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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान: जन्म संस्कार

भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान: जन्म संस्कार

पदम् पुराण के एक श्लोकानुसार...
जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यक:।
पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशव:, चतुर लक्षाणी मानव:।। -(78:5 पद्मपुराण)

अर्थात जलचर नौ लाख, स्थावर अर्थात पेड़-पौधे बीस लाख, सरीसृप, कृमि अर्थात कीड़े-मकौड़े ग्यारह लाख, पक्षी/नभचर दस लाख, स्थलीय/थलचर तीस लाख और शेष चार लाख मानवीय नस्ल के। कुल चौरासी लाख। यानि की मानव रूप में जन्म लेने से पहले हम विभिन्न योनियों से होकर गुजरते हैं हमने किस योनी में जन्म लिया यह पूर्णतः हमारे कर्मों पर निर्भर करता है और इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने हेतु मनुष्य-जन्म लेकर प्राणी को अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता हैं। संभवतः इसीलिए मानव जीवन में संस्कारों का बहुत अधिक महत्व है। संस्कारों का अर्थ है दोषों का परिमार्जन करना और जीवन को चारों पुरुषार्थों, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के योग्य बनाना। संस्कार नए गुणों का विकास करने और पुराने दोषों केशुद्धिकरण में बहुत अहम् भूमिका निभाता  है। मानव अपने जीवन में किसी भी वस्तु, जड़ अथवा चेतन किसी भी अवस्था, का उपयोग उसे संस्कारित करके अर्थात दोषमार्जन करके ही करता है और यही संस्कार का भी प्रयोजन है।


सनातन धर्म में निहित षोडश संस्कार

जब हम हमारे सनातन धर्म की जड़ों को ढूंढते हुए गहराई में पहुँचते हैं तब वह हमें जनजातीय समाज की ओर ले जाती है जहाँ न केवल हमारी परम्परों का, संस्कारों और आस्था का प्रारंभिक स्वरुप दिखाई पड़ता है बल्कि समाज के रूप में हमारी मूल अवधारणा का भी बोध होता है। जनजातीय समाज में संस्कार प्रकृति, जल, पर्वत, सूर्य आदि के पूजन एवं समाजिक मेल-जोल से विकसित होते हैं। इसलिए जब हम इन संस्कारों को विश्लेषण की दृष्टि से देखते हैं तब इनमे और षोडश संस्कारों में बहुत साम्यता दिखाई पड़ती  है जैसे जन्म, विवाह और मृतक संस्कार। यहां हम जनजातीय समाज में संपन्न किये जाने वाले जन्म  संस्कारों पर विचार करेंगे और जैसे जैसे आगे बढ़ते जायेंगे तब हमारे और जनजातीय समाज के मध्य निहित शाश्वत अंतर्संबंध के सन्दर्भ में व्याप्त भ्रांतियों, जैसे कि वे हिन्दू नहीं हैं, उनके विश्वास और आस्थाएं अलग हैं या वे किसी और ही नस्ल के मनुष्य हैं, को दूर करना सरल हो जायेगा ।

बैगा समुदाय में गर्भकाल और प्रसव जैसे ही स्त्री के गर्भवती होने की सूचना मिलती है तब हर्ष का माहौल तो रहता है किन्तु कोई विशेष आयोजन नहीं होता। गर्भवती स्त्री अपनी सामान्य दिनचर्या में ही संलग्न रहती है। समय-समय पर अनुभवी एवं बुजुर्ग महिला द्वारा भावी माता को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। प्रसव को सरल बनाने के लिए प्रसूता को माई बेला की जड़ दी जाती है और उसकी हथेली तेल में डुबाकर दीवार पर थाप दी जाती है, यदि पांचो उँगलियों की थाप दीवार पर अच्छे से बन जाती है तो माना जाता है की इससे प्रसव आसान हो जाता है। प्रसव सुनमायी(दाई) द्वारा घर पर ही कराया जाता है। जन्म के बाद नाल काटकर माता को दी जाती है जिसे वह प्रसव कक्ष में ही एक गड्ढा खोदकर गड़ा देती है और वहां आग जलाई जाती है। इसके बाद जच्चा बच्चा को गर्म पानी से स्नान कराया जाता है। जन्म के अवसर पर गाँव के मुखिया को आमंत्रित किया जाता है जिनके द्वारा दीप प्रज्ज्वलन किया जाता है, तत्पश्चात छोटे बच्चे के पैरों को धोया जाता है, मदिरा गिराई जाती है और बच्चे को माला पहनाया जाता है और अपनी स्थितिनुसार रुपए या भेंट बच्चे को दी जाती है। मुंडन और नामकरण संस्कार में नामकरण  प्रायः शिशु के नाना या मामा द्वारा किया जाता है। अधिकांशतः नाम दिन, माह या बच्चे की किसी शारीरक विशेषता पर आधारित होते हैं। यदि शिशु के जन्म के बाद यह आभास हो जाये कि शीघ्र हे उसकी मृत्यु होने वाली है तब एक अगरिया को बुलाकर उसे कुछ धन और मांस दिया जाता है जिसका आशय होता है कि जीवन बचाने के लिए बच्चे को उसे सौंप दिया गया है।


नामकरण संस्कार

मुरिया समुदाय में गर्भावस्था के नौ माह की अवधि में समय- समय पर बैगा द्वारा जच्चा-बच्चा की जांच की जाती है। मुरिया लोग नाल को बोमली कहते है। प्रसूता को तीरे दिन कसा पानी दिया जाता है जो एक औषधियुक्त द्रव्य होता है, इसे ककईजड़, आम छाली, डूमर और बेल के पत्ते, सुगंधा आदि, लगभग 21 प्रकार की जड़ी-बूटियों से तैयार किया जाता है जिसे प्रसूता को देने से पूर्व पुजारिन द्वारा इष्ट देवों और पितरों को अर्पित किया जाता है। शुद्धिकरण 5-6 दिन में होता है क्योंकि जब तक बोमली नहीं झड़ जाती प्रसूता को असुधा माना जाता है। नामकरण संस्कार बच्चे के जन्म के 21 दिन बाद या कसा पानी रस्म के दो हफ्ते बाद आयोजित होता है जिसे छठी कहकर संबोधित किया जाता है। छठी से पहले घर की सफाई, लिपाई और कपड़ों की धुलाई की जाती है, कसे का पानी बनाकर घर के चारों ओर छिड़काव किया जाता है। छठी के दिन नई हांडी, सात चावल के दाने, नया कपड़ा, कलश और दिया स्थापित कर प्रसूता और बच्चे को नए कपड़े पहनाकर बैठाया जाता है, टीका, चावल और कुछ पैसे के साथ शुभकामना दी जाती है, अंत में भोजन कराया जाता है और उसी दिन से प्रसूता घर का सामान्य कामकाज शुरू कर देती है।

गोंड समुदाय में जन्म संस्कार को टुंडा कहा जाता है और गर्भधारण के पीछे मान्यता है कि किसी पूर्वज का पुनर्जन्म होने वाला है। प्रसव पीड़ा आरम्भ होते ही घर के मुखिया द्वारा पूजा कक्ष खोल दिया जाता है। गोंड जनजातियों में शिशु के जन्म को धरती में बीज के अंकुरण और पौधे के वृक्ष रूप में विकसित होने के समान देखा जाता है। नाल गड़ाने की रस्म के लिए ऐसे स्थान का चयन किया जाता है जहाँ आग लगाई जाती है। मुंडन संस्कार जन्म के पांचवें या बारहवें दिन के पश्चात शोभनी रस्म के रूप में होता है, बच्चे की कमर पर काले रंग का रेशमी धागा बांधा जाता है जिसमें पांच लड़ होती है जो पञ्च तत्वों का प्रतिधित्व करती है। मुंडन की रस्म समधी पक्ष द्वारा और बच्चे का अन्य नेग बुआ द्वारा किया जाता है। नामकरण संस्कार घर के मुखिया द्वारा संपन्न किया जाता है। पूर्वजों की पहचान हेतु बारी- बारी से घर के पूर्वजों का नाम लिया जाता है जिस नाम पर शिशु दुग्धपान करना आरम्भ कर दे ऐसा मान लिया जाता है की उन्होंने ही पुनः जन्म लिया है। शिशु को गाय का दूध नहीं दिया जाता क्योंकि मान्यता है कि गाय का दूध उसके बछड़े के लिए है।


शोभनी रस्म- पांच लड़ वाला कला रेशमी धागा 

धुरवा जनजाति में गर्भधारण का पता चलते ही भावी पिता सिरहा के घर चांवल लेकर जाता है जिसे पूजा कर सिरहा लौटाता है। प्रसव होने को “पाईंग ऐर्शाना” कहा जाता है और प्रसूता को लकड़ी के पीछे बैठाकर प्रसव कराया जाता है जिसे “बोड मुरताल” कहते हैं। नाल काटने में विशेष बात यह है कि यदि संतान लड़का है तो नाल तीर से और लड़की है तो नाल चाकू से काटी जाती है। छठी संस्कार लड़का होने पर नौ दिनों बाद और लड़की होने पर बारह दिनों बाद होता है, प्रसूता को तालाब ले जाकर हल्दी, सिंदूर, चांवल और ‘मेल’ की बूंद टपकाकर शुद्ध किया जाता है। प्रथम बहिर्गमन में पेरमा- पुजारी द्वारा बाजार स्थल निकट वृक्ष की पूजा कर परिक्रमा कराई जाती है। इसके बाद नामकरण संस्कार होता है और बोड मुरताल को बुलाकर सम्मानित किया जाता है।

हल्बा जनजाति में प्रसव के बाद तीन दिन तक कसा पानी दिया जाता है। तिलगुड़ खाई रस्म जन्म के तीन दिन बाद होती है जिसमें तिल और गुड़ के साथ कालीमिर्च, सोंठ, लहसुन, अजवायन, आमी हल्दी इत्यादि का प्रयोग होता है, और पूर्वजों की पहचान हेतु सियाड़ी की डंठल के सहारे नाम लिए जाते हैं। छठी (नामकरण) संस्कार तिलगुड़ रस्म के सात दिनों बाद होता है, बच्चे का मुंडन करवाया जाता है, पुरुष सदस्य भी दाढ़ी या बाल कटवाते हैं, बुआ बालों को दोने में लेकर जल में प्रवाहित करती है। पायें धोतोर रस्म में दादा-दादी दूब से बच्चे का पैर धोते हैं और चांवल गिराकर आशीर्वाद देते हैं। हांडी छियातोर रस्म में पेज बनाया जाता है। पतरी घुमातोर रस्म में सिगभात पर दिया रखकर माँ पत्तल घुमाती है और बच्चे की सिंकाई की जाती है। नामकरण में ‘ओरा-ओरी’ परंपरा के अनुसार थाली या टिन बजाकर उद्घोष किया जाता है और छठी में बना भोजन सर्वप्रथम देसी-देवताओं को अर्पित किया जाता है।


मुंडन संस्कार- सनातन धर्म में प्रचलित शुद्धि संस्कारों में से एक

धनवार समुदाय में गर्भधारण का पता चलते ही ग्राम देवी के समक्ष मंगल कामना की जाती है और इमली के पेड़ के पास जाना निषेध होता है। प्रसव पश्चात माता शिशु को दुग्धपान कराने से पूर्व उसे धरती पर अर्पित करते है। नामकरण का अधिकार बुआ, फूफा, दादा-दादी अथवा मौसी किसी को भी हो सकता है। पूर्वज पहचान हेतु कांसे की बटकी, पानी, घास और चांवल का उपयोग होता है। कर्णभेदन 4-5 वर्ष में होता है, बालक का केवल कर्णछेदन और लड़की के लिए नाक एवं कान दोनों छिदवाया जाता है ।


कर्णभेदन संस्कार

धनुवार मानते हैं कि यदि जीवित रहते यह संस्कार नहीं हुआ तो मृत्यु के पश्चात यमदूतों द्वारा सब्बल से कर्णभेदन किया जाता है। दोरला समुदाय में इसे ‘मुख-कोटना’ और मुंडा समुदाय में “लुतुर-तुकुई” कहा जाता है। पहाड़ी कोरवाओं में यह संस्कार मामा-मामी के लिए विशेष होता है, सुई से कर्णछेदन के बाद भेंट दी जाती है और हंडिया पीकर नृत्य-गीत गाकर उत्सव होता है।


संस्कार संपन्न होने के बाद उत्सव मनाता आरण्यक समाज

चूँकि पुनर्जन्म की अवधारणा पर जनजातीय समुदाय का अटूट विश्वास है अतः कुछ लोग बच्चे के पैर धुले जल को अपने पूर्वजों का आशीर्वाद मानकर ग्रहण करते हैं। इस प्रकार जब हम इन संस्कारों को देखते है तो षोडश संस्कारों में वर्णित जन्म्संस्कारों से पूर्णतः साम्यता दिखती है इसलिए इन्हें भिन्न कहने के स्थान पर देश, काल व परिस्थितिनुसार विविध की संज्ञा देना ज्यादा उचित होगा। इन सभी संस्कारों का सार तत्व यही है कि यहाँ भी सनातन की आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत पर बहुत दृढ़ विश्वास है और यह तथ्य इस भ्रम को तोड़ने में बहुत अहम् भूमिका निभाता है कि “जनजातीय समाज हिन्दू नहीं है”।

लेख- 
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी - भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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