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ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर

ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर


प्रस्तुत लेख दक्षिण भारत के एक विलक्षण मन्दिर और उसकी ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। तिरुवोट्टियूर का त्यागराजस्वामी मन्दिर केवल धार्मिक आस्था का केन्द्र ही नहीं था, अपितु यह मध्यकालीन भारत में ज्ञान और सभ्यता के संरक्षण का एक जीवन्त विश्वविद्यालय भी था। जिस समय उत्तर भारत विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था, उस समय चोल शासकों ने इस मन्दिर के माध्यम से विद्वानों को आश्रय दिया और शास्त्रपरक ज्ञान की धारा को अक्षुण्ण बनाए रखा। यह लेख हमें बताता है कि किस प्रकार एक आध्यात्मिक स्थल ने शैक्षिक संस्थान का रूप लेकर भारतीय संस्कृति की रक्षा की।


भारतीय इतिहास के पन्नों में दक्षिण भारत के मन्दिरों का स्थान सदैव ही विशिष्ट रहा है। ये मन्दिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं रहे, अपितु समाज के शैक्षिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के आधार स्तम्भ रहे हैं। कांचीपुरम के कैलाशनाथ मन्दिर की विशालता का अनुभव करने के पश्चात अब हम तिरुवोट्टियूर के पवित्र त्यागराजस्वामी मन्दिर के परिसर में प्रवेश कर रहे हैं।

वर्तमान चेन्नई में स्थित यह भव्य मन्दिर अपनी प्राचीनता और यहाँ की दिव्य ऊर्जा के लिए विख्यात है। यहाँ मुख्य आराध्य देव भगवान त्यागराजस्वामी और देवी त्रिपुरा सुन्दरी विराजमान हैं। समुद्र के निकट स्थित इस मन्दिर का परिसर प्राचीन समय में पूर्णतः बालू से आच्छादित था।


त्यागराजस्वामी मन्दिर - चेन्नई

इस मन्दिर का ऐतिहासिक महत्व केवल इसकी वास्तुकला तक सीमित नहीं है। इसका निर्माण चोल सम्राट राजेन्द्र चोल द्वारा करवाया गया था। 9वीं से 14वीं शताब्दी के मध्य इस परिसर ने केवल एक मन्दिर के रूप में नहीं, बल्कि एक औपचारिक विश्वविद्यालय के रूप में कार्य किया।

यह एक ऐसा प्रतिष्ठित गुरुकुल था जिसका महत्व क्षेत्रीय सीमाओं को लाँघकर राष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ था। इस सम्पूर्ण शैक्षिक तन्त्र का संचालन ओट्रियूर मठ के माध्यम से किया जाता था। यह एक संन्यासी संस्था थी, जो मन्दिर के प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों की देखरेख करती थी।

11वीं शताब्दी के दौरान भारत के उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में भारी उथल-पुथल का वातावरण बना हुआ था। गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया था। पूर्व में पाल साम्राज्य का पतन हो रहा था, जो कभी विक्रमशिला और ओदन्तपुरी जैसे महान विश्वविद्यालयों का संरक्षक रहा था।

बाह्य आक्रमणों और आन्तरिक संघर्षों के कारण उत्तर भारत के विद्वानों को मिलने वाला राजकीय संरक्षण समाप्त होने लगा था। मठीय संस्थाएँ और गुरुकुल अपने अस्तित्व के लिए राजाओं के अनुदान पर निर्भर थे। जब राज्यों ने अपने संसाधनों को युद्ध और रक्षा की ओर मोड़ दिया, तब शिक्षा और संस्कृति के ये केन्द्र उपेक्षित होने लगे।

इसी समय महमूद गजनवी के निरन्तर आक्रमणों ने उत्तर भारत के समृद्ध मन्दिर नगरों को अपना लक्ष्य बनाया। इन आक्रमणों के कारण न केवल धन-सम्पदा की हानि हुई, बल्कि सदियों से स्थापित ज्ञान की परम्परा और पाण्डुलिपियाँ भी नष्ट होने लगीं।

ऐसी स्थिति में विद्वान वर्ग ने अपने ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए दक्षिण की ओर प्रस्थान करना प्रारम्भ कर दिया। दक्षिण भारत इस समय प्रशासनिक और आर्थिक रूप से अत्यन्त स्थिर था। राजेन्द्र प्रथम और उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में राजस्व और स्वशासन की प्रणालियाँ बहुत सुदृढ़ थीं।

इसी स्थिरता ने दक्षिण को विस्थापित विद्वानों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल बना दिया। तिरुवोट्टियूर में ओट्रियूर मठ जैसे संस्थानों का विस्तार केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था। यह सभ्यता को बचाने का एक सोची-समझी योजना का हिस्सा था। चोल प्रशासन भलीभाँति जानता था कि राज्य की प्रतिष्ठा संस्कृत की बौद्धिक परम्परा, व्याकरण, तर्क और न्याय के ज्ञान पर टिकी है।

मठ परंपरा से भी सुशोभित रहा है यह प्राचीन परंपरा
मठ परंपरा से भी सुशोभित रहा है यह प्राचीन परंपरा

चोल सम्राटों ने विद्वानों को सुरक्षित वातावरण और संरक्षण प्रदान कर हमारे प्राचीन शास्त्रों की रक्षा की। यह संस्था राजकीय अनुदानों के एक नियमित और नियन्त्रित तन्त्र के माध्यम से कार्य करती थी। मन्दिर में एक पृथक बौद्धिक विभाग स्थापित किया गया था जिसका प्रमुख एक आचार्य होता था।

इन आचार्यों की नियुक्ति प्रायः लकुलीश पाशुपत परम्परा से की जाती थी, जो मूलतः उत्तर और पश्चिम भारत की एक दार्शनिक पद्धति थी। इस विश्वविद्यालय की शिक्षा पद्धति अत्यन्त कठोर और अनुशासित थी। यहाँ का मुख्य आकर्षण 'व्याकरण-दान-व्याख्यान-मण्डप' था।

यह एक विशाल सभा भवन था जो पाणिनी की व्याकरण पद्धति के गहन अध्ययन के लिए समर्पित था। मीमांसा, दर्शन, खगोल विज्ञान और आयुर्वेद जैसे उच्च विषयों को सीखने के लिए व्याकरण का ज्ञान आधारभूत माना जाता था।

मन्दिर की ओर से शिक्षकों के लिए वेतन और छात्रों के लिए आवासीय सहायता उपलब्ध कराई जाती थी। इससे संस्था बिना किसी आर्थिक संकट के अपना कार्य करती रहती थी। ओट्रियूर मठ के पाठ्यक्रम को अखिल भारतीय स्तर के मानकों के अनुरूप तैयार किया गया था।

यहाँ के विद्वान सम्पूर्ण भारत के ज्ञान के साथ समन्वय स्थापित करते थे। इसने मन्दिर को एक स्थानीय पूजा स्थल से उच्च स्तरीय बौद्धिक श्रम के केन्द्र में बदल दिया। यहाँ देशभर के विद्वान एकत्र होकर शास्त्रार्थ करते थे।

यह उस काल की एक बड़ी उपलब्धि थी कि भारत की भौगोलिक और भाषाई बाधाओं को तोड़कर वैदिक परम्पराओं की रक्षा के लिए एक साझा मंच तैयार किया गया। जब उत्तर से कोई आचार्य यहाँ आते थे, तो वे अपने साथ ज्ञान की एक पूरी श्रृंखला लेकर आते थे। इस प्रक्रिया ने राष्ट्रीय एकता की भावना को बल दिया।

चोल प्रशासन ने विद्वानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया। पहले जो शिक्षक भ्रमणशील और असुरक्षित होते थे, उन्हें यहाँ एक प्रतिष्ठित और स्थिर पद प्राप्त हुआ। इससे वे युद्ध और राजनीति के दबावों से मुक्त होकर ज्ञान के संरक्षण पर ध्यान केन्द्रित कर पाए।

दक्षिणी संस्थाओं में उत्तरी शिक्षकों की उपस्थिति से एक नया दार्शनिक समन्वय उत्पन्न हुआ। इसने स्थानीय परम्पराओं को नष्ट नहीं किया, बल्कि उन्हें नए दृष्टिकोणों से और अधिक समृद्ध बना दिया। 12वीं शताब्दी तक चोलों के नेतृत्व में दक्षिण भारत भारतीय शास्त्रीय ज्ञान का मुख्य संरक्षक बन गया था।

ओट्रियूर मठ ने 11वीं शताब्दी की राजनीतिक अराजकता और सांस्कृतिक निरन्तरता के मध्य एक सेतु का कार्य किया। चोल राज्य ने सिद्ध कर दिया कि वास्तविक एकता केवल सेना के बल पर नहीं, बल्कि एक साझा बौद्धिक विरासत में निवेश करने से आती है।

चोल साम्राज्य का है इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान
चोल साम्राज्य का है इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान 

उत्तरी मैदानों में भले ही सत्ताएँ बदलती रहीं, किन्तु भारतीय दर्शन और विज्ञान की मूल पद्धतियाँ यहाँ सुरक्षित रहीं। मठ का पाठ्यक्रम बहु-विषयक था। व्याकरण के अन्तर्गत पाणिनी की अष्टाध्यायी और महाभाष्य का गहन अध्ययन कराया जाता था।

इसके साथ ही पूर्व मीमांसा के माध्यम से वेदों के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने की कला सिखाई जाती थी। व्यावहारिक विज्ञान के क्षेत्र में आयुर्वेद और पंचांग गणना का ज्ञान अनिवार्य था। विद्वानों को मन्दिर के औषधालयों और समय की गणना जैसे कार्यों में भी दक्ष बनाया जाता था।

यहाँ के छात्र मठ या उससे जुड़े छात्रावासों में ही निवास करते थे। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध अटूट था और छात्र मन्दिर के प्रशासनिक कार्यों में भी सहायता करते थे।एक रोचक तथ्य यह भी है कि यद्यपि उस समय के शिलालेखों में महिला छात्राओं का विवरण कम मिलता है, किन्तु एक प्राचीन तमिल कविता उल्लेख करती है कि उत्तर की एक राजकुमारी और एक चोल राजकुमारी इस मठ में छात्राएँ थीं। 

बौद्धिक जीवन शास्त्रार्थ के चारों ओर घूमता था। प्रतिदिन पाण्डुलिपियों का अध्ययन और फिर उन पर तर्कपूर्ण वाद-विवाद करना छात्रों की दिनचर्या का हिस्सा था। यहाँ के छात्र केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं थे। आयुर्वेद के छात्र चिकित्सालयों में समय बिताते थे और कला के छात्र संगीत एवं नाट्य प्रस्तुतियों में भाग लेते थे।

यहाँ से शिक्षा पूर्ण करने वाला व्यक्ति केवल ग्रन्थों का ज्ञाता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और समाज सेवक भी बन जाता था।ओट्रियूर मठ की विरासत आज भी उन आचार्यों की उपस्थिति के कारण जीवित है जिन्होंने उत्तर और दक्षिण के मध्य सांस्कृतिक दूरी को कम किया।

गगनशिव और विद्यावर्धन जैसे महान आचार्यों ने यहाँ रहकर पाणिनीय व्याकरण और वैदिक दर्शन का संरक्षण सुनिश्चित किया। मन्दिर की दीवारों पर खुदे हुए शिलालेख आज भी चोल राजाओं और रानियों की उदारता और ज्ञान के प्रति उनके प्रेम की गवाही देते हैं।

तिरुवोट्टियूर का यह मन्दिर हमें याद दिलाता है कि ज्ञान की धारा को सुरक्षित रखने के लिए सामूहिक प्रयास और दूरदर्शिता कितनी आवश्यक है।

-श्रीजा व्यङ्कटेश
(लेखिका प्रखर शिक्षाविद, विचारक एवं स्तंभकार हैं, जो अपनी विश्लेषणात्मक लेखनी से राष्ट्रहित व समसामयिक विषयों पर निरंतर वैचारिक योगदान करती हैं।)


 

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