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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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आगम ग्रन्थों में राम

आगम ग्रन्थों में राम


भारतीय सनातन साधना के दो प्रमुख मार्ग हैं - निगम (बहिर्मुखी), और आगम (अन्तर्मुखी)। डॉ मधुसूदन उपाध्याय जी का यह लेख इसी अन्तर्मुखी तन्त्र और आगम परम्परा में भगवान श्रीराम की सूक्ष्म उपस्थिति का गम्भीर विश्लेषण करता है। इसमें लेखक बतलाते हैं कि श्रीराम केवल भक्ति, और लोककथाओं के नायक ही नहीं हैं, अपितु वे शैव, शाक्त, वैष्णव, और यहाँ तक कि बौद्ध, और जैन आगमों में भी समान रूप से समाहित हैं। 


भारत की संस्कृति प्राचीन यूनान की भान्ति केवल बौद्धिक संस्कृति नहीं है, और न ही यह प्राचीन चीन की भान्ति केवल नैतिकता की संस्कृति है। भारत मूलतः एक आध्यात्मिक संस्कृति है। इस आध्यात्मिक संस्कृति का प्रस्थान बिन्दु 'साधना' है।

इसी साधना का उद्घोष अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, अथातो धर्म जिज्ञासा, और अथातो शक्ति जिज्ञासा के माध्यम से हुआ है। भगवान श्रीराम इसी साधना पक्ष के शलाका पुरुष, और साधन मर्यादा के पुरुषोत्तम हैं। भारतीय शाश्वत सनातन साधना के दो रूप हैं। एक बहिरंग, और दूसरी अन्तरंग।यह बहिर्मुखी साधना ही निगम कहलाती है, और अन्तर्मुखी अन्तःसलिला साधना का ही नाम आगम है।

श्रीराम, और उनके चरित्र के चिन्तन के लिए हमारे पास जो उपलब्ध स्रोत हैं, उनमें मुख्य रूप से चार प्रधान धाराएं हैं - १. निगम (वेद, पुराण, और उपनिषद्); २. आगम (तान्त्रिक परम्परा, और गुरु शिष्य पद्धति); ३. भक्ति साहित्य (मुख्यतः वैष्णव रामायत साधु सन्तों का चिन्तन); ४. लोक में राम (पीढ़ी-दर-पीढ़ी रामचरित रस को समाज ने जिस प्रकार आत्मसात किया, और अगली पीढ़ियों को हस्तान्तरित किया)।


श्रीराम का नाम है साधना का प्रमुख साधन 

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस को नाना पुराण निगम आगम सम्मत कहा है। इस एक वाक्य में ही श्रीराम के चरित्र के विषय में मानस बनाने के लिए उपलब्ध स्रोतों का चिन्तन सहज रूप से उपलब्ध हो जाता है। इसके साथ ही तुलसीदास जी ने दोहावली में एक स्थान पर यह भी कहा है -

निगम अगम साहेब सुगम राम सांचिली चाह।

यदि वर्तमान, और अर्वाचीन साहित्य का अनुशीलन किया जाए, तो हम यह देखते हैं कि श्रीराम के चरित्र का जो विस्तृत वितान आज के समाज में प्रचलित है, उसमें निगमों, भक्ति साहित्य, और लोक परम्परा से आई सूचनाओं की अधिकता है। इसके विपरीत तान्त्रिक, और आगम शास्त्रों से श्रीराम की जो छवि निखर कर आती है, उसकी चर्चा अत्यन्त कम है। इसके साथ ही लिखित रूप में यथेष्ट सामग्री का भी अभाव है।

आगम वह शब्द है जो वेद का बोध, और उसका वाचक तो है ही, परन्तु वास्तव में आगम पद किसी व्यक्ति विशेष के लिए उसी शास्त्र का वाचक माना जाता है, जिस पर उसका सहज विश्वास स्थापित हो गया हो। आगम को यदि पारम्परिक रूप से समझा जाए, तो वाराही तन्त्र का उल्लेख करना अत्यन्त उचित होगा।

आगत शिववक्त्रेभ्यो; गतञ्च गिरिजाश्रुतौ। मितञ्च वासुदेवस्यः तस्मादागम उच्यते ।

कहीं अन्य तांत्रिक ग्रंथों में यह पाठ ऐसे भी मिलता है -

आगतं पञ्चवक्त्रात्तु गतञ्च गिरिजानने। मतञ्च वासुदेवस्य तस्मादागममुच्यते।।

इसका तात्पर्य यह है कि आगम वे शास्त्र हैं, जो शिव के मुख से प्रकट होकर माता पार्वती तक पहुंचे हैं, और जो भगवान विष्णु द्वारा पूर्णतः समर्थित हैं। इस रूपक को गम्भीरता से समझा जाए, तो यह भारत की वाचिक अर्थात् मुख से कर्ण तक (मुखात् तु कर्णात्) चलने वाली गुरु शिष्य परम्परा का द्योतक है।


महादेव के भी आराध्य हैं प्रभु राम 

आगम की ही एक अपर संज्ञा तन्त्र है। तन्त्र, और आगम समानार्थी अर्थों में हमारे शास्त्रों में प्रयुक्त होते रहे हैं। आगम मूलक शास्त्र संस्कृति में विज्ञान, धर्म, और दर्शन ये तीनों लगभग समानार्थी हैं। आगम सर्वसुलभ होते हुए भी क्योंकि वे अन्तरंग साधना से जुड़ते हैं, इसलिए वे सदैव गुह्य ही रहे।

इसी कारण आगमिक राम, या श्रीराम के तान्त्रिक स्वरूप की लोक में विशद, और बृहद चर्चा नहीं मिलती। इसका एक कारण यह भी सम्भवतः रहा होगा कि अधिकारी विद्वानों में प्रायः साधकों की ही अधिकता रही है, अतः उनका ध्यान श्रीराम तत्त्व को हृदयंगम करने पर अधिक रहा, और जागतिक प्रकटीकरण कदाचित् उनका लक्ष्य ही नहीं था।

आगम ही तन्त्र है। तन्त्र में राम के स्वरूप को जानना भगवान श्रीराम को और अधिक निकट से जानने के समान होगा। वैसे भी तन्त्र की एक परिभाषा यह भी है कि- तन्यते विस्तार्यते ज्ञानम् अनेन् इति तन्त्रम्। या कहीं इस प्रकार भी कहा गया है कि- तनोति त्रायति तन्त्र। स्पष्टतः यहाँ एक धातु 'त्रय' है, जिसका अर्थ रक्षा करना होता है, और दूसरी धातु 'तन' है, जिसका तात्पर्य विस्तार करना है।

तन्यते अर्थात् विस्तार करना, और त्रायती अर्थात् रक्षा करना। अतः इस अर्थ को ध्यान में रखते हुए आगम यह कहता है कि तन्त्र उसे कहते हैं जो हमारा विस्तार करता है, और हमारी रक्षा करता है। यह दो स्तरों पर कार्य करता है। प्रथम, ज्ञान की रक्षा, और गुरु शिष्य परम्परा में ज्ञान का विस्तार।

और द्वितीय, उस व्यक्ति का भी विस्तार ताकि उसका स्व व्यापक हो सके। उसका अस्तित्व सुनिश्चित हो, और उसका स्व व्यापक हो, जिससे वह पूर्णतः समष्टिमूलक बन सके। आगम इन सात लक्षणों से समंवित होता है।


सप्तलाक्षणीय होता है आगम 

सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट्कर्म (शान्ति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, और मारण), साधन, और ध्यानयोग। अधिकारी विद्वानों ने जहाँ श्रीराम को तारा तत्त्व से जोड़कर देखा है, वहाँ रामायण के सातों कांडों में इन सातों लक्षणों को क्रमवार उपस्थित माना है।

श्रीराम के आगमिक स्वरूप के चिन्तन के क्रम में हमारे आवश्यक सोपान क्या हों, इसमें आगम को परिभाषित करता हुआ यह सूत्र हमारी बड़ी सहायता करता है

 आगच्छन्ति बुद्धिमारोहन्ति अभ्युदयनिःश्रेयसोपाया यस्मात् स आगमः।

अर्थात् आरोहण, अभ्युदय, और निःश्रेयस को प्राप्त होना ही आगम के मुख्य संकेत हैं। आगम, या तन्त्र वास्तव में आत्मगोपन की एक प्रक्रिया है। अतः जब इसके माध्यम से आत्मगोपन करने वाले श्रीराम को प्रकाशित किया जाए, तो इसके स्रोत, और अवयव हृदय संवाद की ही शैली में होने चाहिए।

इसका कारण यह है कि वेदादि निगम अपौरुषेय अवश्य हैं, परन्तु वे दृष्ट हैं, जबकि आगम उपदिष्ट हैं। इसमें हृदय ही प्रश्नकर्ता है, और हृदय ही उत्तर देता है। यहाँ सभी संवाद अभिन्नों के बीच हुए हैं। जैसे शिव, और पार्वती। ये शाश्वत युगल हैं, जो सर्वथा अभिन्न हैं।

आगमिक राम, या श्रीराम के तान्त्रिक स्वरूप के चिन्तन के क्रम में हमें भगवान श्रीराम के जीवन के उन कम चर्चित प्रसंगों को भी रेखांकित करते चलना चाहिए। जैसे कि ऋतुविज्ञानी राम, भगवान राम का ज्योतिषीय पक्ष, शाबर की दृष्टि में राम, और किरात परम्परा के राम आदि।


अनन्य परंपरा से लक्षित है श्रीराम 

श्रीराम का यह बृहद रूप वैष्णव आगम (पांचरात्र, और वैखानस आगम), शैव आगम (पाशुपत, शैवसिद्धान्त, और त्रिक आदि), और शाक्त आगम सभी में पसरा हुआ है। इसके अतिरिक्त बौद्ध तन्त्र, बोधिसत्व कथाओं, और जैनागमों में भी राम तत्त्व पर गूढ़, और विपुल सामग्री उपलब्ध है।

-डॉ० मधुसूदन उपाध्याय
(लेखक वरिष्ठ वैज्ञानिक व आणविक जीव विज्ञान के विशेषज्ञ हैं, जो आधुनिक विज्ञान और प्राच्य विद्याओं के समन्वय से समाज में निरंतर वैचारिक योगदान करते हैं।)

 

 

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