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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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मर्यादा पुरुषोत्तम: आदर्श जीवन का प्रतिमान

मर्यादा पुरुषोत्तम: आदर्श जीवन का प्रतिमान


रामायण केवल एक महाकाव्य नहीं है। यह सम्पूर्ण मानवजाति के आदर्श का दृष्टान्त है। रिंकी पाण्डेय जी ने अपने इस लेख में राम के उसी 'मर्यादा पुरुषोत्तम' स्वरूप का अत्यन्त सुन्दर और प्रेरणादायी चित्रण प्रस्तुत किया है। लेखिका के अनुसार मर्यादा कोई बन्धन नहीं बल्कि वह दृढ़ आधारशिला है जिस पर एक आदर्श राज्य, समाज, परिवार औ व्यक्ति के सम्बन्धों का प्रासाद खड़ी होती है।


भारतीय मानस के आकाश में यदि कोई सूर्य की भांति देदीप्यमान है, तो वह हैं प्रभु श्रीराम। राम केवल एक नाम नहीं, अपितु एक विचार हैं, एक सांचा है जिसमें ढलकर मनुष्य श्रेष्ठ बनता है। उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ है वह पुरुष जो मर्यादाओं में रहकर भी श्रेष्ठतम है।

मर्यादा का वास्तविक अर्थ: आज के युग में मर्यादा का अर्थ प्रायः 'बन्धन' समझ लिया जाता है, परन्तु राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि मर्यादा बन्धन नहीं, अपितु वह किनारा है जो नदी के जल को बिखरने से रोकता है। यदि नदी अपनी मर्यादा छोड़ दे, तो वह बाढ़ बनकर विनाश करती है।

केवल नदी ही नहीं प्रकृति में कोई भी यदि मर्यादा का उल्लंघन करता है तो वह अन्ततोगत्वा विनाश का कारण बनता है। प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन के प्रत्येक पग पर यह दिखाया कि कठिन से कठिन घड़ी में भी अपनी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

सम्बन्धों का अद्भुत प्रतिमान: प्रभु श्रीराम का चरित्र सम्बन्धों की एक ऐसी प्रयोगशाला है, जहाँ प्रत्येक सम्बन्ध एक ऐसा आदर्श रूप लेकर निकलता है जिसका उदाहरण अनन्त काल तक दिया जाता रहेगा।

आदर्श पुत्र: जिस आयु में युवा राजसिंहासन और सुख की चाह रखते हैं, उस आयु में श्रीराम ने पिता के एक वचन को पूर्ण करने के लिए वनवास को सहर्ष स्वीकार कर लिया। यहाँ पितृ भक्ति केवल पुस्तकीय शब्द नहीं, अपितु एक जीता जागता त्याग है।

आदर्श शिष्य: राम एक आदर्श शिष्य हैं इसका प्रमाण तभी मिल जाता है जब बचपन में ही वे गुरु के आश्रम चले जाते हैं ताकि गुरु को यज्ञ या पूजा में कोई विघ्न न हो, और माता अहल्या का उद्धार भी गुरु के आदेश से किया।

आदर्श भाई: श्रीराम और भरत का प्रेम निःस्वार्थता की पराकाष्ठा है। एक भाई राज्य छोड़कर वन जा रहा है, तो दूसरा भाई सिंहासन पर बैठने के स्थान पर खड़ाऊं रखकर राज कर रहा है। यह आज के उस समाज के लिए दर्पण है जहाँ भूमि के एक खण्ड के लिए भाई, अपने ही भाई के विरोध में खड़ा हो जाता है।

आदर्श पति: सीता के प्रति उनका समर्पण अनन्य था। रावण जैसे महाबली को पराजित करना केवल अपनी पत्नी को वापस लाना नहीं था, अपितु स्त्री के सम्मान की रक्षा की मर्यादा निश्चित करना था।

आदर्श मित्र: प्रभु श्रीराम की मित्रता विश्वास, त्याग और सेवा का सबसे बड़ा प्रतीक है, उन्होंने प्रत्येक जाति और वर्ग के लोगों के साथ सच्ची मित्रता निभाई।

धैर्य और वीरता का संगम: श्रीराम का व्यक्तित्व कोमल भी है और कठोर भी। वे 'कोदंडधारी' वीर हैं, परन्तु उनका बाण तभी उठता है जब क्षमा और शान्ति के समस्त मार्ग बन्द हो जाते हैं। जब समुद्र ने मार्ग देने से मना किया, तो श्रीराम ने पहले तीन दिन तक विनय की। यह उनका धैर्य था।

किन्तु जब विनय काम नहीं आई, तो उन्होंने धनुष उठाया। यह शिक्षा देता है कि शक्ति के बिना शान्ति अधूरी है, परन्तु शक्ति का प्रयोग अन्तिम विकल्प होना चाहिए। “बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
 बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥“

शबरी के बेर और केवट का प्रेम: श्रीराम के जीवन में ऊंच नीच का कोई स्थान नहीं था। एक नरेश होने पर भी वे वनवासी भीलनी शबरी के 'जूठे बेर' स्वाद लेकर खाते हैं। वे केवट को गले लगाते हैं और वानर भालुओं की सेना बनाकर तुच्छ समझे जाने वालों को गौरव प्रदान करते हैं। यह लोक नायक श्रीराम का वह रूप है जो समाज के अन्तिम व्यक्ति तक पहुंचता है। “सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥“

राम राज्य: 'राम राज्य' आज भी सुशासन का सबसे बड़ा मानदण्ड है। एक ऐसा राज्य जहाँ 'दैहिक, दैविक और भौतिक' कष्ट न हों। श्रीराम ने अपने व्यक्तिगत सुखों की आहुति दी ताकि प्रजा सुखी रहे। एक आदर्श राजा वही है जो अपनी प्रजा की प्रसन्नता और समृद्धि के लिए अपने सुख का त्याग कर देता है। “दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥"

आज के सन्दर्भ में राम: आज जब मनुष्य स्वार्थ, क्रोध और ईर्ष्या के जाल में फंसा है, तब श्रीराम का 'दर्पण' हमें मार्ग दिखाता है। श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए कष्ट तो बहुत आएंगे, परन्तु अन्ततः विजय 'धर्म' की ही होगी। श्रीराम कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं और जब तक यह सृष्टि है, उनके पदचिह्न मानवता का मार्गदर्शन करते रहेंगे। “जापर कृपा राम की होई। तापर कृपा करहिं सब कोई।।“

-रिंकी पाण्डेय
(लेखिका युवा साहित्यकार व स्नातकोत्तर की छात्रा हैं, जो अपनी लेखनी और विभिन्न साहित्यिक मंचों पर सक्रिय भागीदारी से समसामयिक विमर्श में निरंतर वैचारिक योगदान करती हैं)

 

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