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नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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किसानों का पर्व हरियाली (हरेली)

किसानों का पर्व हरियाली (हरेली)

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति बहुत ही समृद्ध है। यहाँ की पावन धरा अपनी लोक संस्कृति, परंपराओं और पर्वों के लिए विख्यात है। यहाँ का लोकजीवन प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहाँ अनेक त्योहारों का संगम है। इसलिए छत्तीसगढ़ को त्योहारों का गढ़ कहेंगे तो कोई अति संयुक्ति नहीं होगी। छत्तीसगढ़ में हिन्दू पंचांग के अनुसार बैसाख महीने में अक्षय तृतीया (अक्ति) के दिन से ही किसानों का नववर्ष शुरू हो जाता है। इस पर्व के दिन, किसान अपने बीजों का परीक्षण करने के लिए शगुन के रूप में खेतों की जुताई और बोवाई करते हैं। किन्तु जब तपती ज्येष्ठ (जेठ) के बाद आषाढ़ माह में काले-काले बादल की गरज और चमक के साथ बरखारानी का आगमन होता है तो धरती से सौंधी-सौंधी मिट्टी की खुशबू आने लगती है। वर्षा ऋतु के आगमन से धरती माँ की प्यास बुझ जाती है तब किसान अपने खेतों में धान की बोवाई करते हैं। लगभग महीने भर में चारों तरफ खेतों में हरी-भरी फसल लहलाने लगती है। ऐसे लगता है जैसे धरती ने धानी चूनर ओढ़ ली हो।

श्रावण मास में प्रकृति हरीतिमा से आच्छादित हो जाती है।  हरे-भरे उन्नत फसलों को देखकर किसानों का मन आनंद उल्लास से भर जाता है। तब इसी श्रावण मास में अमावस्या के दिन किसान हरियाली त्यौहार मनाते हैं। इस पर्व को ग्रामीण क्षेत्र में हरेली पर्व के नाम से जाना जाता है। यह छत्तीसगढ़ का पहला लोक पर्व माना जाता है। इस पर्व में किसान अपने धान की बोवाई और रोपाई का काम पूर्ण हो जाने की खुशी प्रकट करते हुए प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए यह त्योहार मनाते हैं।

हरेली का अर्थ ही होता है ‘हरियाली’। यह त्यौहार प्रकृति पूजन का त्यौहार है। इस त्यौहार में किसान अपने कृषि के प्रति अथक परिश्रम करते हैं और अन्न उगाकर लोगों का पेट भरते हैं, इसी कारण अन्नदाता कहलाते हैं। यह पर्व किसानों का सम्मान का पर्व है। यह पर्व मूलतः पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा है। स्वच्छ पर्यावरण ही स्वस्थय मानव मस्तिष्क  का निर्माण करता है। यह पर्व संदेश देता है कि स्वच्छ पर्यावरण ही तन और मन को स्वस्थ व निरोग रखता है।

हरेली का महत्व- 
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और कृषक समाज के लिए हरेली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर कृषि संस्कृति और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। इस दिन गाँव-गाँव में किसान हर्ष और उल्लास के साथ कृषि यंत्र  जैसे- हल, कुदारी, रापा, नांगर, गैंती सभी लोहे और लकड़ी के औजारों की साफ-सफाई कर उनकी धूप, दीप और फूलों से पूजा करते हैं। साथ ही, प्रकृति और ईश्वर से अच्छे फसल की कामना करते हैं।

किसानों का मित्र होता है उनके पशु। जो उनको कृषि कार्य में मदद करते हैं। इसी कारण हरेली को किसानों का मित्र पशुधन का त्योहार भी कहा जाता है। यह पशुधन पारम्परिक खेती में किसानों के लिए बहुत ही महत्व पूर्ण है क्योंकि खेती-किसानी में बैल, भैंस, गाय अहम योगदान देते हैं। इसी कारण किसान अपने पशुधन का हरेली के दिन सम्मान करते हैं। इस दिन बैल व गायों की विशेष सेवा की जाती है। उन्हें नमक और आटा का मिश्रण( लोंदी) और औषधीय पत्तियाँ खिलाई जाती हैं ताकि वे बीमारियों से सुरक्षित रहें।

फसल सुरक्षा और पूजा-पाठ की मान्यता- 
हरेली पर्व में फसल की सुरक्षा और उनके बचाव के लिए विधि-विधान के साथ ग्रामीण जन पूजा-पाठ करते हैं।  इस दिन शाम को नीम और अन्य औषधीय पौधों  की शाखाएँ घरों व खेतों में लगाई जाती हैं। यह कार्य यादव समाज के लोग घर-घर जाकर नीम की पत्तियाँ को लगाते हैं। मान्यता है कि इससे फसल बुरी नजर, कीट-पतंगों और नकारात्मक शक्तियों से बची रहती है। इससे घर की नकारात्मक शक्तियाँ, कीटाणु आदि दूर होते हैं और घर में एक अच्छा वातावरण का प्रभाव पड़ता है। 

हरियाली में पारम्परिक खेल और गेड़ी का महत्व-
हरेली पर्व को गेड़ी त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गेड़ी का एक विशेष ही महत्व होता है। इस दिन गाँव-गाँव में गेड़ी प्रतियोगिता होता है। बच्चे और बूढ़े गेड़ी दौड़ में भाग लेते हैं। हरेली का मुख्य आकर्षण गेड़ी (बाँस की लकड़ी से बनाई गई ऊँची घोड़ी के समान होती है) है। युवा और बच्चे गेड़ी पर चढ़कर दौड़ और तरह-तरह के करतब दिखाते हैं। छोटे छोटे बच्चे इसे बड़ी मजे के साथ चलते हैं। हरेली के दिन ग्रामीण लोग खो-खो, कबड्डी, रस्सा खींच आदि खेल का आयोजन करते हैं। इसमें सभी ग्रामीण स्त्री-पुरुष और बच्चे भाग लेकर उत्सव का आनंद उठाते हैं। इस दिन घरों में गुड़ और गेहूँ व चावल के आटे से चीला, गुलगुला भजिया और पारम्परिक व्यंजन बनाए जाते हैं। इसी पारम्परिक व्यंजन से किसान अपने ठाकुरदेव को भोग लगाते हैं।

भारत के अन्य राज्यों में हरेली पर्व के विविध रूप -
भारत विविधताओं का देश है। यहाँ जिस तरह छत्तीसगढ़ में 'हरेली' मनाई जाती है, उसी भावना और उद्देश्य के साथ देश के अन्य राज्यों में भी प्रकृति व कृषि-उपासना के विभिन्न पर्व अलग-अलग रूपों और नामों से मनाए जाते हैं:-

उत्तराखंड –  उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में सावन संक्रांति के समय हरेला पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। हरेली की तरह ही यह हरियाली, नई फसल और खुशहाली का प्रतीक है। त्योहार से 9-10 दिन पूर्व 5 या 7 प्रकार के अनाज बोए जाते हैं, जिसे 'हरेला' कहते हैं और पूजन के बाद इसे घर के बुजुर्गों द्वारा कानों के पीछे लगाया जाता है। जैसे छत्तीसगढ़ में जँवारा भोजली कहते हैं वैसे ही उत्तराखंड में यह पर्व होता है।

पंजाब एवं हरियाणा –  पंजाब और हरियाणा में सावन के महीने में हरियाली तीज मनाई जाती है। यहाँ की महिलाएँ और लड़कियाँ झूला झूलती हैं और हरियाली के स्वागत में लोकगीत गाती हैं।

छत्तीसगढ़ की 'हरेली' हमारी संस्कृति की उस मूल आत्मा को दर्शाते हैं जो अपनी मिट्टी, नदियों, पशुधन और कृषि औजारों को ईश्वर तुल्य मानकर पूजती हैं। प्रकृति संतुलन और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला यह पर्व हमारी समृद्ध लोक-संस्कृति का अनमोल धरोहर है।

डॉ पद्‌मा साहू पर्वणी 
खैरागढ़ छत्तीसगढ़

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