आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

आइये जाने भारत के राष्ट्रीय पंचांग को

आइये जाने भारत के राष्ट्रीय पंचांग को


यूँ तो समय के आदि और अन्त नहीं है, किन्तु मानव सभ्यता ने अपने सामाजिक, नागरिक और धार्मिक कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए समय को दिनों, महीनों और वर्षों में बाँटने की प्रणाली विकसित की है। आज हम भले ही अपने कार्यालयीन और नागरिक कार्यों के लिए मुख्य रूप से ग्रेगोरियन (अंग्रेज़ी) कैलेण्डर का उपयोग करते हैं, किन्तु एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत का अपना एक 'राष्ट्रीय पंचांग' (National Calendar) भी है [1, 2]। पर हममे से अधिकांश नहीं जानते कि यह राष्ट्रीय पंचांग आखिर क्या है, इसे क्यों बनाया गया, और इसके पीछे हमारे पुरखों का कौन-सा खगोलीय विज्ञान काम कर रहा है।


भारत का राष्ट्रीय पंचांग क्या है?
भारत का राष्ट्रीय पंचांग देश के लिए एक एकीकृत, वैज्ञानिक और पूर्ण रूप से सटीक काल-गणना की प्रणाली है। आज़ादी के बाद भारत सरकार द्वारा पंचांगों में सुधार के लिए १९५२ में प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में 'पंचांग सुधार समिति' (Calendar Reform Committee) का गठन किया गया था [3, 4]। इस समिति ने गहन वैज्ञानिक अध्ययन के बाद जिस पंचांग की रूपरेखा तैयार की, उसे ही 'राष्ट्रीय पंचांग' कहा जाता है [5, 6]। 

1952 में प्रो. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में गठित पंचांग सुधार समिति ने राष्ट्रीय पंचांग की नींव रखी।
1952 में प्रो. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में गठित पंचांग सुधार समिति ने राष्ट्रीय पंचांग की नींव रखी।

यह पंचांग ऐतिहासिक 'शक संवत' (Saka Era) पर आधारित है [7, 8]। इसका नववर्ष 'चैत्र' मास से आरम्भ होता है, जो कि वसंत ऋतु का परिचायक है [9, 10]। राष्ट्रीय पंचांग को ग्रेगोरियन कैलेण्डर के साथ इस प्रकार जोड़ा गया है कि इसकी तिथियाँ हर साल एक ही दिन पड़ती हैं। इसका सामान्य वर्ष ३६५ दिन का और अधिवर्ष (Leap year) ३६६ दिन का होता है [8]। चैत्र का महीना सामान्यतः ३० दिन का होता है और २२ मार्च से शुरू होता है, किन्तु अधिवर्ष में चैत्र ३१ दिन का हो जाता है और २१ मार्च से शुरू होता है [8, 10]। वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद मासों में ३१-३१ दिन होते हैं, जबकि आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन में ३०-३० दिन होते हैं [9-11]। 

राष्ट्रीय पंचांग की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब हमारे देश में पंचांगों को लेकर एक भयानक भ्रांति और उलझन (terrible calendar confusion) फैली हुई थी [12, 13]। देश के विभिन्न प्रान्तों में लगभग ३० अलग-अलग प्रकार के पंचांग प्रचलित थे [1, 14]। इन पंचांगों के नववर्ष अलग-अलग दिन शुरू होते थे और इनके गणना के तरीके भी अलग थे [1, 14]। इस कारण एक ही त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में, यहाँ तक कि एक ही शहर में अलग-अलग दिनों में मनाया जाता था [14, 15]। 

एक ही त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में
एक ही त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में

इस उलझन का सबसे बड़ा कारण यह था कि हमारे पंचांगकर्ता प्राचीन सूर्य सिद्धान्त आदि ग्रंथों पर निर्भर थे। लगभग ४०० ईस्वी के आस-पास रचे गए इन ग्रंथों में वर्ष की लम्बाई ३६५.२५८७५६ दिन मानी गई थी [16, 17]। आधुनिक विज्ञान के अनुसार एक ऋतु-वर्ष (Tropical year) की वास्तविक लम्बाई ३६५.२४२२ दिन होती है [16, 18]। इस प्रकार प्राचीन ग्रंथों की गणना में वर्ष की लम्बाई वास्तविक लम्बाई से लगभग २४ मिनट (.०१६५६ दिन) अधिक थी [16, 19]। 

चूँकि हमारे प्राचीन पंचांगकर्ताओं ने 'अयनचलन' (Precession of the Equinoxes) अर्थात् विषुव बिन्दुओं के खिसकने की प्रक्रिया को पूरी तरह से नहीं समझा था, इसलिए पिछले १४०० वर्षों में यह त्रुटि जुड़ते-जुड़ते २३.२ दिन की हो गई थी [16, 19]। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारे प्राचीन ग्रंथ जिस वसंत सम्पात (२१ मार्च) के दिन से नववर्ष की शुरुआत मानते थे, वह खिसक कर १३ या १४ अप्रैल पर पहुँच गया [16, 19]। हमारे त्योहार अपने वास्तविक प्राकृतिक मौसमों (ऋतुओं) से २३ दिन आगे खिसक गए थे [19, 20]। इसी भारी गड़बड़ी और उलझन को सुधारने के लिए एक सटीक और वैज्ञानिक राष्ट्रीय पंचांग की आवश्यकता महसूस हुई [2, 13]।

कालगणना का आधार क्या है?
राष्ट्रीय पंचांग की कालगणना विशुद्ध खगोल विज्ञान (Astronomy) और प्रकृति के वास्तविक चक्र पर टिकी है। 
१. सायन वर्ष (Tropical Year): राष्ट्रीय पंचांग में वर्ष की लम्बाई ३६५.२४२२ दिन मानी गई है, जो कि सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा का एकदम सटीक समय है [18, 21]। 
२. नववर्षारम्भ: इस पंचांग का वर्ष 'वसंत सम्पात' (Vernal Equinox) के अगले दिन से शुरू होता है। यह वह खगोलीय घटना है जब दिन और रात बराबर होते हैं [18, 21]।
३. केन्द्रीय मानक स्थान: तिथियों और समय की गणना पूरे भारत के लिए एक ही हो, इसके लिए ८२°३०' पूर्वी देशान्तर और २३°११' उत्तरी अक्षांश (जो कि प्राचीन खगोल-नगरी उज्जैन का अक्षांश है) को केन्द्रीय स्थान (Central Station) माना गया है [22-24]।
४. दिन का आरम्भ: नागरिक कार्यों के लिए दिन की शुरुआत मध्यरात्रि से मानी गई है, जबकि धार्मिक कार्यों के लिए स्थानीय सूर्योदय को आधार माना गया है [23, 25]।

प्राचीन सौर व चान्द्र-सौर कैलेण्डर्स की विशेषताएं जो इसमें समाविष्ट हैं
राष्ट्रीय पंचांग को गढ़ते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि आधुनिक विज्ञान के साथ-साथ हमारी समृद्ध खगोलीय परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर भी बची रहे:

शक संवत का उपयोग: आज़ादी के बाद विक्रम, कलियुग या किसी अन्य संवत की बजाय 'शक संवत' को चुना गया। इसका कारण यह है कि आर्यभट और वराहमिहिर के समय से लेकर आज तक पूरे भारत के खगोलविदों और पंचांगकर्ताओं ने अपनी वैज्ञानिक गणनाओं के लिए मुख्य रूप से शक संवत का ही उपयोग किया है [7, 26, 27]। यह पूरे देश में वैज्ञानिक गणना का एक सर्वमान्य आधार रहा है।

महीनों के प्राचीन नाम: पंचांग को वैज्ञानिक बनाने के लिए महीनों के नाम बदले नहीं गए, बल्कि चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ जैसे जनमानस में रचे-बसे प्राचीन नामों को ही बनाए रखा गया [9, 28]।

भारत का राष्ट्रीय पंचांग ‘शक संवत’ पर आधारित एक वैज्ञानिक और एकीकृत कालगणना प्रणाली है।
भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर

चान्द्र-सौर (Luni-solar) समन्वय: भारत के अधिकांश धार्मिक त्योहार चन्द्रमा की गति (तिथियों) पर निर्भर करते हैं। इसलिए पंचांग सुधार समिति ने पुरानी परंपरा का सम्मान करते हुए चन्द्र कैलेण्डर को सौर कैलेण्डर (ऋतुओं) के साथ 'अधिक मास' (मल मास) और 'क्षय मास' की पद्धति द्वारा सफलतापूर्वक बाँधा (pegging) है [29-31]। इससे हमारे धार्मिक त्योहार अपने सही मौसमों में ही पड़ेंगे।

मध्यरात्रि से दिन का आरम्भ: नागरिक कार्यों के लिए मध्यरात्रि से दिन गिनने की प्रणाली भी पश्चिमी नहीं है, बल्कि प्राचीन काल में 'अर्धरात्रिक' प्रणाली (Ardharatrika system) के रूप में हमारे प्राचीन सूर्य सिद्धान्त का ही एक हिस्सा रही है [18, 32]।

तिथियों की आधुनिक गणना: पहले जहाँ अलग-अलग पंचांगों में तिथियों की समाप्ति का समय अलग-अलग आता था, वहीं अब नॉटिकल अल्मनैक (Nautical Almanac) के आधार पर सूर्य और चन्द्रमा की आधुनिक और अचूक आभासी गति (true motion) का उपयोग करके तिथियों और नक्षत्रों का निर्धारण किया जाता है [33-35]। 

"राष्ट्रीय" शब्द की सार्थकता
इस पंचांग के नाम में जुड़ा "राष्ट्रीय" (National) शब्द कोई साधारण विशेषण नहीं है। अतीत के राजनीतिक विभाजनों और क्षेत्रीय दूरियों के कारण हमारे देश में जो ३० अलग-अलग पंचांग पनप गए थे, वे हमारी गुलामी के काल की बिखरी हुई सोच के प्रतीक थे [1, 14, 36]। जब हम आज़ाद हुए, तो यह आवश्यक था कि प्रशासनिक, नागरिक और सामाजिक कार्यों के लिए एक ऐसी काल-प्रणाली हो जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक समान हो [1, 2]। 

"राष्ट्रीय" शब्द इस बात का प्रतीक है कि यह कैलेण्डर भारत की विविधता में एकता का परिचायक है [37]। यह हमारे अतीत के महान खगोलविदों के ज्ञान को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसकर सम्पूर्ण राष्ट्र को एक समय-सूत्र में बाँधता है [36-38]। यह भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता और वैज्ञानिक चेतना का एक ऐसा अनूठा दस्तावेज है जो हमें प्रकृति के साथ कदमताल करना सिखाता है। 

निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो, भारत का राष्ट्रीय पंचांग केवल तारीखें देखने का एक साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की वैज्ञानिक और ऐतिहासिक पहचान है। यह प्राचीन सूर्य सिद्धान्त की आत्मा को आधुनिक खगोलशास्त्र के शरीर में पिरोता है। इस पंचांग के माध्यम से हम अपने तीज-त्योहारों को प्राकृतिक मौसमों के साथ जोड़कर अपनी समृद्ध कालगणना प्रणाली को विश्वपटल पर गर्व के साथ स्थापित कर सके हैं।

Follow us on social media and share!