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जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा

जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा

भारत में आजकल हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा पर भी काफी चर्चा हो रही है। आईआईटी खड़गपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में इस दिशा में शोधकार्यों के आरम्भ होने और फिर नई शिक्षा नीति में उल्लेख के कारण जनसामान्य के बीच ज्ञान परम्परा का विषय बहुत प्रचलन में है। और जब हम भारतीय ज्ञान परम्परा की बात करते हैं, तो इसमें जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा भी समाविष्ट हैं।

गुरुमांय: वाचिक परम्परा की संवाहिकाएं, Gurumai: Bearers of Oral Traditions  | Sahapedia
बस्तर की वाचिक परम्परा: गुरुमांय

जनजातीय समाज की व्यवस्थाएँ आज भी हमें बहुत कुछ सीखा सकती हैं। जनजातीय समाज के पास ज्ञान का बड़ा समृद्ध भंडार है, जिसे हर पीढ़ी अपने पूर्वजों से सीखती है और उसमें कुछ वृद्धि कर आने वाली पीढ़ी को देकर जाती है। इससे जनजातीय समाज के पास एक लंबे अनुभव से परिपूर्ण और समय द्वारा परखा गया बहुमूल्य ज्ञानकोष संगृहीत हुआ है।

इस कोष में पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों से लेकर राजनीति और वास्तु से लेकर युद्धकौशल, ललिल-कलाएँ इत्यादि सम्मिलित हैं। पर इसमें एक विषय आजकल हमें देखने-सुनने को मिलता है। जब हम जनजातीय समाज के किसी वैद्य से कहते है कि आपको इतनी सारी जड़ी-बूटियों की जानकारी है, चिकित्सा का आपका इतना अच्छा ज्ञान है; तो आप इसे अपने गाँव के ही पढ़े-लिखे बच्चों को सीखाइये, ताकि यह परम्परा बची रहे।

तब इस पर वह कहेगा कि आज के पढ़े-लिखे लड़के इन थोड़े-बहुत बचे जंगलों में जो अमूल्य वनस्पतियाँ हैं, उन्हें बेच कर खत्म कर देगा। इसके पीछे क्या हम उस वैद्य की भावना समझ पा रहे हैं कि वह क्यों मना कर रहा है? जब आप विचार करेंगे तो आपके ध्यान में आएगा कि वैद्य को इस बात की जानकारी है कि उसे कब कौन-सी पत्ती तोड़ना है।  वह उसी पत्ती को तोड़ेगा, जहाँ वापस पत्ती आ सकती है। और वह उनका सम्यक् दोहन करेगा। ऐसा नहीं करेगा कि वहाँ फिर कभी पत्ते आ ही न सकें। और इसलिए वह इतना ध्यान रखता है कि किसी ऐसे व्यक्ति को वह यह ज्ञान दे, जो बिना समझे इन वनस्पतियों का दोहन कर उन्हें समाप्त ही कर दे। उसे पता है कि औषधियाँ अब काफी कम हैं। इसलिए ही वह विद्या देने से इंकार करता है। पर हमें ऐसा लगता है कि वह इसे गोपनीय रखना चाहता है। पर ऐसा नहीं है। और फिर ये वनस्पतियाँ उसकी देवता हैं। भला वह उनका निरादर कैसे कर सकता है। यह तो बात हुई चिकित्सा परम्परा की।

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बस्तर के वैद्य पद्मश्री हेमचंद मांझी

नागपुर को देवरी के गोंड शासकों ने ही बसाया था। और वह गोंड साम्राज्य इतना समृद्ध था कि मुगल सल्तनत को कर्ज देता था। तो मन में प्रश्न आता है कि वे ऐसा करते क्या थे, जो इतने समृद्ध थे। इसके उत्तर में विश्वविद्यालय में पढ़ने वाला छात्र क्या कहेगा? वह कहेगा कि वे लोग लूट-पाट करते थे। क्योंकि अंग्रेज हमें यही सीखाकर गए हैं। पर जरा विचार कीजिए कि भला लूट-पाट से कोई इतना समृद्ध हो सकता है? क्या लूटेरे साम्राज्य चला सकते हैं? बिना किसी व्यवस्था के, बिना किसी ज्ञान के क्या कोई राज्य इतना प्रभावशाली हो पाता कि सल्तनत-ए-मुगलिया को कर्ज दे? नहीं।

May be an image of map and text that says "RAJASTHAN GONDWANA KINGDOM UTTAR PRADESH Jabalpur Mandla Ratanpur GUJARAT ODISHA Gondia ANDHRA PRADESH MAHARASHTRA"
गोंड सम्राज्य

पर फिर वही प्रश्न आ जाता है कि वे ऐसा करते क्या थे? तो छिन्दवाड़ा में रहने वाले एक न्यायाधीश, जो स्वयं गोंड समाज से आते हैं, उन्होंने इसका बड़ा तार्किक उत्तर दिया है। वे कहते हैं कि गोंड लोहे का व्यापार करते थे। हम सभी जानते हैं कि हमारे वनों में कितनी खनिज सम्पदा छिपी हुई है। जनजातीय समाज उनमें से धातुएँ निकालकर, मुख्यतः लोहा निकालकर उनका व्यापार करते थे। वैसे भी प्राचीन काल से भारत में निर्मित लोहा विश्वप्रसिद्ध रहा।

लोहा गलाने वाले अगरिया आदिवासी की दुर्दशा कैसे दूर होगी? - Mainbhibharat
अगरिया जनजातीय समुदाय का पारम्परिक कार्य 

यह तो हम लोगों ने ऐसा पढ़ा है कि अंग्रेजों के आने के बाद हमारे यहाँ लोहा बनने लगा। नहीं तो दिल्ली के लौह स्तम्भ को देखिए। डेढ़ हजार साल से खड़ा है, पर उसमें जंग नहीं लगी। इतिहास में कई जनजातियों का उल्लेख है, जो लोहा बनाती थी। झारखण्ड की असुर जनजाति, अगरिया जनजाति, महाराष्ट्र में गोंड जनजाति आदि तो विशेष उल्लेखनीय है। तेलंगाना के जनजातीय क्षेत्रों में लोहे बनाने के निशान आज भी मिलते हैं।

पर यहाँ दूसरा प्रश्न आता है कि फिर यह सारा ज्ञान आज कहाँ चला गया? तो इसका उत्तर है अंग्रेजी षड्यंत्र। जैसा हमने चर्चा की ही थी कि कैसे अंग्रेजों ने वनों को भी सरकारी सम्पत्ति मानकर उनमें खुदाई, वनोपज संकलन आदि सभी पर रोक लगा दी। जंगल के जंगल खत्म कर दिए। तो भला जनजातीय समाज खनिज कैसे निकालता? और जब 200 से ज्यादा सालों तक खनिज ही नहीं निकाला, तो उसकी विद्या को कैसे याद रखा जा सकता था? तो इसलिए ही वह ज्ञान लुप्त हो गया।

वर्ष 1857 के बाद तो जंगल पर से उनके सारे अधिकार सहित जंगल भी उनसे छीन लिए गए। उनका वह सब कुछ छीन लिया गया, जो उनकी आजीविका का स्रोत हुआ करता था। वे कभी जंगल की कुछ चीजों का दोहन करते, फिर बाद में किसी और का। फिर जंगलों में इतनी चीजें थी कि उनकी आजीविका सम्पन्नता से चलती थी। हम वर्णन पढ़ते हैं कि वनवास में रामजी ने कंदमूल फल खाए। पर आज लोग कहते हैं कि इतने कन्द-मूल फल जंगलों में मिलते ही कहाँ हैं? तो इसका भी यही उत्तर है कि आज नहीं मिलते, क्योंकि आज जंगल ही कहाँ बचे हैं।

अंग्रेजों ने सारे जंगल खत्म कर केवल उन्हीं पेड़ों का रोपण किया, जो उनके लिए लाभदायक थीं। इसलिए जब आज लोग अब जंगलों पर आधारित आजीविका का सवाल उठाते हैं, तो हम उसे असम्भव कहते हैं। क्योंकि अगर जंगल मिल भी जाएँ, तो क्या उनकी मदद से आजीविका चल सकती है? नहीं। क्योंकि जंगल में वे पेड़, वे खनिज आज बचे ही कहाँ हैं। हम जिस गोंड साम्राज्य की बात कर रहे हैं, उनके कई किले आज भी विद्यमान हैं। तो क्या स्थापत्य शिल्प की जानकारी के अभाव में, इंजीनियरिंग के ज्ञान के अभाव में ऐसे किले बनाना सम्भव था जो आज कई शताब्दियों से खड़े हैं? बिल्कुल ही नहीं। और इसीलिए हम जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा की बात यहाँ कर रहे हैं।

Wood Sleepers — Noural Rail
रेल लाइन के स्लिपर्स के लिए लकड़ियों का प्रयोग

तो इन सबका सारांश करना चाहें तो इतनी बात आती है कि जनजातीय समाज की व्यवस्थाएँ आज भी हमें बहुत कुछ सिखा सकती हैं। उनकी व्यवस्थाएँ हमें यह सिखाती हैं कि समुदाय कैसे संगठित रहता है, और यह समाज कैसे चलता है। वे हमें बताती हैं कि वनों का संवर्द्धन और गाँवों का विकास कैसे हो। प्रकृति से कब और कितना लेना है यानी Sustainable Development कैसे करना चाहिए; यह भी हमें जनजातीय समाज से सीखना है।

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महिलाओं की प्रतिष्ठा का विषय हो, या सरल न्याय का; आपसी सहयोग का भाव हो, नि:स्वार्थता का भाव; सभी हमें जनजातीय समाज से सीखकर अपनाना होगा। हमें यह सीखना होगा कि न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ, और मूल्यों से समझौता किए बिना भी खुशी का जीवन कैसे जीया जाता है। और इसके लिए हमें इन सबके बारे में जानना आवश्यक है। हमें जनजातीय समाज की अस्मिता के इन सामाजिक-आध्यात्मिक विषयों को जानना पड़ेगा। उनकी ज्ञान परम्परा को आदरपूर्वक समझना पड़ेगा। 

संपादक:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर 
दक्षिण कोसल टुडे 

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