चंद्र कलाओं पर आधारित हिन्दू त्यौहार : छेरछेरा पुन्नी विशेष
April 28, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

रंगमंच दिवस विशेष आलेख
भारत में नाटकों का प्रचार, अभिनय कला और रंग मंच का वैदिक काल से ही निर्माण हो चुका था। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से प्रमाण मिलता है। संस्कृत रंगमंच अपनी चरम सीमा में था। नाटक दृश्य एवं श्रव्य काव्य का रूप है जो दर्शकों को आनंदानुभूति कराती है। काव्य और अभिनय का संयोग नाटक में होता है इसलिए लोक इसकी ओर आकर्षित होकर प्रत्यक्ष और घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है।
नाट्यशास्त्र में वर्णित कथा के अनुसार देवताओं के अनुरोध पर ब्रह्मा जी ने समस्त मानवों के मनोरंजनार्थ ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यवेद की रचना की जिसे पंचमवेद कहा गया।
संकल्प्य भगवान् सर्ववेदाननुमस्मरन्।
नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम्॥
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि॥
सभी वर्णों, जाति समूह के लोकरंजन के लिए नाट्यशास्त्र की रचना की। जैसा की नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में लिखा है। जिसमें नाटक की उत्पत्ति के विविध पक्षों का बड़ा विस्तृत वर्णन 36 अध्यायों में किया है। नाट्यशास्त्र भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि ग्रंथ है इसमें सामग्रियों को अध्येताओं और रंगकर्मियों के लिए उपयोगी बनाया गया है।
'न तज्जानं न तच्छिल्प न सा विद्या न सा कला
ना सौ योगो न तत्कर्म नाट्येsस्मिन्यन्न दृश्यते।।' अर्थात
कोई ज्ञान, कोई शिल्प, कोई विद्या, कोई कला, कोई योग तथा कोई कर्म ऐसा नहीं जो नाट्य में दिखाई ना दे।
नाट्योत्त्पत्ति के कालिदास के अनुसार -
"नाट्यां भिन्नरुचेर्जनस्य, बहुधाप्येकं समाराधनम।"
"नाटक विभिन्न प्रकार की रुचि रखनेवाले मनुष्यों के मनोरंजन का अद्वितीय साधन है।"
भरतमुनि के अनुसार----
"वेदाध्यात्मोपन्न तु शब्दच्छन्दस्समन्वितम,
लोकसिद्धम भवेतसिद्धम नाट्य लोकात्मक तथा।"
अर्थात नाटक चाहे वेद या अध्यात्म से उत्पन्न हो कितने ही सुंदर शब्दों और छंदों में रचा गया हो वह तभी सफल माना जाता है जब लोक उसे स्वीकार कर ले क्योकि नाटक लोक परक होता है ।
भारत में सामाजिक, धार्मिक अवसरों पर लोकोत्सव और लोक परंपराओं से प्रेरित होकर नाटक किया जाता रहा है।
रंगमंच पर स्थानीय स्तर पर जनसामान्य के समक्ष संगीतमय प्रदर्शन करने की परंपरा ही लोकनाट्य कहलाता है। जिसमे स्थानीय भाषा-शैली एवं दैनिक जीवनचर्या के अनुरुप जीवन के विविध पक्षों का संयोग होता है। पूरे भारतवर्ष में भिन्न भिन्न पारंपरिक नाटक या लोकनाट्य प्रचलित एवं प्रसिद्ध हैं, जिनमें रामलीला, रासलीला, जात्रा, नौटंकी, स्वांग, दशावतार, तमाशा, करियाल तेरुकुट्टु, भामकलापम इत्यादि बहुत से लोकनाट्य हैं।
रामलीला लोकनाट्य का एक रूप है। पहले वाल्मिकी रामायण की पौराणिक कथा पर आधारित थी बाद में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस की कथा और संवादों पर रामलीला का मंचन किया जाने लगा। कहा
जाता है, काशी नरेश ने गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा राम- चरित मानस पूरा करने के बाद रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया तभी से देश भर में रामलीला का प्रचलन प्रारंभ हुआ।
लोकनाट्य में सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रचलित रामलीला है।जो धार्मिक लोकनाट्य है। रामलीला को प्रस्तुत करने की परंपरा वाचिक रही है जिसमें श्रीराम के धीर, वीर, उदात्त चरित्र का दर्शन कर दर्शक आनन्दानुभूति करता है। रामचरित मानस में वर्णित राम कथा में रामजन्म से लेकर रावणवध तक के विभिन्न प्रसंगों को रंगमंच में कलाकारों द्वारा अभिनीत किया जाता है। जिसमें श्री राम के आचरण, ध्यान, दर्शन, चिंतन को लोक के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है ताकि समस्त मानव जगत भौतिक और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति एवं ज्ञान भी प्राप्त कर सके और जीवन के संघर्षों एवं समस्याओं का समाधान करने का मार्ग दर्शन भी प्राप्त कर सके। भरत के नाट्यशास्त्र में वर्णित नाट्यकला के विविध पक्षों के अनुरूप ही रामलीला का बड़ा ही कलात्मक और लालित्यपूर्ण मंचन किया जाता है। रामलीला हिंदू धर्म के भीतर कई प्रदर्शन कला-संबंधी उत्सवों में से एक है।
रामलीला के मंचन, रस छंद, अलंकार, गायन-वादन-नर्तन, वेशभूषा, प्रस्तुतिकरण संबंधित सभी पक्षों का समावेश किया जाता है रामलीला (रामलीला) (शाब्दिक' राम की लीला या खेल') प्राचीन हिंदू महाकाव्य के अनुसार राम के जीवन के किसी भी नाटकीय लोक फिर से अधिनियमन है, रामायण एवं रामचरित मानस में विशेष रूप से हिंदू भगवान राम से संबंधित नाटकीय नाटकों और नृत्य कार्यक्रमों को संदर्भित करता है, जो भारत में नवरात्रि के वार्षिक शरद उत्सव के दौरान आयोजित किए जाते हैं। अच्छाई और बुराई के बीच पौराणिक युद्ध के पश्चात अच्छाई की विजय को दशहरा या विजयदशमी के दिन में रामलीला का उत्सव रावणवध के साथ संपन्न होता है। राक्षस रावण, मेघनाथ, कुम्भकर्ण के विशाल विचित्र पुतले आतिशबाजी के साथ जलाए जाते हैं। इस प्रकार प्रदर्शन कला एक प्राचीन भारतीय परंपरा है।
रामलीला में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार रंगकर्म, पात्र, का मंचपर आगमन, वेशभूषा, संवाद, स्वभाव, प्रवृत्ति को सांकेतिक अभिनय प्रणाली एवं विभिन्न उपकरण सामग्री को शामिल करते हुए अभिनीत किया जाता है।
सर्वप्रथम रामलीला की विभिन्न मंडलियों के पेशेवर कलाकारों द्वारा मंच पर रामचरित मानस की स्थापना कर मंगलाचरण कर देवों की स्तुति एवं पूजा-अर्चना की जाती है। जिसमें गणेश पूजन, मुकुट पूजन एवं व्यासगद्दी मुख्य है। रामलीला में एक सूत्रधार होता है जो रामचरित मानस की रामकथा की चौपाइयों को गाकर कथा सुनाता है।
"आंगिकं भुवनं यस्य वाचिकं सर्ववाड्मयम
आहार्य चन्द्रता रादिस्तं नुमः सात्विक शिवम।।
अभिनय के इन्ही चार भेदों आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक के अनुरुप ही अंग संचालन, अभिनय शैली से रामलीला की जाती है। रामलीला में, मंच सज्जा, पुष्पमालाओं एवं नकली आभूषणों का प्रयोग, पात्रों के अनुसार मुखसज्जा रंगों के मेल से मुख लेप, केशविन्यास दाढ़ी-मूंछ-जटा बनाना, मुकुट एवं मुखौटों का उपयोग, नकली उपकरणों एवं शस्त्र का प्रयोग किया जाता है। प्रस्तुति की विभिन्न शैलियों के प्रयोग से प्रतीकों, हाव-भाव, चेष्टाओं द्वारा रामचरित मानस की कथा प्रसङ्गों को स्थानीय स्तर में उपयोग में आने वाले वाद्ययंत्रों जैसे तबला, ढोलक, झांझ, मंजीरा, शहनाई, बांसुरी, इत्यादि तंत्री वाद्य, घन वाद्य, अवनद्ध वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। प्रसंगों के अनुसार ताल-लय द्वारा सात सुरों से विलंबित, मध्य, द्रुत लय में स्थानीय लोकभाषा एवं लोकशैली, लोक गीतों एवं शास्त्रीय गीतों के माध्यम से प्रस्तुति की जाती है। रामलीला में विभिन्न कलात्मक मुद्राओं द्वारा कमर, हाथ, पद संचालन कर भावनृत्य भी किये जाते हैं। रस एवं भाव के सिद्धांतों का पूर्ण रूप से निर्वहन किया जाता है ताकि दर्शक भावनात्मक स्तर से जुड़ कर रसानुभूति कर सकें।
रामलीला में पात्रों द्वारा ही सज्जन,राक्षस, पशु-पक्षियों, प्रकृति,वातावरण अनुसार भूमिका करनी पड़ती है। सभी प्रसंगों को मंच में अभिनीत नही किया जा सकता ऐसे में सांकेतिक अभिनय अथवा नेपथ्य से गीतों, संवादों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। मंच में प्रवेश एवं बाहर जाने की निश्चित व्यवस्था होती है। प्रसंगानुसार पीछे दृश्यविधान हेतु रंग-बिरंगे कपड़ों के पर्दों का प्रयोग किया जाता है। साथ ही गायकों-गायिकाओं, वादकों की बैठक व्यवस्था भी सुनिश्चित होती है।
रामलीला में मंच पर अभिनय करने वालों के अतिरिक्त नेपथ्य में कार्य करने वाले कर्मियों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। जिसमें रूप सज्जाकार, पुष्प सज्जाकार, बढ़ई, धोबी, विदूषक, नान्दी, कुशील, तौर्यत्रिक आदि के कार्य शामिल है। ध्वनि एवं उचित प्रकाश की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है। मंचन में बड़ी सूक्ष्मता के साथ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया जाता है। ताकि किसी प्रकार से जनसामान्य की भावनाओं को ठेस ना पहुँचे। राम की हृदयस्पर्शी घटनाएं, वीरतापूर्ण कार्य, दुःखमय जीवन, उनके आदर्श रूप को रामलीला में प्रस्तुत किया जाता है। राम के अलावा अन्य पात्रों के चरित्र उनके त्याग, वीरता, साहस, धैर्य, प्रेम, करुणा, सौन्दर्य भावना को प्रदर्शित किया जाता है। आधुनिक युग में ध्वनि एवं विद्युत प्रकाश के भरपूर प्रयोग से रामलीला को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।
रामलीला चूंकि लोकनाट्य है और स्थानीय लोग अपने क्षेत्र विशेष से साधनों के प्रयोग व्यवस्थाअनुसार मंच में प्रस्तुत करते हैं फिर भी नाट्यशास्त्र में वर्णित विभिन्न पक्षों का जिनका प्रयोग नाटक में समयानुसार एवं आवश्यकतानुसार अपेक्षित है उन सभी का प्रयोग रामलीला में आवश्यक नहीं है परन्तु यदि भरत के नाट्यशास्त्र में वर्णित मुख्य सिद्धान्तों में से शैलियों, लय, गति, ताल, गायन, वादन, नर्तन, अभिनय से संबंधित पक्षों का प्रसंगों की प्रस्तुतिकरण में आवश्यकता के अनुसार समावेश करते हुए रामलीला का मंचन किया जाता है।
"यथा जीवत्स्वभावनं हि परित्यज्यान्य देहीकम।
परभावं प्राकुरुते परभावं समाश्रित"
"एवं बुध परभाव सोsस्मीति मनसा स्मरन
येषां वागंगलीलाभिश्चेष्टा भिस्तु समारेत्"
अर्थात जिस प्रकार जीव एक शरीर त्याग कर अन्य देह में प्रवेश कर दूसरे जीव के स्वभावानुसार आचरण करने लग जाता है उसी प्रकार पात्र को चाहिए कि वह जिसकी भूमिका कर रहा है उसका मन से स्मरण करें और उसके बाद अपनी वाणी तथा आंगिक क्रियाओं को उसके अनुरूप बना ले।
रामलीला के मंचन में रामजन्म, राम का वनवास, राम और भरत का विलाप, सीता स्वयंवर, केंवट प्रसंग, अहिल्या का उद्धार, सबरी प्रसंग, सीताहरण, जटायु प्रसंग, बाली-सुग्रीव प्रसंग, मारीचि प्रसंग, हनुमान का लंका गमन, अशोकवाटिका प्रसंग, लंका दहन, लक्ष्मण मूर्छा, संजीवनी बूटी प्रसंग, मेघनाथ, कुंभकर्ण वध, अंत में राम द्वारा रावण वध इन्ही प्रसंगों में मंचन किया जाता है। भारत के विभिन्न स्थानों में रामलीला मंडलियों द्वारा प्रस्तुतिकरण में प्रसंग महत्वपूर्ण हैं जो अपने क्षेत्र विशेष में उन्ही प्रसंगों का ही प्रदर्शन करते हैं।
रामलीला का आयोजन भारत के अलावा,नेपाल थाईलैंड, फिजी ,लाओस, मॉरीशस, कनाडा, सूरीनाम, बाली, जावा, सुमात्रा, दक्षिण अफ्रीका, श्री लंका, कम्बोडिया में भी किसी ना किसी रुप में होता है। थाईलैंड की रामायण को रामाकियन कहते हैं। नाट्यकला के विविध आयामों के अनुसार भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के विभिन्न पक्षों को अंगीकृत करते हुए रामलीला की जाती है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में लिखा है---
दुःखार्तानां श्रमार्तनां शोकार्तानां तपस्विनाम।।
विश्रामजननं लोके नाट्यमेतद भाविष्यति।।
विनोदजननं काले नाट्यमतेद भाविष्यति।।
इस प्रकार संस्कृत नाटकों की रचना के मूल में मुख्य उद्देश्य दुःखी थके हुए एवं शोक से त्रस्त लोगों का मनोरंजन करने रहा है। नाट्य शास्त्र के 36 अध्यायों में अभिनेता अभिनय, नृत्य, गीत, वाद्य, दर्शक, दशरूपक, रंगमंच, रस निष्पत्ति से संबंधित सभी तथ्यों का विवेचन किया गया है।
लोक और परंपराओं का अनुकरण करते हुए भरत ने नाट्य प्रयोगकाल में सिद्धि और बाधा के आलेख्य का विधान तो किया है परंतु प्रयोगशील आचार्य होने के कारण वे शास्त्र विहित प्रयोग सीमा से भी अपरिचित नहीं थे अतः उन्होंने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया है कि शास्त्रों के नियमों की ऐसी विशाल और सुदृढ़ परंपरा है कि उन सबका यथावत प्रयोग संभव नहीं है। लोक परंपरा तथा वेदों शास्त्रों की मर्यादा के अनुरूप गंभीर-भाव-भूषित-सर्वजन ग्राह्य शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। इस त्रिगुणात्मक संसार में न तो कुछ गुणहीन ही है, न नितान्त दोष उपेक्ष्य होता है। गन सभार में दोष -लेख अदृश्य हो जाता हैं।" भरत ने इतनी स्वतंत्रता देकर प्रयोक्ताओं को पूर्ण अनुशासित किया है कि वाचिक आंगिक, सात्विक और नेपथ्यज विधियों का रस भाव, गीत, आतोद्य और लोकव्यवहार के प्रति पूर्ण सतर्क रहना चाहिए।.
क शक्तो नाट्यविधौ यथा वदुप पादनं प्रयोगस्य
कर्तुं न्यगुमना वा यथावदुक्तं परिज्ञातम
तस्माद् गंभीरार्धा: शब्दा ये लोकवेदसंसिद्धा:
सर्वजनेन ग्राह्यस्ते योज्या नाटके विधिवत्
न च किंचिद् गुणहीना दोषैः परिवर्जित न चा किंचित
तस्यान्नाट्यप्रक्रतौ दोषा नाट्यार्थत(नात्यर्थतो)ग्राह्यः।"
"न च नादरस्तु कार्यों नटेन वागंगस्तव नेपथ्ये
रस भावेत गीतेषु आतोद्य लोकयुक्तयांच"
इन्हीं नियमो एवं सिद्धान्तों के अनुरूप ही लोकनाट्य कलाकारों के सम्यक सहयोग से विभिन्न मंडलियों द्वारा रामलीला की जाती है।
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