राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

बचपन की यादें जब स्मृतियों में आकार लेती हैं, तो मन कौतूहल और प्रसन्नता से भर जाता हैं। बचपन यादों का पिटारा है, जिनमें रंग-बिरंगी और मजेदार यादें समाहित रहती हैं। अवसर पाकर ये यादे हमारी आँखों के सामने नाचने लगती हैं। जब हम छोटे थे तो सभी बच्चे परस्पर मिल कर जनौला बुझते थे। उन जनौला में एक जनौला था ‘‘परपोड़ी अउ रानो के बीच, कोन गाँव हे जानो?
लाख कोशिशों के बावजूद इसका उत्तर हम नहीं जान पाते थे। तब पूछने वाला संकेत देता था कि जनौला का उत्तर जनौला में ही हैं। तब भी उत्तर समझ से परे होता था। पूछने वाला ही बताता था कि परपोड़ी और रानो के बीच में जो गाँव पड़ता है, उसका नाम "जानो" है। हम बच्चे मुस्करा देते थे। लेकिन कैसे मानें कि परपोड़ी और रानो के बीच में जानो गाँव है। इसे तो प्रत्यक्षतः वहाँ जाकर जानना चाहिए तभी माना जायेगा कि यह जनौला है और सही है। दरअसल जनौला में (पहेली) प्रत्यक्षीकरण या अनुभूति का होना आवश्यक है। यह पहेली की एक विशेषता है।
हमारी बड़ी भाभी साल्हेकला गाँव से आई है। साल्हेकला परपोड़ी से लगभग 8 कि.मी. दूर है। अब आवागमन के लिए पक्की सड़क है। पहले गाड़ा रवान व पैडगरी से होकर आना-जाना पड़ता था। मैं भईया के साथ बचपन में कभी-कभार साल्हेकला जाता था तो भईया की बचपन में यही पहेली बूझते थे। उत्तर तो मैं बता देता था। लेकिन प्रत्यक्ष अनुभूति उस मार्ग से आने-जाने में हुई।
परपोड़ी से दक्षिण दिशायें 3 कि.मी. पर जानो गाँव व जानो से दो ढाई कि.मी. (जानों ग्राम बसा है।) फिर दो-ढाई कि.मी. दूरी पर है साल्हे कला जो कि दुर्ग जिला के अंतिम छोर का गाँव है। इस तरह यह जनौला आज भी स्मृतियों के साथ जुड़ा है। जानों ग्राम की ओर भी विशेषताएं हैं।
हमारे गाँव गंडई के साप्ताहिक व बाजार की बड़ी प्रसिद्धि हैं। गंडई का बाजार राजनांदगांव व जिले के साथ-साथ आस-पास का सबसे बड़ा बाजार है। इसी बाजार के कोटना (पत्थर का चौकाई नाद) जिसमें पशुओं को दाना-भूसा खिलाया जाता है, पानी पिलाया जाता है। और पत्थर की बनी कुर्सियाँ, जिन्हें कच्चे मकानों के बरामदे में मुड़वा (लकड़ी के नीचे लगाया जाता है)। और वाहना (ओखले) बेचने के लिए आते थे।

पत्थर से निर्मित इन तीनों वस्तुओं को देखकर बड़ा आश्चर्य होता था। लम्बे चौड़े पत्थर को छिनी हथोरा के द्वारा लगभग एक फीट गहरा खोदा जाता है। पत्थर की कुर्सी छोटी किन्तु कलात्मक होती हैं। इन्हें देखकर सिर कारीगरों के श्रम के आगे स्वमेव नतमस्तक हो जाता है। पिताजी बताते थे कि कोटना और कुर्सी जानों गाँव में बनाए जाते है। वहाँ पत्थरों का खदान है। पिताजी ने यह भी बताया कि हमारे गाँव में टिकरीपारा दईहान में जो बजरंग बली की मूर्ति है वह जानों में ही बनी है। कहने का आशय यह कि जनौला में जो जानों’ गाँव है वह कारीगरों, मूर्तिकारों और कलाकारों का गांव है। बचपन में जानों गाँव से निकलते हुए बरगद पेड़ के नीचे कुछ कारीगरों, कलाकारों को कोटना, कुर्सी व मूर्तियाँ बनाते हुए देखा था। पर उनके निकट जाकर उनका हाल-चाल जानने का अवसर काफी दिनों के बाद मिला।
बरगद पेड़ से थोड़ी दूर पर एक छोटी सी छपरी बनी है, जिसमें एक वृद्ध अपने छेनी व हथोड़ी से शेर की मूर्ति को आकृति दे रहे थे। उनकी तल्लीनता को में थोड़ी देर खड़े-खड़े देखता रहा, वे अपने काम में लगे रहे। मैंने उन्हें ‘राम राम’ कहा। उन्होंने भी ‘राम-राम’ कहकर बैठने का इशारा किया। मैं उनके नजदीक एक चौखट पत्थर पर बैठ गया। उन्होंने ही पूछा -कहाँ ले आये हव? मैने कहा- गंडई ले। ’ वे खुश हो गए फिर बोले ‘‘गंडई में मोर भाई रहिथे। ‘‘ तब तक मैं उस वृद्ध के चेहरे को देखकर अनुमान लगा लिया था कि ये कौन है? मैने कहा - लखन दास मानिकपुरी।’’ उन्होंने कहा- ‘‘हव तै कइसे जानथस? ’’ मैने कहा- ‘‘ओ मोर संगवारी ये ग्रामीण बैंक में मैनेजर रिहिन, साल -दूसाल होय हे रिटायर होय। बहुत पहिली बताय रिहिन आपने कला के बारे में। आज आपके दरसन पाके मैं धन्य होगेंव। ‘‘यह सुनकर मेरे प्रति उनकी आत्मीयता जागी।
मैने कहा- ‘‘आपके कला के बारे में कुछ जानना है।’’ वे सहर्ष तैयार होगए। आषाढ़ का महिना था, दोपहर के समय, बारिश नही होने के कारण उमस थी। लेकिन आत्मीयता के सुखद झोरे से मन को शीतलता का अहसास हो रहा था। और आँखें संतृप्त हो रही थी कलाकार की कला को देखकर। पूछने पर उन्होने अपना नाम बताया मनहरण दास मानिकपुरी।
मनहरण दास मानिकपुरी जी की उम्र लगभग 72 वर्ष है इस उम्र में भी स्वस्थ है। तीन भाइयों में बड़े है, मंझलें भाई डोड़री गाँव में कोतवाली करते है। छोटे भाई लखनदास मानिकपुरी गंडई में रहते है जो ग्रामीण बैंक से सेवानिवृत हुए हैं। मानिकपुरी जी ने बताया कि मूर्तिकला उन्हें विरासत में मिली है। उनके दादा श्री चेतन दास और पिता श्री चुनुदास भी पत्थर की मूर्तियां बनाते थे। मेरा लड़का प्रदीप दास भी मूर्तिकला में संलग्न है। वह दुर्ग के उजाला भवन में मूर्तिकार के रूप में नौकरी कर मूर्तियों का निर्माण करता हैं।
जहाँ पर मनहरण दास मानिकपुरी अपने कला कौशल से मूर्तियों का निर्माण करते है, उसी स्थान पर दो और मूर्ति-निर्माण के स्थल दिखाई पड़े। मैने पूछा- ‘‘ इन दोनों स्थानों पर जो मूर्तियाँ बनाते हैं, वे कौन है? उन्होंने बताया कि एक झन मोर चेला केशव कौशल ये अउ दूसर ह ओखरे भाई रमेश कौशल थे। ’’ मनहरण दास जी ने अपनी कला को अपने परिवार तक ही सीमित न रखकर शिष्यों को भी कला का गुर सिखाया है, यह अनुकरणीय हैं।
मूर्ति निर्माण के लिए पत्थर उन्हें जानों पत्थर खदान से ही मिल जाता है। मूर्ति निर्माण के लिए विशेष पत्थरों की पहचान कर उन्हें खरीदा जाता है। फिर वे अपनी श्रम साधना से कठोर पत्थर को धीरे-धीरे हथौड़े मारकर छेनी की सहायता से मनचाहा आकार देते है। लोग कहते है कि पत्थर बोलता नही, लेकिन ऐसा नही हैं। मूर्ति निर्माण के समय छेनी पड़ने पर जो आवाज आती है, उससे संगीत झरता हैं। मूर्तिकार के माथे से जो पसीना झरता है, उससे निष्प्राण पत्थर निखरता है। जब पत्थर निखर कर छेनी हथौड़े की मार खाकर तैयार हो जाता है, तब निष्प्राण होकर भी ऐसा लगता है वह मूर्ति बोलने को तैयार है। कला और कलाकार निष्प्राण को भी प्राणवान बना देते है। ये हमारे प्राचीन धरोहरों से ज्ञात होता है।

शिल्पकार मनहरण दास मानिकपुरी
जानों के कोटना, बाहना व कुर्सी बनाने वाले तो प्रायः प्रत्येक घरों में है, लेकिन मूर्तियाँ बनाने वाले तीन ही कलाकार है। ईंट व क्रांकीट के भरान बनने के कारण पत्थर की कुर्सियॉं अब नहीं बनती और नहीं कोटने का निर्माण होता है। क्योंकि गाँवों में भी अब पशुपालन के प्रति अरूचि दिखाई पड़ती है। टैक्टर आ जाने के कारण किसान बैल नही रखते है। गायों की तो बात ही न पूछों गाएं लावारिस घूम रही है। अतः कोटना, बाहना व कुर्सी बनाने वालों ने अपना काम बंद कर दिया है। जानों में अधिकतर धार्मिक मूर्तियां का निर्माण होता है। इनमें बजरंग बली, राम लक्ष्मण, दुर्गा माता, गणेश, काली माई, शीतला माता, संतोषी माता, शिव लिंग, नंदी, शेर, हाथी, प्रमुख हैं। लाल पत्थर से निर्मित इन मूर्तियों का आकर्षक बनाने के लिए पेंट भी किया जाता है। संगमरमर पत्थर से निर्मित एवं मूर्ति मिनीमाता की रखी हुई दिखाई पड़ी जो अधूरी है। मेरे पूछने पर मनहरण दास जी ने बताया कि संगमरमर पत्थर जबलपुर से लाया गया है। यह लाल पत्थर की अपेक्षा कठोर होता है। मूर्ति का जिसने आर्डर दिया था, उसकी मृत्यु हो जाने के कारण मिनीमाता की मूर्ति अधूरी है। जानों के मूर्तिकार चार-पाँच फीट तक की मूर्तियों का निर्माण करते हैं। पूछने पर मनहरण दास जी ने बताया कि उनके द्वारा निर्मित धार्मिक मूर्तियाँ दूर-दूर तक जाती हैं। उन्होंने साढ़े पांच फीट की राम-लक्ष्मण की मूर्ति बनाई है, जो गंडई के राम मंदिर में विराजित हैं। यह उनके द्वारा बनाई गई सबसे ऊँची मूर्ति हैं।
मैने उनसे पूछा कि ‘‘गंडई में जो प्राचीन शिव मंदिर है वह मूर्ति कला का अप्रतिक उदाहरण है, उसे आपने देखा है?’’ उ0न्होंने सदभाव से कहा कि ‘‘नहीं गुरूजी नई देखे हव। फेर हाँ भोरमदेव अउ सहसपुर के मंदिर ल देखे हवं। हमन वइसन कलाकारी नई कर सकन। ओ मंदिर मन तो छैमसी रात में बने हैं।’’ मनहरण दास बहुत ही सहज और सरल है, निरभिमानी। इंदिरा कला संगीत विश्व विद्यालय खैरागढ़ में मूर्तिकला की पढ़ाई का जिक्र किया तो उन्होंने बताया कि वहाँ के विद्यार्थी मेरे पास पत्थर के लिए आते हैं, उन्हें मैं जानों पत्थर खदान से पत्थर दिलाने में सहयोग करता हूं। मूर्ति निर्माण के लिए छेनी हथौड़े के स्थान पर आधुनिक उपकरणों की चर्चा की तब कहा कि ‘‘मैं छेनी अउ हथौड़ा ले ही मूर्ति बनाथवॅं, मोर लइका अउ मोर चेला ह मशीन मन के उपयोग करथे। मैं हा ये जयपुर ले लाय पत्थरा मन के उपयोग करथों। एखर से मूर्ति म सफाई आथे। ये पथरा ह 500 रूपिया किलो में मिलथे।’’ उन्होंने जयपुरी पत्थर को दिखाते हुए कहा।
मनहरण दास जी की एकाध एकड़ ही खेती है, जिसे वे अधिया दे देते है। मशीन से मूर्ति निर्माण के समय गरदा उड़ता है इसलिए स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए उन्हें डाक्टर ने मशीन का उपयोग न करने की सलाह दी है। मनहरणदास जी ने यह भी बताया कि युवावस्था में वे रायपुर में रहकर रेल्वे में ठेकेदारी में मजदूरी का कार्य करते थे। रायपुर में रहकर उन्होंने तब के नामी पेंटर मुकुद, पंचू व वेकटशव को देखकर पेंटिग का भी कार्य किया। लेकिन पेंटर व्यवसाय मूर्तिकला ने उन्हें ज्यादा प्रभावित किया। इसलिए रायपुर से लौटकर गाँव में ही मूर्ति निर्माण में रम गए।
मूर्ति निर्माण से कितना लाभ हो जाता है? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि लाभ कुछ नही होय बस परिवार का गुजर-बसर हो जाता है। संतोषी माँ की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए बताया कि ‘‘ये हा साढे सात हजार के मूर्ति ये। येला बनाय बर बीस दिन लगे है। अभी पेंट करना बाकी है।’’ यह कहते हुए कुछ निराश दिखे लेकिन परिवार का गुजर-बसर हो जाता है, इस बात की उन्हें संतुष्टि थी। कलाकार संतुष्टि में जीता हैं। मनहरणदास मानिकपुरी जी जैसे हजारों कलाकार कला की सेवा कर संतुष्टि हैं। क्या संतुष्टि की काफी है? नहीं। आर्थिक मदद के साथ काम दे। अन्यथा मंदिर और मूर्तियों में प्राण डालने वाले ये कलाकार और मूर्तिकार अभाव में जी कर निष्प्राण होते रहेगें। पहेली में व्यक्त जानों ग्राम को सब जाने और माने यही इस लेख का उद्देश्य है। मनहरण दास जी की कला को प्रणाम।
आलेख
डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.) मो. नं. 9424113122
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