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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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मल्हार और राम

मल्हार और राम


हमारे भारत के प्राचीन इतिहास-पुराण ग्रन्थों समेत विविध ग्रन्थों को यदि छोड़ दें, तो शेष विश्व में भूगोल के ऐतिहासिक विवरण की निरन्तरता दुर्लभ है। हमारे इन प्राचीन ग्रन्थों में उल्लिखित स्थान आज भी लोकजीवन के वैसे ही केन्द्र बने हुए हैं, जैसे वे इतिहासकाल में थे। ऐसे ही स्थानों में एक स्थान है – छत्तीसगढ़ का मल्हार। श्री हरि सिंह क्षत्री जी ने अपने इस लेख में छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) के इसी प्राचीन नगर मल्हार, और वहां स्थित 'परमेसरा तालाब' से जुड़ी मान्यताओं व परमम्पराओं का ऐतिहासिक, तथा पौराणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेखक यह दिखलाते हैं कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित 'पंचाप्सर तीर्थ' किस प्रकार आज भी जनमानस की आस्था का केन्द्र है, और कैसे यहाँ अचला सप्तमी का स्नान शैव, तथा वैष्णव परम्पराओं को कर रहा है।


छत्तीसगढ़ प्रदेश के बिलासपुर जिले के मस्तुरी विकासखंड अन्तर्गत नगर पंचायत मल्हार है। दक्षिण कोसल का सबसे प्राचीन नगर मल्हार अपने पुरावैभव के लिए जगत प्रसिद्ध है। इतिहासकारों, और पुरातत्त्वविदों द्वारा यहाँ का इतिहास ईसा पूर्व एक सहस्र वर्ष से अब तक निरन्तर बताया गया है।

मल्हार के स्थानीय निवासी स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह ठाकुर जी के निजी संग्रह से, तथा सागर विश्वविद्यालय, और उत्खनन विभाग नागपुर द्वारा मल्हार में किए गए उत्खननों से भी इस बात की पुष्टि होती है।

पुरातत्व का खजाना है मल्हार
पुरातत्व का खजाना है मल्हार

पौराणिक ग्रन्थों के अतिरिक्त भी इस क्षेत्र के विषय में वाल्मीकि रामायण, तथा महाभारत में भी मल्हार के विभिन्न स्थानों के विषय में उल्लेख प्राप्त होता है, जिसके विषय में अनेक दन्तकथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक दन्तकथा यहाँ के परमेसरा तालाब के विषय में है, जिसका प्राचीन नाम पंचाप्सर था, जो अपभ्रंश होकर परमेसरा हो गया है। त्रेतायुग में यह क्षेत्र पंचाप्सर तीर्थ कहलाता था।

वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के एकादश सर्ग में इस सम्बन्ध में विस्तार से वर्णन किया गया है। उस समय मल्हार के वर्तमान परमेसरा तालाब का विस्तार एक योजन तक था, जो सिकुड़ते सिकुड़ते अब मात्र 39 एकड़ का ही रह गया है। इस तालाब से जुड़ी दन्तकथाओं में से एक यह भी है कि इस तालाब के मध्य में सोने का एक महल है, जिसमें एक ऋषिराज अपनी पांच रानियों के साथ निवास करते हैं।

प्राचीन काल में यहाँ निवास करने वाली रानियां कमल के पत्तों, और फूलों पर बैठकर तालाब के किनारे स्थित शिव मन्दिर में आकर शिव जी की पूजा करतीं, फिर वैसे ही पुनः तालाब के मध्य बने सोने के महल में लौट जातीं, और वहां जाकर गायन वादन करती थीं। जिनकी ध्वनि अब तक अनेक ग्रामीण सुन चुके हैं।

आज भी महादेव के प्रति वैसी ही भक्ति दिखाई देती है 
आज भी महादेव के प्रति वैसी ही भक्ति दिखाई देती है 
 

अचला सप्तमी के दिन इस तालाब का शीतल जल गंगा सहित अनेक तीर्थों का संगम स्थल बन जाता है। उस दिन यदि इस तालाब में स्नान कर यहाँ से जल लेकर पातालेश्वर महादेव का अभिषेक किया जाए, तो भू मण्डल में स्थित सभी तीर्थों में स्नान करने का फल मिलता है।

वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में इस तालाब के विषय में उल्लेख आता है-

ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे।
ददृशुः सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम्।।

मल्हार में भी स्थित है पातालेश्वर महादेव
मल्हार में भी स्थित है पातालेश्वर महादेव

अर्थात् दूर तक यात्रा तय करने के पश्चात् जब सूर्य अस्ताचल को जाने लगे, तब उन तीनों ने एक साथ देखा कि सामने एक बड़ा ही सुन्दर तालाब है, जिसकी लम्बाई चौड़ाई एक एक योजन की जान पड़ती है।

पद्मपुष्करसम्बाधं गजयूथैरलंकृतम्।
सारसैर्हंसकादम्बैः संकुलंजलजातिभिः।।

अर्थात् वह सरोवर लाल, और श्वेत कमलों से भरा हुआ था। उसमें क्रीड़ा करते हुए हाथियों के झुंड उसकी शोभा बढ़ाते थे, तथा सारस, राजहंस, और कलहंस आदि पक्षियों, एवं जल में उत्पन्न होने वाले मत्स्य आदि जन्तुओं से व्याप्त दिखाई देता था।

प्रसन्नसलिले रम्ये तस्मिन् सरसि शुश्रुवे।
गीतवादित्रनिर्घोषो न तु कश्चन दृश्यते।।

ततः कौतूहलाद् रामो लक्ष्मणश्च महारथी।
मुनिं धर्मभृतं नाम प्रष्टुं समुपचक्रमे।।

इदमत्यद्भुतं श्रुत्वा सर्वेषां नो महामुने।
कौतूहलं महज्जातं किमिदं साधु कथ्यताम्।।

अर्थात् स्वच्छ जल से भरे हुए उस रमणीय सरोवर में गायन वादन का शब्द सुनाई देता था, किन्तु कोई दिखाई नहीं दे रहा था। तब श्रीराम, और महारथी लक्ष्मण ने कौतूहलवश अपने साथ आए हुए धर्मभृत नामक मुनि से पूछना आरम्भ किया। हे महामुने, यह अत्यन्त अद्भुत संगीत की ध्वनि सुनकर हम सब लोगों को बड़ा कौतूहल हो रहा है, यह क्या है, कृपया इसे भली भांति बताइए। तब धर्मभृत मुनि ने कहा,

इदं पंचाप्सरो नाम तटाकं सार्वकालिकम्।
निर्मितं तपसा राम मुनिना माण्डकर्णिना।।

स ही तेपे तपस्तीव्रं माण्डकर्णिर्महामुनिः।
दशवर्षसहस्त्राणि वायुभक्षो जलाशये।।

मल्हार में स्थित तालाब
मल्हार में स्थित तालाब

अर्थात् हे श्रीराम, यह पंचाप्सर नामक सरोवर है, जो सर्वदा अगाध जल से भरा रहता है। माण्डकर्णि नामक मुनि ने अपने तप के द्वारा इसका निर्माण किया था। महामुनि माण्डकर्णि ने एक जलाशय में रहकर केवल वायु का आहार करते हुए दस सहस्र वर्षों तक तीव्र तपस्या की थी।

ततः कर्तुं तपोविघ्नं सर्वदेवैर्नियोजिताः।
प्रधानाप्सरसः पंच विद्युच्चलितवर्चसः।।

अप्सरोभिस्ततस्ताभिर्मुनिर्दृष्टपरावरः।
नीतो मदनवश्यत्वं देवानां कार्यसिद्धये।।

ताश्चैवाप्सरसः पंच मुनेः पत्नीत्वमागताः।
तटाके निर्मितं तासां तस्मिन्नन्तर्हितं गृहम्।।

तत्रैवाप्सरसः पंच निवसन्त्यो यथासुखम्।
रमयन्ति तपोयोगान्मुनिं यौवनमास्थितम्।।

तासां संक्रीडमानानामेष वादित्रनिःस्वनः।
श्रूयते भूषणोन्मिश्रो गीतशब्दो मनोहरः।।

अर्थात् तब उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए सम्पूर्ण देवताओं ने पांच प्रधान अप्सराओं को नियुक्त किया, जिनकी अंगकान्ति विद्युत् के समान चंचल थी। तदनन्तर जिन्होंने लौकिक, एवं पारलौकिक धर्म अधर्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया था, उन मुनि को उन पांच अप्सराओं ने देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए काम के अधीन कर दिया।

मुनि की पत्नी बनी हुई वे ही पांच अप्सराएं यहाँ रहती हैं। उनके रहने के लिए इस तालाब के भीतर घर बना हुआ है, जो जल के अन्दर छिपा हुआ है। उसी घर में सुखपूर्वक रहती हुई पांचों अप्सराएं तपस्या के प्रभाव से युवा अवस्था को प्राप्त हुए मुनि को अपनी सेवाओं से सन्तुष्ट करती हैं।

क्रीड़ा विहार में लगी हुई उन अप्सराओं के ही वाद्यों की यह ध्वनि सुनाई देती है, जो आभूषणों की झंकार के साथ मिली हुई है। साथ ही उनके गीतों का मनोहर शब्द भी सुनाई पड़ता है।

इस प्रकार त्रेतायुग में मल्हार का परमेसरा तालाब का क्षेत्र पंचाप्सर तीर्थ के नाम से जाना जाता था। जिस दिन श्रीराम इस तीर्थ में आए थे, वह अचला सप्तमी का ही दिन था। उसी की स्मृति में मल्हार के इस प्रसिद्ध तालाब में एक दिन सम्पूर्ण तीर्थों का निवास माना जाता है।

उसी दिन से शिव, और राम को मानने वाले अचला सप्तमी के दिन इस पंचाप्सर तीर्थ में स्नान कर, यहाँ से जल लेकर पातालेश्वर महादेव में जलाभिषेक करते हैं, और सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त करते हैं।

-श्री हरिसिंह क्षत्री 
(लेखक प्रतिष्ठित पुराविद, इतिहासकार व कला साधक हैं, जो अपनी लेखनी से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर व पुरातात्त्विक वैभव के संरक्षण के महती कार्य में संलग्न हैं।)

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