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शब्द प्रसंग शृंखला: भाग- 01 भाषा एवं शब्दों की व्युत्पत्ति

शब्द प्रसंग शृंखला: भाग- 01 भाषा एवं शब्दों की व्युत्पत्ति


हम प्रतिदिन किसी न किसी भाषा का उपयोग करते हैं। क्या हमने कभी विचार किया है कि स्वयं 'भाषा' शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई है? पाणिनी के अनुसार शब्दों का जन्म किसी मूल धातु से होता है। 'भाषा' शब्द भी इसी प्रक्रिया का परिणाम है। इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'भाष्' धातु से हुई है। 'भाष्' धातु का सीधा अर्थ बोलना या व्यक्त करना है।
हमारे पूर्वजों ने यह विचार किया कि मनुष्य जिस माध्यम से अपने विचारों को वाणी देता है उसे भाषा कहा जाना चाहिए। संस्कृत का एक प्राचीन सूत्र कहता है:

'भाष् व्यक्तायां वाचि'
अर्थात जो व्यक्त वाणी है, वही भाषा है।


भाषा: जो व्यक्त वाणी है 

इसी प्रकार एक प्रसिद्ध सूत्र बनता है। वह सूत्र 'भाष्यते अनया इति भाषा' है। इस सूत्र का सीधा अर्थ है कि "मनुष्य जिसके द्वारा अपने विचारों को प्रकट करता है" उसे भाषा कहते हैं।

पशु और पक्षी भी संवाद करते हैं। उनका संवाद केवल सांकेतिक होता है। उदाहरण के लिए बाघ आने पर बन्दरों की आवाज़, मधुमक्खियों का नृत्य या कुत्ते का पूँछ हिलाना उनके प्राकृतिक संकेत हैं। इनमें शब्द नहीं होते हैं। इसके विपरीत मनुष्य अपनी ध्वनियों को अर्थपूर्ण शब्दों में बदलता है।


संकेत से संवाद

समय के साथ 'भाषा' शब्द का अर्थ विस्तार हुआ। प्राचीन काल में इसका अर्थ केवल मुख से निकली हुई वाणी तक सीमित था। आज इसका स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो गया है। हम आज संकेतों और आँखों का भी प्रयोग करते हैं। मनुष्य ने अपने विचारों और भावनाओं को जहाँ भी व्यक्त किया है, वहाँ भाषा ने अपना स्थान बना लिया है। हमारे पूर्वजों ने विचारों की अभिव्यक्ति को कितना अधिक महत्व दिया था। बोलना और अपने विचारों को स्पष्टता से व्यक्त करना मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है, जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करता है।

हमने यह तो समझ लिया कि भाषा क्या होती है। भाषा का सबसे महत्वपूर्ण आधार "शब्द" है। शब्दों का निर्माण कैसे होता है? व्युत्पत्ति विज्ञान के अनुसार 'शब्द' की उत्पत्ति संस्कृत की 'शब्द्' धातु से हुई है। इस धातु का मूल अर्थ आवाज़ करना या ध्वनि उत्पन्न करना है। पाणिनी के अनुसार कोई भी ध्वनि तब तक शब्द नहीं बन सकती है जब तक उसका कोई निश्चित अर्थ और व्याकरणिक स्वरूप न हो।


महर्षि पाणिनि:
 महान भाषाविद् और व्याकरणशास्त्री

हम पशुओं और पक्षियों के प्राकृतिक संवाद से इसे आसानी से समझ सकते हैं। वे भी ध्वनियां उत्पन्न करते हैं। पाणिनी के अनुसार उनकी ध्वनियां शब्द नहीं हैं, वे केवल संकेत हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि से मूल धातुओं में प्रत्यय जोड़कर निरन्तर नए अर्थ उत्पन्न करता है। ध्वनियों को अर्थपूर्ण शब्दों में बदलने की यह क्षमता ही मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करती है। पाणिनी का एक प्रसिद्ध सूत्र 'सुप्तिङन्तं पदम्' है। इसका सीधा अर्थ है कि जब किसी मूल धातु या प्रातिपदिक में कोई नियमबद्ध प्रत्यय जुड़ता है तब वह 'पद' या सार्थक शब्द बनता है।

भारतीय भाषा विज्ञान अत्यन्त वैज्ञानिक है। संस्कृत तथा उससे जन्मी हिन्दी में अधिकांश शब्दों की उत्पत्ति किसी मूल धातु से होती है। धातु भाषा का बीज है। यह किसी कार्य या भाव को दर्शाता है। इन बीजरूपी धातुओं में उपसर्ग या प्रत्यय जुड़ने पर नए शब्द आकार लेते हैं। कृ अर्थात करना एक मूल धातु है। इस मूल धातु में उपसर्ग और प्रत्यय जुड़ने से नए शब्द इस प्रकार आकार लेते हैं:

कृ + अक (प्रत्यय) = कारक
सम् (उपसर्ग) + कृति = संस्कृति

इसी तरह गम् धातु से गमन शब्द बना है। इसमें उपसर्ग लगने पर अर्थ इस प्रकार बदलते हैं:

गम् + अन (प्रत्यय) = गमन
आ (उपसर्ग) + गमन = आगमन
दुर् (उपसर्ग) + गम = दुर्गम

धातु प्रक्रिया शब्दों की उत्पत्ति का सबसे प्रमुख मार्ग है। मनुष्य ने केवल व्याकरण से ही शब्द नहीं बनाए हैं। भाषा के आरम्भिक चरण में उसने आसपास की प्रकृति को गहराई से सुना। उसने पशुओं, पक्षियों और नदियों की ध्वनियों को अपने कण्ठ से दोहराने का प्रयास किया।

सूखे पत्तों की आवाज़ से खड़खड़ाहट शब्द उत्पन्न हुआ। बादलों के गरजने से गड़गड़ाहट शब्द बना। दरवाज़े पर होने वाली ध्वनि से खटखटाना शब्द सामने आया। बिल्लियों की आवाज़ से म्याऊँ और पक्षियों के कलरव से चहचहाना शब्द गढ़ा गया। हमारे पूर्वजों ने नदी के बहने की आवाज़ को कलकल नाम दिया। यह तथ्य सिद्ध करता है कि भाषा का एक बड़ा हिस्सा सीधे प्रकृति से उत्पन्न हुआ है।


कल-कल बहती नदी

समास और सन्धि के माध्यम से भाषा अपनी शब्द सम्पदा को लगातार समृद्ध करती रहती है। मनुष्य हर नई वस्तु के लिए नया शब्द गढ़ने के स्थान पर पुराने शब्दों को आपस में मिला लेता है। इस प्रक्रिया से अनगिनत शब्द उत्पन्न हुए हैं। उदाहरण के लिए रसोई और घर मिलकर रसोईघर बनते हैं। विद्या और आलय मिलकर विद्यालय बनते हैं। रेल और गाड़ी से रेलगाड़ी शब्द बना है।

सदियों की यात्रा में कई बार शब्दों के अर्थ विस्तृत हो जाते हैं। कई बार वे सिकुड़ भी जाते हैं। तेल शब्द की उत्पत्ति केवल तिल से निकलने वाले तरल पदार्थ के लिए हुई थी। आज यह शब्द अत्यन्त विस्तृत हो गया है। हम सरसों का तेल और मिट्टी का तेल भी कहते हैं। अर्थ सिकुड़ने का उदाहरण गवेषणा शब्द है। प्राचीन वैदिक समाज पशुपालक था। उस काल में गाय का खो जाना एक बड़ी घटना होती थी। आर्यों ने गाय की खोज करने को गवेषणा कहा। आज इसका अर्थ विशिष्ट होकर अनुसन्धान बन गया है। मृग शब्द का प्राचीन अर्थ जानवर होता था। आज इसका अर्थ सिकुड़कर केवल हिरण तक सीमित रह गया है।


हिरण जिसके लिए मृग शब्द का उपयोग

शब्दों की उत्पत्ति का एक बड़ा स्रोत हमारी लोक समाज है। स्थानीय लोगों ने अपनी आवश्यकता और जीवन शैली के अनुसार अनेक शब्द गढ़े हैं। भाषा विज्ञानी इन्हें देशज शब्द कहते हैं। दक्षिण कोसल सहित भारत के विभिन्न अंचलों ने हिन्दी को हज़ारों शब्द दिए हैं। लोटा, डिबिया, खटिया, पगड़ी और झोला जैसे शब्द आम जनता के बीच उत्पन्न हुए हैं। दैनिक ज़रूरतों ने इन्हें जन्म दिया है।

एक समाज जब व्यापार आदि के माध्यम से दूसरे समाज के सम्पर्क में आता है तब वह नए शब्दों को अपने व्याकरण के अनुसार ढाल लेता है। भारत में अदालती कामकाज के प्रभाव से अदालत, कागज़, कानून, ज़मीन और बाज़ार जैसे शब्द हमारी भाषा का हिस्सा बन गए।


व्यापार के माध्यम से नए शब्दों का आगमन

आधुनिक शिक्षा ने हमें स्टेशन, स्कूल, मशीन और रेल जैसे शब्द दिए हैं। पुर्तगालियों के साथ अलमारी, बाल्टी, साबुन और चाबी जैसे शब्द आए। आज ये शब्द हमारे घरों में बसे हैं। हम विदेशी शब्दों में अपने प्रत्यय जोड़कर भी नए शब्द उत्पन्न कर लेते हैं। अंग्रेज़ी के मशीन शब्द में हिन्दी का प्रत्यय जोड़कर मशीनीकरण बना लिया गया।

शब्दों की उत्पत्ति एक निरन्तर चलने वाला कार्य है। समाज जब कोई नया विचार सोचता है या किसी नए भाव का अनुभव करता है तब एक नए शब्द का जन्म होता है। शब्दों के मूल को समझना हमारी संस्कृति के मूल को पहचानने के समान है। दक्षिण कोसल टुडे के लेखकों का यह दायित्व है कि हम शब्दों का उपयोग करने के साथ उनकी मूल भावना को भी जीवित रखें। "शब्द प्रसंग" शृंखला के माध्यम से हम हमारी संस्कृति के मूल भाव और रहस्य को जानने का प्रयास करेंगे।

-दक्षिण कोसल संपादकीय समूह

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