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भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान - मृत्यु संस्कार

भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान - मृत्यु संस्कार

यह तो हम सभी को पता है कि संस्कार से आशय है शुद्धिकरण। मृत्यु अटल है, जो आया है उसे जाना ही है, इसलिए जीवन का अंत होने पर मृत्यु से सम्बन्धी संस्कारों को भी सनातन धर्म में उतनी ही महत्ता दी गयी है जितनी जन्म और विवाह से सम्बंधित संस्कारों को। ऐसी मान्यता है कि यदि मृत्यु संस्कार सही तरीके से और पूर्णरूप से न किये जायें तो मृतात्मा के मोक्षमार्ग में बाधा उत्पन्न होती है। अतः मृतक संस्कारों को करना अत्यावश्यक है। ये संस्कार मृतक के परिवार और सगे-सम्बन्धियों को शोक से उबरने तथा परिवार को एकजुट बनाये रखने की दृष्टि से भी बड़े महत्व के होते हैं। यहाँ हम कुछ जनजातीय समुदायों में किये जाने वाले मृतक संस्कारों पर दृष्टि डालेंगे और उनके भीतर निहित दर्शन पर भी विचार करेंगे।

गोंड जनजाति में शवाधान की पद्धति प्रचलित है। सामान्यतः शव को गड्ढा खोदकर धरती के सुपुर्द कर दिया जाता है। ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि मिट्टी देने पर मृतक धरती, आकाश, जल, वायु और अग्नि, इन पाँच तत्वों में विलीन हो जाता है। किन्तु यदि किसी की मृत्यु किसी बीमारी के कारण हुई हो, तब उसे जलाकर अंत्येष्टि संस्कार संपन्न किया जाता है। यदि मृतक पुरुष है तो सफ़ेद और यदि स्त्री है तो शव पर लाल कपड़ा डाला जाता है। शवाधान के बाद उस स्थान पर पत्थर गाड़ दिया जाता है।


मृतक संस्कार- गोंड समुदाय

मान्यतानुसार शव के चारों ओर चांवल, उड़द, दाल और हल्दी की सात गांठें बांधी जाती हैं। परिवार में यदि पुरुष की मृत्यु हुई हो तो यह अधिकार बड़ी बहू का और यदि महिला हो तो छोटी बहू का होता है। मिट्टी देने के पश्चात परसापेड़ की डंगालियों से एक मंडप बनाया जाता है, जहाँ थोड़ी सी मिट्टी रखकर पानी दिया जाता है। इस हेतु उरई की घास प्रयोग में लाई जाती है।

यह जल जब पुनः तालाब में प्रवाहित होता है, तब यह जलतत्व के पुनः उसी में मिल जाने का प्रतीक बनता है। मृत्यु पर शोक नहीं मनाया जाता क्योंकि पुनर्जन्म की अवधारणा के अनुसार बुजुर्गों का कहना है कि जीव उसी कुल में पुनः जन्म लेगा। एक विशेष बात यह नज़र आती है कि मृत्यु के समस्त संस्कार समधी पक्ष द्वारा किये जाते हैं।

गोंड समाज में कुंडा मिलाना वह रस्म है जिसमें परिवार अपनी पुरखा शक्ति को अपने आराध्य बुढ़ादेव या बुढ़ीमाई में स्थापित करता है। प्रत्येक गोत्र के अपने-अपने बुढ़ादेव होते हैं, क्योंकि इस समाज में दिवंगत पुरखों को ही बुढ़ादेव (पितृशक्ति) और बुढ़ीमाई (मातृशक्ति) का दर्जा प्राप्त है, जिनका वास साजा वृक्ष में माना जाता है।


मातृशक्ति एवं पितृशक्ति का सम्मान करते समुदाय के लोग

फसल पकने पर सर्वप्रथम उसे बुढ़ादेव को अर्पित किया जाता है, उसके बाद ही उसका उपयोग किया जाता है। बिसर पानी में मछली को पानी में डाला जाता है, संभवतः मछली की गंध को बिसर कहा जाता है।यदि मछली न मिल पाये तो बांस के डंठल को प्रतीकात्मक स्वरुप में प्रयुक्त किया जाता है। दशगात्र या दशमानी मृत्यु के बाद दसवें दिन किया जाता है।

इस दिन घर की गोबर से लिपाई-पोताई कर उसे स्वच्छ किया जाता है और स्वगोत्रियों के अलावा अन्य लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है। विवाह में जैसे माहला जाना होता है, वैसे ही यहाँ भी आगंतुक सहाय के रूप में चांवल, आटा, दाल आदि सामग्री साथ लेकर आते हैं। पुरुष इस दिन दाढ़ी और बाल मुंडवा देते हैं।


दशगात्र के दिन मुंडन का वर्णन गरुढ़ पुराण में भी मिलता है 

यदि मृतक विवाहित हो और उसकी मृत्यु असमी हो गयी हो तो उसकी पत्नी की चूड़ी तोड़कर पंचों के सामने ही उसे पुनः चूड़ी पहना दी जाती है। पुनर्विवाह देवर या अन्य परिस्थिति में किसी भी इच्छुक व्यक्ति से करवा दिया जाता है। यह रिवाज उस कठिन परिस्थिति से बचाव का सुन्दर रास्ता है जहाँ पति के मरणोपरांत स्त्री का भावी जीवन अंधकारमय हो जाता है।

मुरिया जनजाति में शव को नहलाकर उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सुलाया जाता है। इसके शव शैय्या तैयार की जाती है जिसमें बांस, दाब बाड़न, सियाड़ी डोरी, केला पत्ता आदि लगाया जाता है। शव यात्रा में आगे शव लेकर पुरुष और पीछे परिवार की महिलाएं चलती हैं। महिलाएं सुपा में लाई, चांवल और पैसा लिए होती हैं और शव पर छिड़कते हुए चलती जाती हैं।

जहाँ अंतिम संस्कार होना है, उससे कुछ दूर पहले शवयात्रा रूकती है। शव को नीचे रखकर सामग्री उसके चारों ओर डालकर सुपा तोड़कर वहीं फेंक दिया जाता है। फिर शावाधन स्थल पर पहुँचकर शव सहित गड्ढे की सात बार परिक्रमा होती है। मामा या भांजा शव को जल पिलाकर उसपर नमक छिड़कते हैं, फिर सभी लोग बारी-बारी से मिट्टी डालते हैं और उसी समय तरंडी को नष्ट कर दिया जाता है।


तरंडी विनष्टीकरण 

मुरिया समाज में मृत्युकाल ज्ञात करना बैगा या गुनिया द्वारा किया जाता है। ईमली का बीज, महुए की सात पत्ती लेकर छोटा गड्ढा खोदकर पूर्व-पश्चिम दिशा में क्रमवार पत्ते रखे जाते हैं। प्रत्येक पत्ते में थोड़ा पानी भरकर चिपड़ी बनती है और एक-एक करके ईमली के बीज डाले जाते हैं। जिस चिपड़ी में बीज का छिलका उतर जाए, मान लिया जाता है कि मृत्यु उसी काल में हुई है। ये चिपड़ियां संभवतः सात प्रहरों को प्रदर्शित करती हैं। मृत्यु का कारण ज्ञात करने की प्रक्रिया दूसरे या तीसरे दिन होती है।


मृत्युकाल का पता लगाता बैगा/ गुनिया 

मृतक और उसके समधी के घर में परस्पर मुर्गे की अदला-बदली की जाती है। चांवल के धरे बनाकर संदेहास्पद व्यक्तियों के नाम लिए जाते हैं, जिसके नाम पर मुर्गे दाने चुगने लगें, माना जाता है कि वही कारण है। एक धारणा यह भी है कि यदि चिता का धुआं सीधे ऊपर उठे तो मृत्यु प्राकृतिक कारणों से और यदि टेढ़ा-मेढ़ा जाए तो तांत्रिक प्रभाव के कारण मानी जाती है।

तीज नहानी सामूहिक स्नान है जो तीसरे दिन किया जाता है और नौवें या दसवें दिन बड़े नहानी होती है। नियत तिथि पर सभी एकत्रित होते हैं। पहले रंधारी के बाल और दाढ़ी बनाये जाते हैं ताकि वह नहा-धोकर रसोई का कार्य आरम्भ कर सके। पुजारी देवी-देवता का आह्वाहन कर अग्नि प्रज्ज्वलित करता है। एक स्थान पर दिया जलाकर चटाई बिछाई जाती है और भांजे को पैर धुलाकर चटाई पर बिठाया जाता है।
उसके सिर, हाथ और पैर पर चांवल-आटे का लेप लगाकर उसे ब्राह्मण स्वरुप मानकर मान दिया जाता है। वह वहीं बैठकर हवन करता है, हवन की राख का तिलक सभी को लगाया जाता है। फिर भांजे को तीन बार पानी पिलाकर दान दिया जाता है। मुड़ बंधाना उसी स्थान पर होता है जहाँ दान दिया गया। पुजारी सबको एक-एक फूल माला देता है और एक सदस्य के सिर पर पगड़ी बांधता है, फिर बाकी सदस्य भी पगड़ी बांधते हैं। बाद में गाँव के बुजुर्ग आपसी सहयोग और सामंजस्य की समझाईश देते हैं। यह रस्म मृतक के पश्चात योग्य व्यक्ति को भावी जिम्मेदारियों से अवगत कराने की पद्धति जान पड़ती है।
धुरवा जनजाति में शव को बाँधने के लिए रस्सी का प्रयोग नहीं होता। कफन या मृतचैल से ही शव को बांधा जाता है। माढा खोदरा शव दहन हेतु गड्ढा खोदने की रस्म है। मान्यता है कि गड्ढा खोदते समय बहुत जड़ें मिलें या अधिक विलम्ब हो तो यह शुभ संकेत नहीं होता। सायकुल (मरघट) गोत्र या टोटेम के आधार पर विभाजित होता है और किसी अन्य गोत्र के सायकुल में माढा खोदरा करना वर्जित है।

बिसरान तीसरे दिन की अनिवार्य रस्म है जिसमें मृत आत्मा के नाम से मांसाहार का तर्पण किया जाता है, क्योंकि मान्यतानुसार जब तक मृतात्मा के निमित्त मांस नहीं निकाला जाये, तब तक कुटुंबजनों के लिए मांसाहार वर्जित रहता है। सुमा कुयराना का प्रयोजन मृत आत्मा को बुलाना होता है। इसमें सायकुल जाने से पहले की क्रियाओं को दुहराया जाता है और वे लोग भी शामिल हो जाते हैं जो किसी कारणवश अंतिम संस्कार में उपस्थित न रह सके हों।

गहन विचार करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि अलग-अलग समुदायों में मृतक संस्कारों की रूपरेखा भले ही अलग दिखाई दे, लेकिन भीतर की भावना एक जैसी है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, इन पंचतत्वों में शरीर के विलय और आत्मा के पुनर्जन्म पर सभी परंपराएं अपना अटूट विश्वास प्रकट करती हैं।


भारतीय दर्शन में निहित पंचतत्व सिध्दांत

कहीं दफनाने की क्रिया का प्रचलन है, तो कहीं दाह-संस्कार; कहीं मांस-तर्पण है, तो कहीं सामूहिक स्नान और गोत्र-देवता की आराधना। हर जगह उद्देश्य यही है कि मृत आत्मा का मार्ग प्रशस्त हो और परिवार को सांत्वना तथा संबल मिले। इसी साझा आध्यात्मिक भूमि से भारतीय जीवन-दृष्टि की वह धारा प्रकट होती है जो संस्कारों की विविधता में भी एकता का स्वर सुनाती है।

प्रत्येक जनजातीय समुदाय में जन्म, प्रसव, नामकरण, मुंडन और शुद्धिकरण जैसे संस्कार प्रकृति और सामाजिक मेल-जोल के अनुरूप होते हैं। ये संस्कार जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को संरक्षित और पवित्र बनाते हैं तथा जीवन के चक्र से मुक्ति के लिए सतर्कता की सीख देते हैं। संस्कारों में प्रकृति पूजन, औषधीय रस्में, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सामाजिक नियमों का गहरा समावेश दिखता है।

इस प्रकार, जनजातीय संस्कार न केवल सामाजिक और आध्यात्मिक शुद्धता सुनिश्चित करते हैं, बल्कि उनका मूल उद्देश्य मानव जीवन को अर्थपूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति की ओर मार्गदर्शित करना है। और यदि उपरोक्त समानताओं के उजागर हो जाने के बावजूद यह स्वीकार कर लिया जाता है कि हम और जनजातीय समाज भिन्न अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं या यह कहा जाए कि जनजातीय हिन्दू नहीं हैं, तो निश्चय ही यह पाश्चत्य और वामपंथी विचारधाराओं के समक्ष युद्ध किये बिना ही आत्मसमर्पण कर देने वाली स्थिति होगी। अतः इस आलेख को पढ़ने के बाद भारतीय समाज पर की जाने वाली किसी भी टिप्पणी को मान लेने से पूर्व अपने स्वविवेक का प्रयोग अवश्य करें। यदि आप इस ओर सोचना भी प्रारंभ कर देंगे, तो इस लेख को लिखने की सार्थकता पूर्ण होगी।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

 

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