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भारतीय प्राचीन कथाओं में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना

भारतीय प्राचीन कथाओं में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना

भारत की प्राचीन भाषाओं संस्कृत, तमिल, तेलुगु, पालि, अपभ्रंश आदि में विविध विषयक कथाओं का अथाह भंडार है जिनसे भारतीय लोक-जीवन के असंख्य पहलू उजागर हुए हैं। आज के विविध ऐतिहासिक ग्रंथ या अन्य विविध भाषाओं में किये जाने वाले शोध उनको केवल कुछ ऊपरी तौर पर ही स्पर्श कर पाते हैं। हजारों वर्ष पुराने भारतीय लोक की जीवन-शैली के मर्म तक पहुंचने का प्रयास नहीं कर पाते।

आज के संक्रातिपूर्ण युग में, जबकि विविध परंपराएं, जीवन-शैलियां, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां भारतवासियों को दिग्भ्रमित सी कर रही हैं और एक सुव्यवस्थित, सुचिंतित, समन्वित और सुनियोजित जीवन-शैली के अभाव में अनेक प्रकार की अनपेक्षित समस्याएं मुंह बाएं खड़ी है, ऐसी स्थिति में भारत के प्राचीन चिंतन और मनीषियों की जीवन दृष्टि व दिशा-बोध परमावश्यक है। यह आवश्यकता प्राचीन विविध भाषाओं में प्राप्त ग्रंथों के परिप्रेक्ष्य में सरलता से पूरी हो सकती है।

दर्शन-शास्त्र, स्मृति, धर्म या नीति से संबंधित अनेक ग्रंथ यद्यपि प्राप्त हैं तथापि उनका गहन अध्ययन और मनन सर्व साधारण के लिए संभव नहीं है। कथाओं का माध्यम सरस, रोचक और यथार्थ दृष्टांतों से पुष्ट होकर लोकमानस को जल्दी प्रभावित करता है। मानवीय संवेदनाओं के विस्तार से चेतना का विस्तार ऊर्जस्थित और प्रभावी होता है। अतः भारतीय मनीषियों ने सामाजिक एवं सास्कृतिक मूल्य चेतना के लिए कथाओं को आधार बनाया।

इस प्रकार की कथाएं वैदिक साहित्य, पुराणों, रामायण, महाभारत में तो देखने को मिलती है, परंतु बौद्ध और जैन साहित्य में भी इन्हें उल्लेखनीय स्थान दिया गया है। इसके अतिरिक्त पंचतंत्र, बृहत्कथा, कथासरित्सागर, बृहत्कथा मंजरी, कथाकोश, बेताल बत्तीसी आदि अनेक कथा-ग्रंथों का प्रणयन हुआ। इन ग्रंथों में प्रस्तुत कथाओं की रचना केवल रोचक मनोरंजन की दृष्टि से नहीं हुई है, वरन् किसी भी साधारण सी लघुकथा में भी समाज अथवा संस्कृति का कोई न कोई ऐसा महत्वपूर्ण एवं उपादेय पहलू अवश्य निहित है जो मानव समाज के लिए आज भी अनुकरणीय है।

भारतीय संस्कृति विवेक, प्रेम, सहयोग, सहिष्णुता और सद्भावना की प्रतीक रही है। जहां प्रेम और स‌द्भावना रहती है वहां त्याग स्वयं आता है। अतः विवेक, प्रेम, सहयोग सद्भावना, सहिष्णुता भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग बन गये। जीवन-मूल्यों और उ‌द्दात भावनाओं का उत्कर्ष करने वाली अनेक कथाएं भारतीय प्राचीन साहित्य में भरी पड़ी हैं। परंतु पंचतंत्र में बालमनों पर उद्दात भावनाओं को अंकुरित करने का प्रयास कितना सार्थक और सबल है।

साथ ही इन कथाओं में पशु-पक्षियों के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से तादात्म्य कराया गया है। पारिवारिक स‌द्भाव और आतिथ्य-सम्मान की प्रेरणा देने के लिए पचतंत्र ने 'व्याध और कपोत कपोती' की कथा (पंचतंत्र तृतीय तंत्र-कथा-7) की रचना की जिसका उल्लेख यहां सर्वथा समीचीन होगाः-

'एक घने जंगल में एक बहेलिया घूम रहा था। उसका व्यवहार बहुत ही निम्नकोटि का था, अतः उसका न कोई मित्र था, न संबंधी और न कोई बंधु था। एक दिन उसने एक कबूतरी को पकड़ कर पिंजड़े में बंद कर दिया। तद्नंतर जब वह वन में घूम रहा था तो भयंकर वर्षा होने लगी, जिससे व्याध वर्षा से भीगकर कांपने लगा। वह शीत और भूख से पीड़ित एक वृक्ष के पास गया। वहां पर पहुंचते ही वर्षों रुक गयी और आकाश साफ हो गया। उस वृक्ष की शाखा पर बैठा हुआ कपोत अपनी पत्नी के वियोग में विलाप कर रहा था।

उसे देखकर कपोती ने उससे कहा कि यह व्याध ठंड और भूख से व्याकुल तुम्हारे घर पर आया है, तुम इसका आतिथ्य सत्कार कर आतिथ्य-धर्म का पालन करो। तदनंतर कपोत ने व्याध का स्वागत किया और कहीं से अंगारा लाकर उससे सूखे पत्तों में आग प्रज्जवलित कर अपने को उसमें डाल किया, जिससे व्याध अपना पेट भर सके।

यह देखकर व्याध बहुत दुखी हुआ और अपने को कोसने लगा। उसने कबूतरी को भी छोड़ दिया। यहां यह भी ध्यान देने के उपयुक्त सकेत हैं कि जिस व्यक्ति का व्यवहार निम्नकोटि का होता है उसका न कोई मित्र होता है न संबंधी और न कोई बंधु।'

'महाभारत' के आश्वमेधिक पर्व (अध्याय 90) की युधिष्ठर के यज्ञ-विषयक पर्व को नेवले द्वारा नष्ट करने की कुरूक्षेत्र निवासी उच्छवृत्तिधारी उदार ब्राह्मण से संबंधित कथा केवल युधिष्ठिर के अहंकार को कम नहीं करती है, यह मनुष्य के सरल जीवन, पारिवारिक सद्भावना प्रेम और त्याग का संदेश देती है। महाभारत के वनपर्व में उल्लिखित मुद्गल ऋषि की कथा भी पारिवारिक समरसता का उत्कृष्ट उदाहरण है। मुद्गल ऋषि शीलोच्छवृत्ति से अपना निर्वाह करते थे। उन्होंने अतिथियों की सेवा का व्रत ले रखा था।

वे अपनी पत्नी सहित पंद्रह दिन दाना चुगते थे तथा इसके बाद वे इष्टीकृत यज्ञ करते थे। ऋषि दुर्वासा मुद्गल की अतिथि सेवा का व्रत सुनकर रूप बदल कर भोजन के लिए उनके पास छह बार आये, परंतु मुदगल ने अपना धैर्य नहीं छोड़ा और उन्हें हर बार भोजन कराया। इस पर प्रसन्न होकर उन्हें स्वर्ग प्राप्ति का आशीर्वाद दिया, परंतु मुद्गल ने स्वर्ग की दासता का वर्णन सुन देवदूतों को वापस भेज दिया।

भारतीय संस्कृति का मूलाधार परिवार है। भारतीय मनीषियों ने परिवार और समाज में विवेक और उदात्त भावनाओं के उत्कर्ष में वृद्धि करने का निरंतर प्रयास किया। पारिवारिक संपन्नता में विवेक के महत्व को प्रतिपादित करने वाली, जैन साहित्य (ज्ञातधर्म कथा) में वर्णित कथा चावल के पांच दाने' (नायाधम्म-7) भी यहां द्रष्टव्य है-

'राजगृह में धन्य नाम का एक धनी और बुद्धिमान व्यापारी रहता था। उसके चार पुत्र थे। उसने सोचा कि उसकी अनुपस्थिति में परिवार को चलाने और मार्गदर्शन देने वाला कौन हो सकता है? यह सोच कर उसने अपनी चारों पुत्र-वधुओं को धान के पांच-पांच दाने यह कह कर दिये कि जब भी वह उनसे इन दानों को मांगे वे उसे वापस कर दें। सबसे बड़ी पुत्र-वधू ने वे दाने यह सोचकर फेंक दिये कि मेरे ससुर के कोठार में मनों धान भरा पड़ा है, जब मांगेगे, कोठार में से लाकर दे दूंगी। दूसरी पुत्र-वधू भी यह सोचकर कि जब ससुर मांगेंगे कोठार से धान लाकर दे देगी, उन धानों का छिलका उतारकर खा गयी।

तीसरी पुत्र-वधू ने दिये गये धान के दाने पिटारी में संभालकर रख दिये। चौथी पुत्र-वधू ने दिये गये धानों को खेती में क्यारियां बनवाकर नौकरों से बुववा दिया। इस प्रकार चार वर्ष में मनों धान हो गये जिसे उसने घड़ों में भर कर रख दिया। चार वर्ष बीत जाने पर जब धन्य ने अपनी पुत्र-वधुओं से धान मांगे तो पहली तथा दूसरी पुत्र-वधू ने उसे कोठार से लाकर धान दे दिये। तीसरी ने पिटारी से निकाल कर धान उसे वापस कर दिये।

अंत में व्यापारी ने चौथी पुत्र-वधू को बुलाया और धान वापस मांगे। यह सुनकर उसने कहा कि उसने धान के दाने घड़ों में भरकर रख दिये हैं, उन्हें यहां लाने के लिए गाड़ियों की आवश्यकता पड़ेगी। यह सुनकर धन्य प्रसन्न हुआ तथा उसने अपनी सबसे छोटी पुत्र-वधू को घर-बार सौंप दिया।

भारतीय प्राचीन कथाओं में हजारों वर्षों से निरंतर विकासमान भारतीय जीवन-शैली में निहित सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विकास की युग-परंपरा साकार होती दिखाई देती है। समाज और संस्कृति के अनेक आयाम और प्रस्थान-बिन्दु हैं। समाज, व्यक्ति, परिवार, रीति-रिवाज, आचार-विचार, व्यवहार, पर्व-त्योहार आदि तथा और भी अनेक अपेक्षित विषय हो सकते हैं। इसी प्रकार संस्कृति का दायरा और भी विस्तृत है।

मूल्य-बोध और आस्तिकता पर आधारित विविध देव परिकल्पना, जीवन जगत, प्रकृति और जीवन आदि से संबंधित विविध अवधारणाएं उनका लौकिक और परिलौकिक संदर्भ, धर्म-चेतना और नैतिक मूल्य आदि बहुत कुछ उस दायरे में समाहित होता है। इस प्रकार का सैद्धांतिक विवेचन कुछ प्रतिभावान, समर्थ लोगों के एकांत मनन या चिंतन का विषय हो सकता है।

अतः भारतीय समाज और संस्कृति के समग्र स्वरूप को समय-समय पर अनेक लेखकों ने कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया। संस्कृति के ये तत्व विविध कथाओं क माध्यम से मनोरंजन के साथ-साथ समाज द्वारा आत्मसात किये जाते रहे और इस परंपरा की निरंतरता बनी रही।इस प्रकार भारतीय प्राचीन कथाओं में कोई-न-कोई सांस्कृतिक मूल्य निहित है। भारतीय प्राचीन साहित्य में हजारों कहानियां वर्णित है जिनका ताना-बाना सांस्कृतिक चेतना के इर्द-गिर्द बुना गया है।

लेख-
-डॉ० रामशरण गौड़

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