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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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लोहड़ी: ऋतु, कृषि और सामूहिक चेतना का उत्सव

लोहड़ी: ऋतु, कृषि और सामूहिक चेतना का उत्सव

लोहड़ी उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब की सांस्कृतिक चेतना में रचा-बसा एक प्रमुख लोकपर्व है, जिसे मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मनाया जाता है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, कृषि जीवन और सामूहिक एकजुटता का प्रतीक है। मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाने वाला यह पर्व कठोर सर्दी के अंत और आने वाले वसंत का स्वागत करता है।

इसलिए लोहड़ी के अवसर पर यह लोककथन जगह-जगह सुनाई देता है — “आया बसंत, पाला उड़ंत”, यानी कि बसंत आ गया है, पाला उड़ गया है। लंबे, धूप भरे दिनों की आहट के साथ लोहड़ी जीवन में नव ऊर्जा, आशा और उल्लास का संचार करती है।

फसल चक्र से जुड़ा लोकपर्व है लोहड़ी
फसल चक्र से जुड़ा लोकपर्व है लोहड़ी

कृषि समाज के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व है, जैसा कि संपूर्ण भारत में होता है — अधिकांश त्योहारों/उत्सवों का सीधा संबंध नई फसल के आगमन से होता है। यह तार्किक भी है, क्योंकि कृषि प्रधान देश में उपज के बाद ही उत्सव मनाया जा सकता है। यह रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं, सरसों और गन्ने की कटाई से जुड़ा पर्व है। महीनों की मेहनत के बाद जब खेत लहलहाने लगते हैं, तब किसान सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं, जिनकी ऊष्मा और प्रकाश ने फसल को जीवन दिया।

लोहड़ी इस श्रम, धैर्य और समृद्धि के उत्सव का दिन है। इस दिन नई फसल की पूजा की जाती है और आने वाले कृषि चक्र के लिए शुभकामनाएं दी जाती हैं।

लोहड़ी - नई फसल का उत्सव 
लोहड़ी - नई फसल का उत्सव 

लोहड़ी शब्द की व्युत्पत्ति भी लोकजीवन से जुड़ी मानी जाती है। ‘ल’ लकड़ी का, ‘ओह’ जलते उपलों का और ‘ड़ी’ रेवड़ी का संकेत माना जाता है। ठंड की रात में जलती अग्नि, उसके चारों ओर एकत्र लोग और अग्नि में अर्पित तिल, मूंगफली, मक्का, गजक और रेवड़ी — यही इस पर्व की आत्मा हैं। यह मुख्यतः अग्निदेव के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है।

यह अग्नि केवल शारीरिक गर्माहट नहीं देती, बल्कि पुराने दुख, नकारात्मकता और थकान को त्यागकर नए विचारों और शुभ संकल्पों को अपनाने का प्रतीक भी है। यह देखकर अचरज होता है कि यहाँ भी लोग अग्नि के चारों ओर वृत्ताकार घूमते हुए उसमें नई फसलें, तिल, गुड़ और रेवड़ी अर्पित करते हैं। यह वृत्ताकार नृत्य या परिभ्रमण की प्रथा सम्पूर्ण भारत में एक जैसी दिखती है, जिससे यह समझ आता है कि ऊपरी तौर पर चाहे जितनी सांस्कृतिक विविधता दिखे, लेकिन भारत का मूल दर्शन एक ही है, जो सभी सनातन परंपराओं में स्पष्ट परिलक्षित होता है।

लोहड़ी पर बनने वाली स्वादिष्ट मिठाइयाँ
लोहड़ी पर बनने वाली स्वादिष्ट मिठाइयाँ

लोहड़ी से जुड़ी लोककथाएं इस पर्व को नैतिक और सामाजिक गहराई प्रदान करती हैं। मुगल काल में अकबर के शासन के दौरान पंजाब में दुल्ला भट्टी नामक एक लोकनायक का उल्लेख मिलता है, जो मुग़ल शासक अकबर का समकालीन था। उन्होंने व्यापार के नाम पर मुसलमानों द्वारा खरीदी जा रही लड़कियों को मुक्त कराया और उनका अपने ही धर्म में विवाह कराकर उन्हें सम्मानजनक जीवन प्रदान किया।

उनकी वीरता और करुणा की स्मृति में आज भी लोहड़ी के गीतों में ‘सुंदर मुंदरिये’ का गायन किया जाता है, ताकि समाज में स्त्री सम्मान, संरक्षण और जरूरतमंदों की सहायता की भावना जीवित रहे। दुल्ला भट्टी की कहानी यह याद दिलाती रहती है कि चाहे विदेशी आक्रमणकारियों ने हमारी संस्कृति पर कितना ही कुठाराघात किया हो, हमारी मजबूत जड़ों ने उसे कभी हिलने नहीं दिया।

लोहड़ी से जुडी लोककथा का मुख्य पात्र - दुल्ला भट्टी
लोहड़ी से जुडी लोककथा का मुख्य पात्र - दुल्ला भट्टी

लोहड़ी के दिन सामूहिक जीवन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। बच्चे घर-घर जाकर लोकगीत गाते हैं और अग्नि के लिए सामग्री एकत्र करते हैं, जिससे आपसी सहयोग और सामंजस्य की भावना बढ़ती है। लोग पवित्र नदियों में स्नान कर आत्मशुद्धि का भाव रखते हैं और दान–पुण्य करते हैं, ताकि समृद्धि केवल अपने तक सीमित न रहे। सपरिवार और मित्रों के साथ अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर गिद्दा और भांगड़ा जैसे लोकनृत्य किए जाते हैं। सरसों का साग, मक्के की रोटी, गन्ने की खीर और पारंपरिक प्रसाद इस दिन के स्वाद को विशेष बना देते हैं।

गिद्दा - लोहड़ी पर विशेष तौर पर किया जाने वाला नृत्य
गिद्दा - लोहड़ी पर विशेष तौर पर किया जाने वाला नृत्य

एक प्रसिद्ध पंजाबी कहावत है — “पोह रिद्धि, माघ खिड्डी” जिसका अर्थ है भोजन (साग) को पोह (पूस) में तैयार करके माघ मास, यानी अगले दिन खाया जाना चाहिए। इस अवसर पर पंजीरी भी विशेष तौर पर तैयार की जाती है, जिसमें गुड़, मेवा, कई प्रकार के बीज और इलायची, दालचीनी जैसे मसाले उपयोग में लाए जाते हैं। इनमें आहारविज्ञान संबंधी ज्ञान झलकता है — जहाँ गुड़ मिठास का स्वास्थ्यवर्धक विकल्प है, जो खेतों में काम करने के लिए आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध कराता है; मसाले ठंड के मौसम में शरीर को गर्माहट देते हैं; और तिल प्रोटीन के मुख्य स्रोतों में से एक है, जो गठिया जैसी बीमारियों में भी उपयोगी होता है।

पारिवारिक जीवन में भी लोहड़ी का विशेष स्थान है, खासकर नवविवाहित दंपतियों के लिए। विवाह के बाद पहली लोहड़ी पर ससुराल पक्ष द्वारा नववधू का भव्य स्वागत किया जाता है। पारंपरिक परिधान, आभूषण, मेंहदी और उपहारों के साथ यह दिन नए जीवन की शुभ शुरुआत का प्रतीक बन जाता है। इस अवसर पर सभी नृत्य-गायन और ढोल की थाप पर एक साथ मिलकर खूब आनंद मनाते हैं। गिद्दा इस दौरान किया जाने वाला मुख्य लोकनृत्य है।

समग्र रूप से लोहड़ी एक ऐसा पर्व है जो प्रकृति, परिश्रम और परंपरा को एक सूत्र में बांधता है। यह किसानों के सम्मान, सामाजिक एकता और जीवन के नवीनीकरण का उत्सव है। जलती अग्नि के साथ यह संदेश देती है कि जैसे ऋतुएं बदलती हैं, वैसे ही मनुष्य को भी पुराने बोझ उतारकर नए उत्साह और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यही लोहड़ी का वास्तविक सांस्कृतिक सार है।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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