18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
December 16, 2025
संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

होली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। भारतीय संस्कृति का अनूठा संगम उनकी त्योहारों और पर्वो में दिखाई देता है। इन पर्वो में न जात होती है न पात, राजा और रंक सभी एक होकर इन त्योहारों को मनाते हैं। सारी कटुता को भूलकर अनुराग भरे माधुर्य से इसे मनाते हैं। इसीलिए होली को एकता, समन्वय और सदभावना का राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। होली के आते ही धरती प्राणवान हो उठती है, प्रकृति खिल उठती है और कवियों का भावुक नाजुक मन न जाने कितने रंग बिखेर देता है अपनी गीतों में। देखिये इसकी एक बानगी पेश है:-
होली का त्योहार मनायें
ले लेकर अबीर होली में
निकलें मिल जुलकर टोली में
बीती बातों को बिसराकर
सब गले मिलें होली में
पिचकारी भर भरकर
सबको हंसकर तिलक लगायें
आओं मिलकर होली मनायें।
गांवों में बसा हमारा भारत ग्राम्य संस्कृति में घुले मिले रचे बसे लोग मांगलिक प्रसंगों पर लोकगीत गाकर वातावरण को लुभावना बना देते हैं। गांवों में नगरीय सभ्यता से जुड़े मंच नहीं होता। यहां के लोग धरती के गीत गाते हैं और उन्हीं में हमारे पर्व और त्योहारों की झांकी होती है। संभवतः समूचे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां के पर्व और मांगलिे प्रसंग आपस में जोड़ने का काम करते हैं। होली का पर्व या दीपावली का, उसमें भारतीयता झलकती है। हसरत रिसालपुरी के शब्दों में-
मुख पर गुलाल लगाओ
नयनयन को नयनों से मिलाओ
बैर भूलकर प्रेम बढ़ाओ
सबको आत्मज्ञान सिखाओ
आओ प्यार की बोली बोलें
हौले हौले होली खेलें।
भारत में वैसे पर्व और त्योहार इतने हैं उतने कहीं नहीं है। यहां हर दिन किसी न किसी उत्सव से जुड़ा है। इनमें हमारा धर्म, हमारी सभ्यता और संस्कृति के साथ साथ आध्यात्म जुड़ा होता है। ब्रज की होली या कहीं और की, उनमें समूचा भारतीय समाज रचा बसा है। कवि इन पर्व प्रसंगों को अपने जीवन का सहचर मानता है। कवि पद्माकर का यह छंद अनूठा और होली को रंगमय बनाने वाला है:-
एकै संग धाये नंदलाल अउ गुलाल दोउ
दृगन नये ते भरि आनंद मढ़ै नहीं।
धोय धोय हारी पद्माकर तिहारी सोय
अब तो उपजाऊ एकौ चित में चढ़ै नहीं।
कैसे करौं, कहां जाओंष् कासे कहां बावरी
कोउ तो निकारो जाओ दरद बढ़ै नहीं।
ऐरी मेरी बोर जैसे तैसे इन आंखिन में
कढ़ियो अबीर पै अहीर तो कढ़ै नहीं।
ऐसे रंगों से सराबोर होली को खेेेेलने में भला देवतागण भला पीछे क्यों रहे ? राधा-कृष्ण की होली के रंग ही कुछ और है। ब्रज की होली का रंग ही निराला है। अपने श्यामा श्याम के संग रंग में रंगोली बनाकर ब्रजवासी भी होली खेलने के लिये हुरियार बन जाते हैं और ब्रज की नारियां हुरियारिनें के रूप में साथ होते हैं और चारों ओर एक ही स्वर सुनाई देता है-
आज बिरज में होली रे रसिया
होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भए बादर
केसर रंग में बोरी रे रसिया।
बाजत ताल मृदंग झांझ ढप
और मजीरन की जोरी रे रसिया।
फेंक गुलाल हाथ पिचकारी
मारत भर भर पिचकारी रे रसिया।
इतने आये कुंवरे कन्हैया
उतसों कुंवरि किसोरी रे रसिया।
नंदग्राम के जुरे हैं सखा सब
बरसाने की गोरी रे रसिया।
दौड़ मिल फाग परस्पर खेलें
कहि कहि होरी होरी रे रसिया।
इतना ही नहीं वह श्याम सखाओं को चुनौती देती है कि होली में जीतकर दिखाओ। उनमें ऐसा अद्भूत उत्साह जागृत होता है कि सब ग्वाल-बालों को अपना चेला बनाकर बदला चुकाना चाहती हैं। जिन ब्रज बालों ने अटारी में चढ़ी हुई ब्रज गोपियों को संकोची समझा था, आज वे ही होली खेलने को तैयार हैं। पेश है इस दृश्य की एक बानगी:-
होरी खेलूंगी श्याम तोते नाय हारूं
उड़त गुलाल लाल भए बादर
भर गडुआ रंग को डारूं
होरी में तोय गोरी बनाऊं लाला
पाग झगा तरी फारूं
औचक छतियन हाथ चलाये
तोरे हाथ बांधि गुलाल मारूं।
फिर क्या था ब्रज में होली की ऐसी धूम मची कि सब रंग में सराबोर हो गये। जिसका जैसा वश चला उसने वैसी ही होली खेली। श्रीकृष्ण ने भी घाघर में केसर रंग घोला है और झोली में अबीर भरा है। उड़ते गुलाल से लाल बादल सा छा गया है। रंग से भरी यमुना बह रही है। ब्रज की गलियों में राधिका होली खेल रही है, रंग से भरे ग्वाल-बाल लाल हो गये हैं:-
होरी खेलत राधे किसोरी बिरिजवा के खोरी।
केसर रंग कमोरी घोरी कान्हे अबीरन झोरी।
उड़त गुलाल भये बादर रंगवा कर जमुना बहोरी।
बिरिजवा के खोरी।
लाल लाल सब ग्वाल भये, लाल किसोर किसोरी।
भौजि गइल राधे कर सारी, कान्हर कर भींजि पिछौरी।
बिरिजवा के खोरी।
अयोध्या में श्रीराम सीता जी के संग होली खेल रहे हैं। एक ओर राम लक्ष्मण भरत और शत्रृघन हैं तो दूसरी ओर सहेलियों के संग सीता जी। केसर मिला रंग घोला गया है। दोनों ओर से रंग डाला जा रहा है। मुंह में रोरी रंग मलने पर गोरी तिनका तोड़ती लज्जा से भर गई है। झांझ, मृदंग और ढपली के बजने से चारों ओर उमंग ही उमंग है। दंवतागण आकाश से फूल बरसा रहे हैं। देखिए इस मनोरम दृश्य की एक झांकी
खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुहन,
उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।
छिरकत जुगल समाज परस्पर
मलत मुखन में रोरी, बाजत तृन तोरी।
बाजत झांझ, मिरिदंग, ढोेलि ढप
गृह गह भये चंहु ओरी, नवसात संजोरी।
साधव देव भये, सुमन सुर बरसे
जय जय मचे चंहु ओरी, मिथलापुर खोरी।
होली के दूसरे दृश्य में, रघुवर और जनक दुलारी सीता अवधपुरी में होली खेल रहे हैं। भरत, शत्रुघन, लक्ष्मण और हनुमान की अलग अलग टोली बन गयी है। पखावज का अपूर्व राग बज रहा है, प्रेम उमड़ रहा है और सभी गीत गा रहे हैं। थाली में अगर, चंदन और केसरिया रंग भर रहे हैं। सभी अबरख, अबीर, गुलाल, कुमकुम रख रहे हैं। माथे पर पगड़ी रंग गयी है और गलियों में केसर से कीचड़ बन गया है। इस दृश्य की एक बानगी पेश है:-
खेलत अवधपुरी में फाग, रघुवर जनक लली
भरत, शत्रुहन, लखन, पवनसुत, जूथ जूथ लिए भाग।
बजत अनहद ताल पखावज, उमगि उमगि अनुराग
गावत गीत भली।
भरि भरि थार, अगरवा, केसर, चंदन, केसरिया भरि थार
अबरख, अबीर, गुलाल, कुमकुमा, सीस रंगा लिए पाग।
केसर कीच गली।
तीसरे दृश्य में जानकी, श्रुति, कीर्ति, उर्मिला और मांडवी के साथ होली खेल रही हैं:-
जानकी होरी खेलन आई
श्रुति, कीरति, उरमिला, मांडवी, संग सहेली सुलाई
केसर रंग भरे घर केचन चंदर गंध मिलाई
पीत मधु छिरकत आयी है, संग लिये सभ भाई
कर कंचन पिचुकारी हाथ लिये चलि आयी।
जब राधा-कृष्ण ब्रज में और सीता-राम अयोध्या में होली खेल रहे हैं तो भला हिमालय में उमा-महेश्वर होली क्यों न खेलें ? हमेशा की तरह आज भी शिव जी होली खेल रहे हैं। उनकी जटा में गंगा निवास कर रही है और पूरे शरीर में भस्म लगा है। वे नंदी की सवारी पर हैं। ललाट पर चंद्रमा, शरीर में लिपटी मृगछाला, चमकती हुई आंखें और गले में लिपटा हुआ सर्प। उनके इस रूप को अपलक निहारती पार्वती अपनी सहेलियों के साथ रंग गुलाल से सराबोर हैं। देखिए इस अद्भूत दृश्य की झांकी:-
आजु सदासिव खेलत होरी
जटा जूट में गंग बिराजे अंग में भसम रमोरी
वाहन बैल ललाट चरनमा, मृगछाला अरू छोरी।
तीनि आंखि सुन्दर चमकेला, सरप गले लिपटोरी
उदभूत रूप उमा जे दउरी, संग में सखी करोरी
हंसत लजत मुस्कात चनरमा सभे सीधि इकठोरी
लेई गुलाल संभु पर छिरके, रंग में उन्हुके नारी
भइल लाल सभ देह संभु के, गउरी करे ठिठोरी।
शिव जी के साथ भूत-प्रेतों की जमात भी होली खेल रही है। देखिए इसकी एक झांकी:-
सदासिव खेलत होरी, भूत जमात बटोरी
गिरि कैलास सिखर के उपर बट छाया चंहुओरी
पीत बितान तने चंहु दिसि के, अनुपम साज सजोरी
छवि इंद्रासन सोरी।
आक धतूरा संखिया माहुर कुचिला भांग पीसोरी
नहीं अघात भये मतवारे, भरि भरि पीयत कमोरी
अपने ही मुख पोतत लै लै अद्भूत रूप बनोरी
हंसे गिरिजा मुंह मोरी।
औघड़ बाबा शिव जी की होली को देखकर सभी स्तुति करने लगते हैं कि हे बाबा ! हमारे नगर में निवास करो ओर हमारे दुख हरो:-
बम भोला बाबा, कहवां रंगवत पागरिया
कहवां बाबा के जाहा रंगइले और कहवां रंगइलें पागरिया
कासी बाबा के जाहा रंगइले आरे बैजनाथ पागरिया
तोहरा बयल के भूंगो देवो भंगिया देइबि भर गागरिया
बसे हमारी नगरिया हो बाबा, बसे हमारी नगरिया।
देवताओं की होली को देखकर मन उनकी भक्ति में रम जाता है। ईश्वर का गुणगान करो, ताली बजाओ और सभी के संग होली खेलो। चित चंचल है अपने रंगीले मन को ईश्वर की भक्ति में रंग लोकृ
रसिया रस लूटो होली में,
राम रंग पिचुकारि, भरो सुरति की झोली में।
हरि गुन गाओ, ताल बजाओ, खेलो संग हमजोली में
मन को रंग लो रंग रंगिले कोई चित चंचल चोली में
होरी के ई धूमि मची है, सिहरो भक्तन की टोली में।
आलेख
प्रो (डॉ) अश्विनी केसरवानी, चांपा, छत्तीसगढ़
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