिसार रचती प्रकृति के साथ मानव भी उसी में रच बस सके।
ऋतुराज वसंत की मनोहारी छटा को देखते हुए श्रीकृष्ण ने गीता में अपने आप को 'ऋतुना कुसुमाकर' कहा है। खेतों में गेहूं,जौ की बालियां में निखार आने लगता है। पीली- पीली सरसों खेतों में बगर जाती है। अशोक पुष्पित हो उठता है। चारों ओर वसंत और कामदेव की दुंदुभी गुंजायमान होने लगती है। कामदेव की पाती फाल्गुनी हवाओं के साथ चारों ओर संदेशा पहुंचा जाती हैं। ऐसे आम ही नहीं इंसान भी बौरा उठते हैं और लाज से पलाश लाल हुए जाते हैं। मौसम एक-एक पग भरता है और मस्ती, उल्लास, उमंग भर देता है। मदनोत्सव, वसंतोत्सव, कामदेवोत्सव, कौमुदी महोत्सव लोकानुरंजन मनाने की परंपरा चल पड़ी।
'वसंत पंचमी' से 'रंग पंचमी' तक चलता था प्राचीन भारत में मदनोत्सव जो होलिका दहन के साथ चरम अवस्था तक पहुंच जाता था जहां काम के सभी रंग एकाकार होते थे। पौराणिक दृष्टांत में तपश्या रत भगवान शिव पर कामदेव ने अपने पुष्पित बाण चलाए उस क्रोधित हो भगवान शिव ने उसे भस्म कर दिया। कामदेव की भार्या रति विलाप करती हुई शिव से प्रार्थना करती है तब शिव ने कामदेव को अनंग रूप में पुनः जीवित कर देते हैं। सचमुच काम जब तक मर्यादा में रहता है उसे भगवान की विभूति माना जाता है जैसे कामदेव एक विभूति है और जब काम मर्यादा छोड़ देता है तो आत्मघाती बन जाता है और शिव का त्रिनेत्र उसे भस्म कर देता है।
वसंत पंचमी के दिन कामदेव और रति ने पहली बार मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया तभी से यह दिन वसंतोत्सव, मदनोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। भगवान श्रीकृष्ण एवं कामदेव को मदनोत्सव का आधि देवति माना गया है। कामदेव के आध्यात्मिक रूप को वैष्णव श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं जिन्होंने वृन्दावन में सोलह हजार नारियों के साथ महारास रचाया था। महारास में स्वक्रिया में परक्रिया का भ्रम और परक्रिया में स्वक्रिया का भ्रम के साथ चारों तरफ श्रीकृष्ण ही थे।
प्राचीन भारत में मदनोत्सव के समय रानी सर्वाभरण भूषिता होकर पैरों को रंजित करके अशोक वृक्ष पर बाएं पैर से हल्के आघात करती थी और अशोक वृक्ष पर पुष्प खिल उठते थे और चारों ओर वसंत और कामोत्सव की दुंदुभी बज उठती थी। मदनोत्सव पर महिलाएं अपने पति को अति सुंदर यानी कामदेव का प्रतिरूप मान उनकी पूजा करती हैं। काम कुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव जिसमें मन को भावनाओं से जोड़ा गया है। भारतीय संस्कृति में काम को देव स्वरूप प्रदान कर उसे कामदेव के रूप में मान्यता दी गई।
भारत के प्राचीन साहित्य के साथ चित्रकला, मूर्ति कला एवं स्थापत्य कला के माध्यम से वसंत और कामदेव को निरूपित किया गया है। वसंतोत्सव में राधा कृष्ण, वृंदावन में गोपिकाओं के साथ महारास एवं बरसाने की होली का रंग गुलाल के लुभावने चित्र आज भी लुभाते हैं। महर्षि वात्स्यायन का ग्रंथ कामसूत्र जीवन में काम के महत्व को रेखांकित करते हुए उसके शिष्ट स्वरूप को निरूपित करता है।
महाकवि कालिदास ने वसंत की मनोहारी छटा का वर्णन ऋतुसंहार में किया है। भवभूति के अनुसार वसंतोत्सव मनाने के लिए विशेष मदनोत्सव केंद्र बनाया जाता था जिसमें कामदेव का मंदिर होता था जहां सभी स्त्री-पुरुष एकत्र हो फूलों का हार बनाते, एक दूसरे पर अबीर- कुंमकुंम डालते और नृत्य, संगीत का आनंद लेते थे। हर्षचरित और दशकुमार चरित आदि संस्कृत ग्रंथों में वसंत और कामदेव का सुंदर वर्णन है। भविष्य पुराण में वसंत काल में कामदेव और रति की मूर्तियों की स्थापना और उनकी पूजा का वर्णन है।
स्थापत्य कला में खजुराहो और कोणार्क का सूर्य मंदिर काम शास्त्र जहां कामशास्त्र दर्शित है। छत्तीसगढ़ के कवर्धा का मड़वा महल में काम का कलात्मक सौंदर्य झलकता है। अनुपम स्थापत्यकला जहां काम सहज, सरल होकर मानव जीवन में काम की भूमिका को प्रतिपादित किया गया है।
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