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खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय

खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय

खैरागढ़, छत्तीसगढ़ का नवगठित जिला होते हुए भी एशिया के प्रथम संगीत विश्वविद्यालय के कारण वैश्विक पहचान रखता है। 1956 में राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और महारानी पद्मावती देवी ने अपनी पुत्री इंदिरा की स्मृति में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना की, जहाँ संगीत, नृत्य और ललित कलाओं में स्नातक से पीएचडी तक अध्ययन होता है। वर्तमान में यह संस्थान कला, शोध, रोजगार और सांस्कृतिक पर्यटन का एक ख्यातिलब्ध केंद्र है।

रियासतकालीन भारत में छत्तीसगढ़, जो तत्कालीन मध्यप्रांत एवं बरार का भाग था, कुल 14 रियासतों में विभाजित था। इन्हीं में से एक रियासत खैरागढ़ थी, जो आज छत्तीसगढ़ का एक नवगठित जिला है (31वां जिला, गठन वर्ष 2022)। भौगोलिक दृष्टि से छोटा होने के बावजूद खैरागढ़ को संपूर्ण विश्व, विशेषकर एशिया महाद्वीप में विशिष्ट पहचान प्राप्त है।

छत्तीसगढ़ को एक पिछड़े राज्य की छवि से बाहर निकलने में जहाँ कई दशक लगे, वहीं खैरागढ़ ने बहुत पहले ही अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान स्थापित कर ली थी।

इसका कारण न तो कोई प्राकृतिक पर्यटन स्थल है और न ही कोई भौगोलिक विशेषता, बल्कि यहाँ स्थापित एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय है । वर्ष 1956 में स्थापित इस कला एवं संगीत विश्वविद्यालय में ललित कलाओं से संबंधित स्नातक, स्नातकोत्तर और पी.एच.डी. स्तर के पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय - खैरागढ़
एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय - खैरागढ़

छत्तीसगढ़ की मिट्टी से उपजी कला और संस्कृति की सुगंध केवल प्राचीन मंदिरों तक सीमित नहीं रही है। खैरागढ़ कोई साधारण स्थान नहीं, बल्कि वह भूमि है जिसका नाम एशिया के संगीत और ललित कला के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

यह कहानी एक ऐसी रियासत की है, जहाँ राजप्रासाद की दीवारें केवल राजसी वैभव की नहीं, बल्कि एक गहन मानवीय संवेदना की कथा कहती हैं । अल्पायु में अपनी दिवंगत पुत्री के प्रति शोकाकुल होते हुए भी, उसके संगीत-प्रेम और माँ सरस्वती के प्रति श्रद्धा को सजीव रखने के उद्देश्य से, खैरागढ़ के शासक और उनकी पत्नी ने अपने महल में एशिया के प्रथम संगीत विश्वविद्यालय की नींव रखी।

राजा वीरेंदर बहादुर,रानी पद्मावती एवं राजकुमारी इंदिरा
राजा वीरेन्द्र  बहादुर,रानी पद्मावती एवं राजकुमारी इंदिरा

खैरागढ़ रियासत तब विशेष रूप से प्रकाश में आई जब राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और महारानी पद्मावती देवी ने अपने जीवन के सबसे कठिन क्षणों को कला के प्रति समर्पित करने का संकल्प लिया। इसी संकल्प का परिणाम था 1956 में स्थापित इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय

उनकी पुत्री का नाम ‘इंदिरा’ था, उन्हीं स्मृति में इस संस्थान को यह नाम दिया गया। सीमित संसाधनों और भौगोलिक दूरियों के बावजूद इस विश्वविद्यालय ने संगीत को एक स्वतंत्र विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दिलाई।

आवश्यक भूमि, भवन, पुस्तकालय और आधुनिक संगीत उपकरण स्वयं राजा-रानी द्वारा प्रदान किए गए । निजी महल, भूमि और बहुमूल्य वाद्य यंत्र दान कर भारतीय शास्त्रीय कला को एक ऐसा केंद्र दिया गया, जहाँ परंपरा और आधुनिकता का संतुलित संगम संभव हो सका।

21 एकड़ में फैला यह विश्वविद्यालय आज एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित है । गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत यहाँ स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध स्तर के पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

स्नातक स्तर पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य (कथक, भरतनाट्यम), संगीत विज्ञान, चित्रकला और मूर्तिकला की शिक्षा दी जाती है। स्नातकोत्तर स्तर पर संगीत अभियांत्रिकी, भारतीय शास्त्रीय एवं लोक संगीत अनुसंधान, नृत्यशास्त्र जैसे विषय उपलब्ध हैं, जबकि पी.एच.डी. स्तर पर संगीत मनोविज्ञान, शास्त्रीय संगीत सिद्धांत और नृत्य के लाक्षणिक विश्लेषण जैसे शोध-विषय पढ़ाए जाते हैं।

शास्त्रीय नृत्य कत्थक (बाएं), भरतनाट्यम (दाएं)
शास्त्रीय नृत्य कत्थक (बाएं), भरतनाट्यम (दाएं)

भारत के अनेक प्रतिष्ठित संस्थान इस विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं, जिनमें बंगाल फाइन आर्ट्स कॉलेज, ललित कला संस्थान (वाराणसी), नाट्यवेदा प्रदर्शन कला केंद्र (तिरुवनंतपुरम), शासकीय ललित कला संस्थान (धार) और कमलादेवी संगीत महाविद्यालय (रायपुर) प्रमुख हैं।

बांस, नीम और काजू के वृक्षों से घिरे इस शांत परिसर में छात्र न केवल सितार, सरोद और तबले जैसे पारंपरिक वाद्यों में दक्षता प्राप्त करते हैं, बल्कि पियानो और समकालीन नृत्य जैसी आधुनिक कलाओं में भी पारंगत होते हैं।

पेरिस से लेकर कोरिया तक, यहाँ के विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन किया है । विदेशी छात्रों की उपस्थिति स्वयं इस संस्थान की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण है। प्रसिद्ध गायक सोनू निगम भी इसी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं।

खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के पूर्वछात्र - सोनू निगम
खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के पूर्वछात्र - सोनू निगम 

खैरागढ़ का यह प्रभाव केवल कला तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक संरचना को भी प्रभावित किया है। एक छोटा सा कस्बा बीते कई दशकों से पर्यटन, रोजगार और हस्तशिल्प को गति देने वाला केंद्र बन चुका है।

भविष्य की ओर बढ़ते हुए यह संस्थान डिजिटल संगीत मंचों और म्यूजिक थेरेपी जैसे आधुनिक शोध क्षेत्रों के माध्यम से स्वयं को वैश्विक स्तर पर और सशक्त कर रहा है।

खैरागढ़ की यह यात्रा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि महानता आकार से नहीं, बल्कि विचारों की ऊँचाई से निर्धारित होती है। कला-साधकों के लिए यह स्थान एक ऐसी सांगीतिक भूमि है, जहाँ हर स्वर के साथ इतिहास की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

 

 

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