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लक्ष्मी पुराण: उत्कल (ओड़िआ) साहित्य का एक प्रमुख ग्रंथ

लक्ष्मी पुराण: उत्कल (ओड़िआ) साहित्य का एक प्रमुख ग्रंथ

भारत के पूर्वी तट पर स्थित ओडिशा, एक ऐसी भूमि है, जो प्रभु जगन्नाथ की भक्ति और आध्यात्मिक लोकाचार के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ का जन-जीवन भगवान जगन्नाथ और देवी लक्ष्मी को अपना आराध्य मानता है। मंदिरों की भव्यता हो या लोक-कलाओं की सादगी, हर जगह एक समन्वय और भक्ति का दर्शन होता है।  यह ओडिशा की अमूल्य निधि है, और इसी निधि के साहित्य के स्वर्णिम अध्याय में शामिल है 'लक्ष्मी पुराण'। यह केवल एक पौराणिक ग्रंथ नहीं, बल्कि यह हमारे सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज़ है, जिसकी रचना महान संत-कवि बलराम दास ने की थी।
लक्ष्मी पुराण की महत्ता को समझने के लिए हमें 15वीं शताब्दी के उस काल खंड को जानना होगा जिसमें इसकी रचना हुई। यह वह काल था जिसे ओड़िआ साहित्य में 'पंचसखा युग' (पाँच सखाओं का युग) के नाम से जाना जाता है। ये पाँच सखा थे: बलराम दास, जगन्नाथ दास, अच्युतानंद दास, यशोवंत दास और शिशु अनंत दास।

ये सभी संत-कवि थे जिन्होंने संस्कृत के गूढ़ आध्यात्मिक और पौराणिक ग्रंथों को ओड़िआ भाषा में सरल और सुबोध बनाकर जन-जन तक पहुँचाया। इनका पवित्र उद्देश्य था कि ज्ञान और भक्ति के मर्म को केवल विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रखकर, उसे समाज के हर तबके के लिए सहजता से सुलभ बनाया जाए। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से एक समावेशी भक्ति परंपरा की नींव रखी।

बलराम दास, जो इस पंचसखा मंडल के सबसे वरिष्ठ कवि माने जाते हैं, ने इसी लक्ष्य की पूर्ति में अपनी लेखनी समर्पित की। उन्हें ओड़िआ में उनकी प्रसिद्ध कृति 'दांडी रामायण' (ओड़िआ रामायण) के लिए 'ओडिशा का वाल्मीकि' भी कहा जाता है। लक्ष्मी पुराण, उनकी एक ऐसी अनूठी रचना है जिसने समाज में समानता की चेतना जगाई।

बलराम दास द्वारा रचित 'लक्ष्मी पुराण' की कथा अत्यंत मर्मस्पर्शी है। यह कथा मुख्य रूप से माँ लक्ष्मी और उनके पति महाप्रभु जगन्नाथ (भगवान विष्णु/कृष्ण) और उनके भाई बलभद्र के बीच घटित एक घटना पर आधारित है।

कहानी के अनुसार, एक बार माँ लक्ष्मी स्वयं एक गरीब और चांडाल स्त्री के घर जाती हैं। श्रिया ने देवी लक्ष्मी के प्रिय माने जाने वाले गुरुवार व्रत का पूरी श्रद्धा और नियम से पालन किया था। लक्ष्मी जी ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके घर भोजन ग्रहण किया और उसे आशीर्वाद दिया।

जब महाप्रभु जगन्नाथ और बलभद्र को इस बात का पता चला, तो महाप्रभु जगन्नाथ ने अपनी पत्नी लक्ष्मी को, श्मशान में काम करने वाली चंडालिनी के हाथों भोजन ग्रहण करने के कारण, क्रोधित होकर पुरी के मंदिर और महल से निष्कासित कर दिया।

अपने अपमान से दुखी होकर माँ लक्ष्मी ने प्रतिज्ञा ली कि वह मंदिर के सभी वैभव और धन-धान्य को अपने साथ लेकर चली जाएंगी, और जब तक जगन्नाथ और बलभद्र को अपनी गलती का ज्ञान नहीं होगा, तब तक वह उन्हें वापस नहीं मिलेंगी।

परिणामस्वरूप, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शहर में अचानक भयानक दरिद्रता आ गई। जगन्नाथ और बलभद्र, जो महलों के ऐश्वर्य में जीवन बिता रहे थे, अब भोजन और वस्त्र के लिए दर-दर भटकने लगे।

अपनी भूख मिटाने के लिए, वे साधारण भिक्षुओं का रूप धारण करके ब्राह्मणों के घरों में भिक्षा माँगने लगे। वे वेदों का उच्चारण करते हुए भोजन की याचना करते थे। कई बार, ब्राह्मणों के घरों में उनके लिए भोजन पक भी जाता था, लेकिन जैसे ही वह भोजन उनकी पत्तल पर परोसा जाता, वह क्षण भर में गायब हो जाता या खाने योग्य नहीं रहता। इस चमत्कारिक और अशुभ घटना से ब्राह्मण समझ गए कि यह लक्ष्मी का ही श्राप है ('लक्ष्मी-छड़ा')। वे क्रोधित होकर जगन्नाथ और बलभद्र को डाँटते और उनका अपमान करके अपने घर से भगा देते थे।

उन्हें शहर में भोजन नहीं मिला, तो वे जंगल की ओर चल पड़े। अत्यधिक भूख लगने पर, वे एक तालाब के पास पहुँचे, जहाँ उन्हें खाने योग्य कमल की जड़ें (कमल गट्टा) दिखाई दीं। लेकिन जैसे ही वे उन्हें लेने के लिए आगे बढ़े, कमल की जड़ें अचानक खराब हो गईं और देखते ही देखते पूरा तालाब कीचड़ में बदल गया। इस तरह वे जंगली भोजन प्राप्त करने में भी असमर्थ रहे।

भूख-प्यास से व्याकुल होकर, वे अंततः उसी श्रिया चांडालुणी के घर पहुँचे। श्रिया ने उन्हें आदरपूर्वक शरण दी और प्यासे देखकर कुएँ से पानी निकालने का प्रयास किया। पर जैसे ही वह घड़ा भरकर लाती और पानी उनके हाथ में देने लगती, घड़े का सारा पानी अचानक गायब हो जाता था। इस घटना से उन्हें यह गहरा एहसास हुआ कि जिस व्यक्ति को उन्होंने तिरस्कृत किया था, उसके घर भी लक्ष्मी की शक्ति के बिना पानी की एक बूँद तक नहीं मिल सकती।

अभी भी भूखे और प्यासे भटकते हुए, उनकी भेंट एक योगी से हुई। योगी ने उन्हें बताया कि समुद्र किनारे एक विशाल महल है, जिसकी रानी अत्यंत दयालु हैं और वह सभी भूखों को भरपेट भोजन कराती हैं।

वे दोनों उसी महल में पहुँचे, जो वास्तव में माँ लक्ष्मी ने ही अपनी माया से बनाया था। महल में उन्हें भरपेट भोजन मिला। पहला निवाला चखते ही, महाप्रभु जगन्नाथ को तुरंत एहसास हो गया कि यह दिव्य भोजन केवल उनकी पत्नी, धन-धान्य की देवी लक्ष्मी के हाथों ही बना हो सकता है।

इस क्षण उन्हें अपनी भूल का पूर्ण पश्चाताप हुआ। उन्होंने और बलभद्र ने तुरंत माँ लक्ष्मी से क्षमा याचना की। लक्ष्मी जी ने तब एक शर्त रखी: आज से पुरी धाम में ऊँच-नीच, जाति-भेद का कोई स्थान नहीं होगा। हर व्यक्ति को समान सम्मान मिलेगा, और उनके रसोईघर का प्रसाद (महाप्रसाद) हर जाति के लोग एक साथ ग्रहण करेंगे। इस प्रकार, माँ लक्ष्मी की वापसी हुई और पुरी में फिर से समृद्धि लौट आई।

लक्ष्मी पुराण का ओड़िशा में गहरा प्रभाव है। यह विशेष रूप से "गुरुवार ओशा" या "माना बसाई" अनुष्ठान का केंद्र बिंदु है, जो माघ माह के प्रत्येक गुरुवार को ओड़िआ घरों की महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं देवी लक्ष्मी की पूजा करती हैं, विभिन्न प्रकार के 'पिठा' (पारंपरिक केक) और व्यंजन बनाती हैं, और लक्ष्मी पुराण की कहानियों को पढ़ती हैं या सुनती हैं। माना बसाई का अनुष्ठान केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि यह परिवार की एकजुटता और महिलाओं द्वारा घर में समृद्धि लाने की भूमिका का प्रतीक भी है।

आज भी, ओड़िआ घरों में बुजुर्ग महिलाएं युवा पीढ़ी को लक्ष्मी पुराण की कहानियां सुनाती हैं, जिससे ये मूल्य पीढ़ियों तक आगे बढ़ते रहते हैं। यह ग्रंथ न केवल धार्मिक शिक्षा देता है, बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान करता है, जैसे कि स्वच्छता, मितव्ययिता और सभी के प्रति दयालुता का महत्व।


आज के आधुनिक युग में भी लक्ष्मी पुराण के संदेश उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सदियों पहले थे। सामाजिक समानता, महिला सशक्तिकरण और सभी के प्रति सम्मान के मूल्य आज भी समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह ग्रंथ हमें सिखाता है कि सच्ची समृद्धि केवल धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और रिश्तों में निहित है। यह हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोने के लिए प्रेरित करता है।


लक्ष्मी पुराण, मध्यकालीन उत्कल साहित्य का एक प्रमुख ग्रंथ है। यह बलराम दास की अनुपम कृति है, जिन्होंने सदियों पहले महान विचारों को अपनी रचना में पिरोया था। इसकी कहानियाँ आज भी ओड़िआ घरों में गूंजती हैं, पूरे समाज को प्रेम, क्षमा और समानता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। लक्ष्मी पुराण ओड़िआ साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है, जो अपनी समृद्ध कथा और गहरे संदेशों के साथ हमेशा प्रासंगिक रहेगा।
 

लेख:
अभिषेक प्रधान,
रायपुर, छत्तीसगढ़

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