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लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना: रामायण से संबंधित शैल चित्र

लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना: रामायण से संबंधित शैल चित्र


भारत मध्य में बसा छत्तीसगढ़ प्रदेश प्राचीन इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। रायगढ़ जिले के ओंगना गाँव में स्थित लिखामाड़ा शैलाश्रय हमारे पूर्वजों के जीवन तथा उनके विचारों को समझने का एक माध्यम है। लम्बे समय तक औपनिवेशिक विचारों वाले इतिहासकारों ने भारत के ऐसे ऐतिहासिक स्थानों को उपेक्षित किया। उन्होंने इन क्षेत्रों को पिछड़ा और आज्ञानी मान लिया था। आज हमें भारतीय दृष्टि से अपने इतिहास का अध्ययन करने की आवश्यकता है।


लिखामाड़ा शैलाश्रय रायगढ़ जिले की धरमजयगढ़ तहसील और विकासखण्ड के ओंगना गाँव में स्थित है। जिला मुख्यालय रायगढ़ से धरमजयगढ़ की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। यहाँ से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर ओंगना गाँव है। गाँव से लगभग 1 से 2 किलोमीटर की दूरी पर लिखामाड़ा शैलाश्रय पहाड़ी पर स्थित है।

जिला मुख्यालय कोरबा से रिस्दी, कोरकोमा, चचिया और हाटी होते हुए लगभग 72 किलोमीटर की दूरी पर धरमजयगढ़ पड़ता है। यहाँ धीरेन्द्र सिंह मालिया से सम्पर्क करने पर ओंगना जाने का मार्ग सहज हो जाता है। धरमजयगढ़ से 5 किलोमीटर दूर स्थित ओंगना गाँव तक पहुँचना आसान है। ओंगना गाँव पहुँचकर बाईं तरफ एक मोड़ आता है। यहाँ से थोड़ी दूर पर क्रिकेट का एक मैदान है। मैदान में एक मंच बना हुआ है। यहाँ चार पहिया वाहनों को खड़ा करके पैदल ही लिखामाड़ा शैलाश्रय तक पहुँच सकते हैं। दो पहिया वाहन से शैलाश्रय तक सीधे जा सकते हैं।


 एक प्राचीन शैलाश्रय 

यह शैलाश्रय 22°26'17" उत्तरी अक्षांश और 83°14'13" पूर्वी देशान्तर पर समुद्र तल से लगभग 1286 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। पुरातत्वविदों ने लिखामाड़ा शैलाश्रय के शैलचित्रों का समय 10000 से 15000 ईसा पूर्व माना है। लेखक का मानना है कि इनमें से दो शैलाश्रयों के शैलचित्र पौराणिक काल के माने जाते हैं। लिखामाड़ा शैलाश्रय एक पहाड़ी पर स्थित है। इस पहाड़ी में अनेक छोटे और बड़े शैलाश्रय हैं। पहाड़ी के जिस हिस्से में शैलचित्र और पाषाण काल के छोटे उपकरण मिलते हैं, वह हिस्सा लगभग 200 मीटर के क्षेत्र में फैला है।

ओंगना शब्द का अर्थ और लोक परम्परा

रायगढ़ जिले की धरमजयगढ़ तहसील और विकासखण्ड के अन्तर्गत ग्राम पंचायत ओंगना तहसील मुख्यालय से 5 किलोमीटर दूर है। यहाँ पहुँचने के लिए पक्की सड़क है। ओंगना शब्द का उपयोग लोक भाषाओं जैसे छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी और अवधी में होता है। इसका अर्थ लीपना या पोतना है। विशेष रूप से गोबर, मिट्टी या गेरू से घर के आँगन या दीवार को लीपने के लिए यह शब्द प्रयोग होता है। यह शब्द ग्रामीण परम्पराओं और लोक संस्कृति से जुड़ा है। लोग त्योहारों या शुभ अवसरों पर घर को ओंगना शुभ मानते हैं।


 आँगन की लिपाई करती महिला

ओंगना का दूसरा अर्थ पोतना भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में बैलगाड़ी या भैंसागाड़ी चलती है। इसके पहिए के बीच में लोहे की पुटी लगी होती है। गाड़ी चलने पर इसमें घर्षण होता है। इस घर्षण को कम करने के लिए पहिए में अरंडी का तेल लगाते हैं। लिखामाड़ा शैलाश्रयों के पास से ही प्राचीन गाड़ा मार्ग गुजरता है। यहाँ से गुजरते समय ग्रामीण पहिए में तेल ओंगते थे। इससे पहिए में घर्षण कम होता था। इसी कारण इस गाँव का नाम ओंगना पड़ा।

प्राचीन सांस्कृतिक पहचान के कारण ओंगना नाम का पहला अर्थ अधिक उचित लगता है। अध्ययन की दृष्टि से हम यहाँ के शैलाश्रयों को चार भागों में बाँटते हैं। इन सभी का अपना सांस्कृतिक महत्त्व है। ये भाग हैं: लिखामाड़ा, आवासीय माड़ा, रावणमाड़ा और बन्दरमाड़ा।

शैलाश्रय 1: 
ओंगना गाँव के शैलाश्रयों को पूरा देश लिखामाड़ा के नाम से जानता है। विद्वानों ने इसे चार भागों में बाँटा है। पहले शैलाश्रय में लगभग 400 से अधिक शैलचित्र हैं। यह शैलाश्रय अपने नाम के अनुरूप है। हम इस शैलाश्रय को प्रागैतिहासिक काल का मान सकते हैं। पुरातत्वविदों ने यहाँ के चित्रों का समय 10000 से 15000 ईसा पूर्व के बीच तय किया है।


लघु पाषाण उपकरण के अवशेष

लिखामाड़ा शैलाश्रय इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को दिखाता है। इस शैलाश्रय में प्राचीन संस्कृति की पूरी झलक दिखती है। यहाँ सामूहिक नृत्य करते हुए मानव, प्रागैतिहासिक काल के मानवों के पंजे, ज्यामितीय चिह्न और बैल आदि के चित्र हैं।

कलाकारों ने इस शैलाश्रय के चित्रों में बहुत बारीकी से रेखांकन किया है। यहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि यहाँ पहले भी चित्र थे। चित्रकारों ने उन चित्रों पर पुताई करके दोबारा नए चित्र बनाए हैं। यहाँ इसके प्रमाण मिलते हैं। आदिमानवों ने यहाँ लम्बा समय बिताया होगा। यहाँ के चित्र इसका प्रमाण देते हैं। ऐसा लगता है कि इन चित्रों को किसी एक व्यक्ति ने नहीं बनाया है। ये चित्र किसी एक काल के भी नहीं हैं।

चित्रकला के अनुभव के आधार पर लेखक का मानना है कि प्रागैतिहासिक काल की किसी महिला ने इन चित्रों को बनाया होगा। यह अनुभव से उपजा विचार है। पुरुषों की तुलना में महिलाएँ भावनात्मक रूप से अधिक कोमल होती हैं। यहाँ के चित्र भाव प्रधान हैं। कलाकारों ने लकीरें बहुत महीनता से खींची हैं। यहाँ के चित्र उस समय के समाज की झलक दिखाते हैं।


मानवों के पंजे, ज्यामितीय और बैल आदि के चित्र

भारतीय सन्दर्भ में महिला चित्रकार अपने लोक चित्रों में सजावट, प्रकृति, देवी और देवता, विवाह, उत्सव तथा घरेलू जीवन के दृश्य अधिक उकेरती हैं। पुरुष कलाकार अपने चित्रों में युद्ध, शिकार, राजकाज, भवन निर्माण और वीरता के दृश्य अधिक बनाते हैं।

इन दोनों विचारों के आधार पर यदि हम लिखामाड़ा शैलाश्रय के शैलचित्रों को देखें, तो यहाँ शिकार का कोई चित्र नहीं दिखता है। यहाँ के चित्रों में हाथ के पंजे, ज्यामितीय सजावट और सामूहिक नृत्य के दृश्य हैं। इन चित्रों में सभी लोग एक साथ समूह में नृत्य करते हुए दिखते हैं।

चित्रों को गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि लिखामाड़ा शैलाश्रय के अधिकांश चित्र किसी गर्भवती महिला ने बनाए होंगे। गर्भवती होने के कारण उसने शैलाश्रय में ही अधिक समय बिताया होगा। खाली समय में उसके मन में कई तरह के विचार आते होंगे। उस महिला ने अपने आने वाले बच्चे को जीवन की शिक्षा देने और संस्कृति से परिचय कराने के लिए इन चित्रों की रचना की होगी। जब शैलाश्रय में खाली जगह नहीं बची होगी, तब उसने पुराने चित्रों को मिटाकर उनके ऊपर नए चित्र बनाए होंगे। यहाँ इसके स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं।

इस विचार को सही साबित करने के लिए शैलाश्रय में एक गर्भवती महिला का चित्र भी मौजूद है। यहाँ के चित्रों में पतली और गहरी रेखाएँ दिखती हैं। ऐसी रचना निश्चित रूप से किसी कोमल मन वाली महिला ने ही की होगी। सम्भवतः यह चित्र उसी गर्भवती महिला ने बनाया है जिसका चित्र लिखामाड़ा शैलाश्रय में बना हुआ है।


शैलाश्रय में एक गर्भवती महिला का चित्र

हम एक चित्र में पारम्परिक वेशभूषा पहने एक दम्पति को नृत्य करते हुए देखते हैं। दोनों ने अपने सिर पर हॉर्नबिल पक्षी की पूँछ पहनी हुई है। दोनों का एक हाथ कमर पर और दूसरा हाथ ऊपर की ओर नृत्य की मुद्रा में है। पुरुष ने कमरबन्द भी पहना है। उसके सिर पर पक्षी के पंखों की संख्या अधिक है।


शैलचित्र में अंकित मानव आकृतियाँ

एक अन्य चित्र में चार बैलों के बीच एक मनुष्य खड़ा है। उस मनुष्य ने एक हाथ से एक बैल का सिर और दूसरे हाथ से दूसरे बैल की पूँछ पकड़ रखी है। यह चित्र बताता है कि उस समय के मानव ने पशुओं को पालना और उन पर नियन्त्रण करना सीख लिया था। इसे नवपाषाण काल का चित्र मान सकते हैं। यह संरक्षित और ज्ञात शैलाश्रय है। इस कारण इसके बारे में केवल नवीन शोध के तथ्य लिखना ही उचित है।

शैलाश्रय 2:
लिखामाड़ा शैलाश्रय से लगी हुई 18 फीट गहरी एक गुफा है। इसकी सतह चिकनी हो गई है। लगातार आने और जाने के उपयोग से सतह में घर्षण हुआ और वह चिकनी हो गई। गुफा के बाहर लाल गेरुए रंग के शैलचित्र बने हैं।


एक प्राचीन गुफा

संभवतः पहले जंगली जानवर इस शैलाश्रय का उपयोग करते होंगे। आदिमानव सुरक्षित निवास और खराब मौसम से बचने के लिए इसका उपयोग करते होंगे।

शैलाश्रय 3: 
दूसरे शैलाश्रय से आगे बढ़ने और पहाड़ी मोड़ पार करने पर तीसरा शैलाश्रय आता है। यह प्राकृतिक शैलाश्रय 22°26'17" उत्तरी अक्षांश और 83°14'40" पूर्वी देशान्तर पर समुद्र तल से लगभग 1184 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इसमें 10 सिरों वाली आकृतियाँ बनी हैं। विद्वान इसे दशानन रावण का चित्र मानते हैं।


दशानन रावण का चित्र

स्थानीय लोग भी यही मानते हैं। यदि यह दशानन रावण का चित्र है, तो यह पौराणिक काल की रचना हो सकती है। यह सवाल उठेगा कि क्या चित्रकारों ने शैलचित्रों में रामायण की कथा भी उकेरी थी?

इस आधार पर क्या हम शैलचित्रों को रामायण काल का प्रमाण मान सकते हैं? इन चित्रों के वैज्ञानिक परीक्षण से रामायण की तिथि तय करने में भी सहायता मिल सकती है। इस शैलाश्रय में तीन से चार दशानन रावण के चित्र मिलते हैं। इन चित्रों का वैज्ञानिक शोध करना आवश्यक है। यह पता लगाना जरूरी है कि ये वास्तव में किस काल के चित्र हैं। इन विशेषताओं के कारण यह एक विशेष और उपयोगी शैलाश्रय है।

शैलाश्रय 4: बन्दरमाड़ा
तीसरे शैलाश्रय से लगभग 50 मीटर आगे चलने पर चौथा शैलाश्रय आता है। यह शैलाश्रय 22°26'19" उत्तरी अक्षांश और 83°14'40" पूर्वी देशान्तर पर समुद्र तल से लगभग 1185 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इस शैलाश्रय में भी पौराणिक काल के शैलचित्र मिलते हैं। इसमें कुछ चित्र नवपाषाण काल के भी लगते हैं। यहाँ के प्रमुख चित्रों में से एक चित्र ऐसा है जिसमें कलाकार ने काले रंग के गड्ढे को सिर बनाकर एक विशाल आकार उकेरा है।

विशाल आकार कहने का अर्थ यह है कि चित्रकार ने इस शैलाश्रय में बन्दर और मानव के बीच युद्ध दिखाया है। युद्ध करने वाली आकृतियों की तुलना में यह आकृति बहुत बड़ी है। यदि हम तीसरे शैलाश्रय में रावण का चित्र मानते हैं, तो क्या चौथे शैलाश्रय का यह चित्र कुम्भकर्ण का हो सकता है? चित्रकारों ने यहाँ के शैलचित्रों में कुछ जगहों पर वानर और मानव का युद्ध उकेरा है।


शैल चित्र में बंदरों की आकृतियाँ

क्या यह राम और रावण का युद्ध है? यदि हम इसे कुम्भकर्ण नहीं मानते हैं, तो क्या यह बड़ी आकृति किसी राक्षस की है? चित्रकार ने इसके सिर के काले गड्ढे को अँधेरे से भरा दिखाया है। इसी शैलाश्रय में एक जगह दशानन का चित्र भी है। उसके आगे दो मानव आकृतियाँ मशाल जलाती हुई दिखती हैं। इसी शैलाश्रय में चक्र जैसे शुभ चिह्न भी बने हैं। क्या यह सब केवल एक संयोग है? या फिर चित्रकारों ने विचारपूर्वक रामायण की कथा पर आधारित चित्र बनाए हैं?


विभिन्न आकृतियाँ

ओंगना के शैलचित्रों को आधार मानकर हमें अन्य जगहों पर मिले शैलचित्रों का भी अध्ययन करना चाहिए। पौराणिक कथाओं को इतिहास का हिस्सा मानकर शोध करने की आवश्यकता है। ऐसा करके हम शैलचित्रों के प्रति पश्चिमी सोच को तोड़ सकते हैं। पुरातत्व के क्षेत्र में भारतीय विचारों को अपनाने से पुरानी धारणाएँ समाप्त होंगी। कोरबा जिले के सूअरलोट गाँव में सीताचौकी शैलाश्रय है। वहाँ सीताहरण की कथा से जुड़े शैलचित्र मिले हैं। उस विषय पर भी हमने अपनी खोज और विचार विद्वानों के सामने रखे हैं तथा शोध पत्र प्रकाशित किया है।

लिखामाड़ा शैलाश्रय के बड़े क्षेत्र में मध्य पाषाण काल के छोटे उपकरणों और पत्थरों का भण्डार है। ये उपकरण रत्नों और उपरत्नों के स्तर के हैं। इस कारण यह शैलाश्रय हर दृष्टि से बहुत विशेष है। इस पर बड़े अध्ययन की आवश्यकता है।

लेख:
श्री हरि सिंह,
जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा, छत्तीसगढ़

सहयोग एवं संदर्भ
प्रो. धीरेन्द्र सिंह मालिया, स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़।
बसन्त प्रधान, साक्षात्कार, केयर टेकर, लिखामाड़ा शैलाश्रय, ओंगना।

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