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सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य एवं पुस्तकालय

सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य एवं पुस्तकालय

भारत एक लोकतंत्रात्मक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। जहाँ विभिन्न जाति, विभिन्न धर्म एवं विभिन्न समुदाय के लोग निवास करते हैं, जिनमें जातिगत, धर्मगत एवं भाषागत स्तर पर असमानता है, परन्तु राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक स्तर पर समानता है। यहाँ की संस्कृति प्राचीनतम है एवं सांस्कृतिक चेतना वैभवशाली रही है। सभ्यता एवं संरकृति का सूर्योदय सर्वप्रथम इसी देश में हुआ तथा सत्य, प्रेम, शौर्य, सदाचार, दानशीलता, दयाशीलता एवं अहिंसा का संदेश इसी राष्ट्र ने सारे संसार को प्रदान किया है।

भारत ने ही विश्व को सभ्य बनाया एवं ज्ञान का आलोक दुनिया में फैलाया। इस देश की संस्कृति पर विदेशी आक्रमणकारियों के रूप में भारत आये मंगोल, मुगल, हूण आदि समुदायों की संस्कृतियों का प्रभाव भी समय-समय पर पड़ा है, जिस कारण इन संस्कृतियों के सम्मिश्रण से भारतीय संस्कृति और भी अनूवी एवं निराली बन गयी है।

स्वच्छन्दतावाद के प्रख्यात कवि एवं काव्यशास्त्री टी. एस. इलियट ने संस्कृति को पारिभाषित करते हुए लिखा है कि संस्कृति में मानव की समस्त रूचि एवं चारित्रिक गतिविधि सन्निहित है। समाज मनोवैज्ञानिक इडवार्ड टेलर अपनी पुस्तक 'प्रीमीटिव कल्चर में लिखते हैं संस्कृति वह ग्रन्थि है, जिसमें समाज के एक सदस्य के रूप में मानव द्वारा अर्जित ज्ञान, विश्वास, कला, रीति-रिवाज, नैतिक आचरण, अन्य आचरण एच अभ्यास निहित रहता है। इन विद्वानों के तथ्यात्मक विचारों एवं प्रासंगिकता के सन्दर्भ में दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए पुस्तकालय एक सास्कृतिक समुदायिक केन्द्र है, जिसमें मानवीय चेतना एवं राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों को दुलर्भ पांडुलिपियो तथा पुस्तक के रूप में धरोहरों को व्यवस्थित रूप में संग्रहीत करके रखा जाता है, ताकि मानवीय चेतना एवं सांस्कृतिक गरिमा का हास न हो सके एवं मानव अतीत रूपी ज्ञान को अर्जित कर दिन-प्रतिदिन लक्ष्य की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो।

अतः पुस्तकालय एव मानव समाज एक दूसरे के पूरक है साथ ही दोनों एक दूसरे पर निर्भर भी है। मानवीय समाज के बिना पुस्तकालय का उद्भव संभव नहीं है एव पुस्तकालय के बिना समाज का कोई महत्व नहीं रहता है। ख्यातिप्राप्त विद्वान जे. एच. शेरा अपना मन्तव्य प्रस्तुत देश की सांस्कृतिक जागरूकता का आधार स्तम्भ होता है। फ्रांस की राज्य क्रान्ति (1789) इसका ज्वलन्त प्रमाण है।

सांस्कृतिक जागरूकता के द्वारा ही सामाजिक एवं राजनीतिक विषमता से उत्पन्न आपसी कटुता एवं भेदभाव को समाप्त कर देश के नागरिक को एकता के सूत्र में पिरोया जा सकता है। सार्वजनिक पुस्तकालय सेवा का लाम लेने वाले व्यक्तियों को भाषा एवं साहित्य की विविध विधाएं जैसे-उपन्यास, कहानी, नाटक, काव्य, एकांकी, रिपोर्ताज, आलोचना के अतिरिक्त देशभक्ति, धार्मिक, सम-सामायिक विषयों पर आधारित भारतीय भाषा में लिखित पुस्तकों के अतिरिक्त पत्र-पत्रिकाएं भी सहजता से पठन हेतु उपलब्ध रहती है, अतएव छोटे गांवों एवं कस्बो में निवास करने वाले व्यक्ति जो अर्थाभाव के कारण उच्च शिक्षा को प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं, उनके लिए सार्वजनिक पुस्तकालय एक उपयोगी माध्यम है।

इस  पुस्तकालय का लाभ उन्हें अवश्य लेना चाहिए। अतएव निरक्षरता को दूर कर साक्षरता के प्रचार-प्रसार में सार्वजनिक पुस्तकालय की एक महत्वपूर्ण भूमिका है, यह अनौपचारिक शिक्षा का एक आवश्यक अंग भी है। इस दृष्टि से ज्ञान या शिक्षा के एक अनुषंगी के रूप में सार्वजनिक पुस्तकालय विद्यमान है। अतः इसकी महत्ता असीम है।

हमारे देश में हालांकि सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना में वर्ष प्रतिवर्ष क्रमिक रूप से वृद्धि हुई है साथ ही उनमें अत्याधुनिक सुविधाओं को अभिगृहित करके उनका सफल संचालन कर विकसित करने की सुविधा प्रदान की गयी है, जिनमें दृश्य-श्रव्य राागग्रियों भी है ताकि शैक्षणिक प्रयोजन से इन दृश्य-श्रव्य सामग्रियों का उपयोग करके युवा प्रौढ़ वर्ग के व्यक्ति अपने ज्ञान को उन्नत कर सकें। डॉ. श्री रंगनाथन ने लिखा है "भारत के वर्तमान प्रौढो की मानसिक उन्नति की व्यवस्था करने के लिए पुस्तकालय के सिवा दूसरा साधन नहीं है।"

आज जब की देश की जनसंख्या नई शहस्त्राब्दि के प्रथगार्द्ध में एक अरब से अधिक हो गई है एवं हमारी सरकार स्थानीय निकायों के सहयोग के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों में अधिकाधिक पुस्तकालयों की स्थापना कर उनमें अत्याधुनिक सुविधा के साधन के रूप में कम्प्यूटर के जरिये ज्ञान को विकसित करने हेतु राकल्पित है, वैसी स्थिति में देश के एक आदर्श नागरिक होने के नाते हमारा भी यह कर्तव्य होता है कि इस महत्वपूर्ण कार्य में उदारतापूर्वक अपना हाथ बटाएं। राष्ट्र शिक्षित होगा तो हमारा मनोबल बढ़ेगा।

यूनेस्को ने भी ऐसा ही अपना गत स्थापित किया है। आज संसार के सभी सभ्य राष्ट्र आधुनिक ढंग से पुस्तकालयों के विकास के लिए प्रयत्नशील है। सच तो यह है कि हमारा देश भी इस कार्य को पूरा करने हेतु कृतसंकल्प है। सार्वजनिक पुस्तकालयों की अधिकाधिक स्थापना उनमें अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराना एवं उनका सफल संचालन करना ही सरकार का ध्येय है। अतः देश के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में सार्वजनिक पुस्तकालयों का स्थान असीम है।

भारत सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा प्रतिष्ठिापित एव पूर्णतः वित्तपोषित एक स्वायत्तशासी सगठन के रूप में राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान, कलकत्ता राज्य सरकारों, केन्द्रशासित प्रदेश के प्रशासनों तथा पुस्तकालय सेवा एवं लोकशिक्षा को विकसित करने में रत अन्य गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से सम्पूर्ण देश में पुस्तकालय आन्दोलन को विकसित करने हेतु एक राष्ट्रीय अभिकरण के रूप में विगत ढाई दशक से कार्यरत है।

पुस्तकालय आन्दोलन का गूल लक्ष्य सर्वजागरण में पठन अभिरूचि जागृत करना तथा उनका विकास कर ज्ञान का प्रसार करना होता है। अतः अधिकाधिक सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना कर उनके सफल राचालन की व्यवस्था करना ही पुस्तकालय आन्दोलन का उद्देश्य है। विगत दाई दशक में प्रतिष्ठान ने विभिन्न स्तर के तीस हजार से अधिक सार्वजनिक पुस्तकालयों को सहायता प्रदान कर पुस्तकालय आन्दोलन को विकसित किया है।

प्रतिष्ठान पुस्तक, फर्नीचर, उपष्कर, रैक, दृश्य-श्रव्य सामग्री के क्रय, पुस्तकालय भवन के निर्माण, विस्तार, बदलाव, शैक्षणिक एवं सांरकृतिक विकास के लिए संगोष्ठी, कार्यशाला, अभिविन्यास, पुनश्चयाँ, पुस्तक मेला, चल पुस्तकालय सेवा आदि कार्यक्रम के आयोजन हेतु अपने समतुल्य एवं गैर-समतुल्य स्रोत से सहायता प्रदान करता है।

आवश्यकता इस बात की है कि प्रतिष्ठान द्वारा प्रदत्त सहायता का उपयोग गैर-सरकारी एवं सरकारी संगठन सार्थक रूप से करें तथा अपने क्षेत्र में लोक पुस्तकालयों का विकास कर जन जन में पठन अभिरूचि को जागृत करें ताकि शिक्षित मानव शिक्षित समाज का निर्माण कर राष्ट्र को समृद्धशाली बना सकें एवं देशवासियों में आत्मगौरव की भावना मुखरित हो सके।

श्री रवीन्द्र नाथ झा
सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य एवं पुस्तकालय
"संस्कृति: अंक -01"

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