वेदो के प्रहरी - महर्षि दयानंद सरस्वती
February 11, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार
नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

बच्चे के आरंभिक शब्दों में एक अनूठा जादू होता है। ये शब्द किसी पुस्तक से नहीं सीखे जाते, बल्कि माँ की लोरी, पिता की कहानियों और घर के वातावरण से अंतर्मन में रच-बस जाते हैं। यही हमारी मातृभाषा है, जिसके माध्यम से हम पहला संवाद करते हैं।
हर साल 21 फरवरी को दुनिया अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाती है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' का इतिहास बांग्ला भाषा से जुड़ा है। वर्ष 1952, जब तत्कालीन पाकिस्तान सरकार ने 'उर्दू' को एकमात्र आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया था।
इसके विरोध में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के लोगों ने अपनी मातृभाषा 'बांग्ला' को आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए एक विशाल आंदोलन छेड़ दिया। 21 फरवरी 1952 को इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोलियों से कई युवाओं अपनी जान गँवा दी।
विश्व इतिहास में यह संभवतः पहला अवसर था, जब लोगों ने अपनी भाषाई अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। यूनेस्को ने वर्ष 1999 में 21 फरवरी को 'अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
जैसा कि नेल्सन मंडेला ने कहा था: "यदि आप किसी व्यक्ति से ऐसी भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है, तो वह उसके दिमाग तक जाती है। लेकिन यदि आप उससे उसकी अपनी भाषा में बात करते हैं, तो वह उसके दिल तक पहुँचती है।" नेल्सन मंडेला जी की यह पंक्ति हमारी मातृभाषा के महत्व को स्पष्ट करती है। यह केवल सूचना देने और आत्मीय जुड़ाव महसूस करने के बीच का अंतर है।

माँ की गोद में मातृभाषा की शिक्षा (image:ai generated)
हमारी मातृभाषा मन को छू लेनी वाली भाषा है। इसमें वे मानवीय संवेदनाएँ होती हैं जिन्हें हम किसी दूसरी भाषा में महसूस नहीं कर पाते है, जैसे माँ की ममता का आँचल,मिट्टी की वह पहली सोंधी खुशबू, बचपन के पकवानों का स्वाद। जब आप किसी से उसकी मातृभाषा में बात करते हैं, तो वह आपसे भावनात्मक रूप से भी जुड़ाव महसूस करता है।
यही भावनात्मक गहराई होने के कारण प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में मातृभाषा का विशेष महत्व है। जब बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाता है, तो वे नए विषयों को अपने जाने पहचाने शब्दों के माध्यम से त्वरित और आत्मविश्वास के साथ समझते हैं। उन्हें शब्दों का अनुवाद करने में अतिरिक्त ऊर्जा और समय व्यर्थ नहीं करनी पड़ता, जिससे उनकी रचनात्मकता निखरती है। यहाँ भाषा केवल संवाद का माध्यम ही नहीं, बल्कि ज्ञान की दुनिया का प्रवेशद्वार भी है।

छत्तीसगढ़ के स्कूलों में मातृभाषा में पढ़ाई
(साभार: CG SCHOOL यूट्यूब चैनल)
ज्ञान का लोक भाषा में अनुवाद ना होने के कारण विभिन्न लोक भाषा बोलियों के समक्ष अस्तित्व का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। वैश्विक भाषाओं के बढ़ते प्रभुत्व ने स्थानीय बोलियों के अस्तित्व के सामने एक गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है। अनुमान है कि दुनिया में 6,000 से 7,000 भाषाएँ बोली जाती हैं। कई भाषाविदों का मानना है कि इनमें से 50% से अधिक भाषाएं वर्ष 2100 तक गंभीर रूप से संकटग्रस्त या विलुप्त हो जाएँगी। जब कोई भाषा विलुप्त होती है, तो केवल संवाद का माध्यम ही समाप्त नहीं होता, बल्कि हर भाषा के साथ सदियों का अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और जीवन दर्शन भी हमेशा के लिए खो जाता है।
आज के वैश्विक परिदृश्य में भाषाओं का अस्तित्व अब 'डिजिटल स्क्रीन' पर तय हो रहा है। जहाँ इंटरनेट कुछ प्रभुत्वशाली भाषाओं को प्राथमिकता देता है, वहीं यह आधुनिक तकनीक हमें आशा की किरण भी दिखाता है।

डिजिटल दुनिया में भाषा से संबंधित कई ऐप
डिजिटल शब्दकोशों और सोशल मीडिया के माध्यम से अब लुप्तप्राय बोलियों का अभिलेखीकरण, शब्दकोश निर्माण आदि के माध्यम से संरक्षित किया जा रहा है। तकनीक के सही उपयोग से विलुप्त होती भाषाओं के अस्तित्व को एक पुनः आधार मिल सकता है। अब AI और रीयल-टाइम अनुवाद जैसी तकनीकों के माध्यम से विलुप्त होती खड़ी भाषाओं को भी वैश्विक मंच मिल रहा है।
हम अपनी मातृभाषा को कैसे समृद्ध बनाए?
किसी भाषा को बचाने या समृद्ध करने की शुरुआत हमारी अपनी आदतों से शुरू होती है:
घर में बच्चों के साथ अपनी मातृभाषा में बात करें और उन्हें लोक-कथाओं व गीतों से परिचित कराएँ।।
अपनी भाषा के साहित्य को पढ़ें, क्षेत्रीय सिनेमा देखें और स्थानीय संगीत को प्रोत्साहन दें।
मातृभाषा में हमारे संस्कार और अस्मिता निहित होती है। वैश्विक भाषाएँ हमें बाहरी जगत की ऊँचाइयों तक ले जा सकती हैं, किंतु मातृभाषा ही वह धरातल है जो हमें हमारे अंतर्मन की गहराइयों से जोड़ती है। किसी से आत्मीय संबंध केवल एक जैसी शब्दावली बोलने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की संवेदनाओं को पूरी गहराई से समझने से बनता है। हम चाहे कितनी भी भाषाएँ सीख लें, अंततः वही भाषा हमें परम सुकून देती है जो हमारे अंतर्मन में रची-बसी है।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
यह पंक्तियाँ हिंदी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा रचित हैं, जो मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करती हैं। इसका अर्थ है कि अपनी भाषा (मातृभाषा) की उन्नति ही सभी उन्नतियों का मूल आधार है, क्योंकि मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है।
आइए, इस अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर हम अपनी मातृभाषाओं पर गर्व करें और उन्हें समृद्ध बनाए।
लेख:
श्री प्रदीप श्रीवास्तव,
लेखक एवं विचारक
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