आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल पंचमी | मंगलवार

नक्षत्र: मृगशिरा | योग: शोभन | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

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छोटा नागपुर में करम-पर्व

छोटा नागपुर में करम-पर्व

छोटानागपुर पहले बिहार का एक प्रमुख डिवीजन था, जिसका मुख्यालय राँची में था। तब इस डिवीजन में पांच जिले सम्मिलित थे राँची, पलामू, हजारीबाग, सिंहभूम तथा मानभूम। राज्य पुनर्गठन आयोग की अनुशंसा के आधार पर मानभूम का विभाजन कर दिया गया और इसका वह भाग जो पश्चिम बंगाल से लगा हुआ था, उसे बंगलाभाषी मानकर पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया। इस प्रकार मानभूम जिले का अस्तित्व समाप्त हो गया और उसके स्थान पर धनबाद जिले का गठन किया गया। धीरे-धीरे छोटानागपुर के सभी जिलों का भी विभाजन होता चला गया।

राँची जिले का विभाजन कर तीन नये-नये जिले बनाये गये राँची, गुमला तथा लोहरदगा। हजारीबाग का विभाजन कर उसे हजारीबाग, गिरिडीह तथा कोडरमा जिले का रूप दिया गया। पलामू का विभाजन कर उसे पलामू, गढ़वा तथा चतरा जिले का रूप प्रदान किया गया। धनबाद जिले को दी जिलों में बाँट दिया गया- धनबाद तथा बोकारो। सिंहभूम का विभाजन पूर्वी तथा पश्चिमी सिंहभूम के रूप में किया गया।

छोटानागपुर डिवीजन को भी दो भागों में बांट दिया गया-उत्तरी छोटानागपुर तथा दक्षिणी छोटानागपुर। दक्षिणी छोटानागपुर में पहले के पलामू, राँची तथा सिंहभूम जिले रखे गये और हजारीबाग तथा धनबाद उत्तरी छोटानागपुर के अधीन आ गये। 15 नवम्बर, 2000 को झारखंड नामक जिस नये राज्य का उदय हुआ, उसमें उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर के सभी जिलों के अतिरिक्त बिहार के देवघर, दुमका, गोड्डा, पाकुड़ तथा साहेबगंज के नये जिले भी सम्मिलित हैं।

छोटानागपुर (उत्तरी तथा दक्षिणी) के निवासी दो प्रकार के हैं- आदिवासी तथा गैरआदिवासी। आदिवासी के अंतर्गत उराँव, मुण्डा, खड़िया, हो आदि प्रमुख जनजातियां हैं। यहां के शेष निवासी गैरआदिवासी हैं। इनमें यहां के जो अत्यंत पुराने निवासी हैं, वे "सदान" कहे जाते हैं। हो जनजाति के अतिरिक्त उराँव, मुंडा तथा खड़िया जनजातियों के साथ यहां के सदान हजारों वर्षों से साथ रहते चले आ रहे हैं।

इस सहजीवन के कारण आदिवासी समुदाय की संस्कृति ने सदान संस्कृति को भी प्रभावित किया है और सदान संस्कृति ने भी आदिवासी संस्कृति पर अपना पर्याप्त प्रभाव डाला है। यहां के सदान जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह सदानी, सदरी, सादरी, गाँवारी, नगपुरिया आदि कई नामों से जानी जाती हैं। अब इसका सर्वप्रचलित नाम नागपुरी है।

मुण्डा जनजाति की भाषा मुंडारी कहलाती है। उराँवों की भाषा कुडुख या उराँव है। इसी प्रकार खड़िया जनजाति की भाषा खड़िया है। इन तीनों जनतातियों के अतिरिक्त; (हो जनजाति को छोड़कर) यहां की जो गौण जनजातियां हैं, उनकी अपनी कोई भाषा नहीं है, अतः ये नागपुरी का प्रयोग प्रथम तथा द्वितीय भाषा के रूप में करते हैं। सदानों, मुंडाओं, उराँवों तथा खड़िया जनजाति के लोगों को जोड़ने वाली भाषा नागपुरी ही है।

नागपुरी मूलतः एक आर्यभाषा है, पर इसने जनजातीय भाषाओं को पर्याप्त प्रभावित किया है। इसी तरह यह यहां की जनजातीय भाषाओं से खूब प्रभावित भी हुई है। यह दोनों समुदायों के लम्बे सहजीवन तथा अंतःक्रिया का ही परिणाम है। सिंहभूम, जहां हो जाति का निवास है उसकी संस्कृति अलग है। उस पर न तो वहां के गैरआदिवासी समुदाय का प्रभाव नजर आता है और न हो समाज का ही कोई प्रभाव वहां के गैरआदिवासी समुदाय के जीवन में दिखायी पड़ता है।

सिंहभूम जिले को छोड़कर शेष छोटानागपुर की जो संस्कृति है, वह स्पष्ट नजर आती है और यह छोटानागपुरी संस्कृति के नाम से जानी भी जाती है। इस संस्कृति ने धीरे-धीरे एक ऐसा रूप ग्रहण कर लिया है, जिस पर यहां के आदिवासी तथा गैरआदिवासी लोगों को समान रूप से गर्व है।

यह दोनों की सांझी संस्कृति है और इसकी सर्वप्रमुख विशेषता है-सहअस्तित्व तथा नृत्य-संगीत के प्रति उद्दाम प्रेम एवं समर्पण। इस विशेषता ने यहां के निवासियों की जीवन-शैली पर जो अमिट छाप छोड़ी है, यह उसी का परिणाम है कि सामान्य रूप से ये दोनों समुदाय अभी भी झाड़-फूंक, ओझा, बलि, भूत-प्रेत पूजा, नशा आदि से अपने को पूर्णतः मुक्त नहीं कर सके हैं।

झारखंड के अस्तित्व में आने के बाद अब झारखंडी संस्कृति की बात भी की जाने लगी है। मगर अभी इसकी कोई स्पष्ट अवधारणा सामने नहीं आ सकी है। छोटानागपुर में बिहार के जिन लोगों (देवघर, दुमका, पाकुड़, गोड्डा तथा साहेबगंज) को मिलाकर झारखंड राज्य का गठन हुआ है, वहां की प्रमुख जनजाति हैं- संथाल। इनकी भाषा संथाली है। संथाल छोटानागपुर की कोई भी जनजातीय भाषा (कुडुख, मुण्डारी तथा खड़िया) नहीं जानते।

वे यहां की सम्पर्क भाषा नागपुरी भी नहीं जानते। यही कारण है कि संथालों की संस्कृति छोटानागपुर की संस्कृति से मेल नहीं खाती। किसी भी संस्कृति के विकास में परस्पर अंतक्रिया की विशेष भूमिका हुआ करती है। छोटानागपुर का एक विशेष पर्व है करम या करमा। यह पर्व मूलतः एक जनजातीय पर्व है, पर इसे यहां के आदिवासी तथा सदान हिन्दू समान आस्था, पवित्रता तथा श्रद्धा के साथ मनाते हैं।

करम पर्व इस तथ्य का ज्वलंत प्रमाण है कि यहां के जनजातीय तथा सदान दोनों समुदायों ने कैसे एक दूसरे की आस्था तथा उपासना पद्धति का केवल सम्मान ही नहीं किया है; बल्कि उन्हें आत्मसात कर सहअस्तित्व को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक अनूठा एवं अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत कर दिखाया है। करम पर्व भाद्रपद शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है।

इस पर्व को युवतियां तथा महिलाएं अत्यंत श्रद्धा के  साथ मनाती हैं। कहा जाता है कि करम व्रत करने से भाई का कल्याण होता है। एकादशी की संध्या को उपवास किये हुए युवक करम पेड़ का एक भाग काट कर लाते हैं। इसमें से कुमारी लड़‌कियां तीन डालियां काटकर पूजा स्थल पर गाड़ देती हैं। इन डालियों को करम गोसाई कहते हैं।

रात को पूजा के समय युवतियां तथा महिलाएं उसके चारों ओर थाली में प्रसाद लेकर बैठ जाती हैं। इस अवसर पर पाहन, पुरोहित या कोई जानकार व्यक्ति पूजा करवाता है। पूजा में जो कथा सुनायी जाती है, उसके अनेक रूप मिलते हैं। इन विविध रूपों पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि करमा मूलतः एक जनजातीय पर्व है, किन्तु इस पर हिन्दू सदानों का जैसे-जैसे प्रभाव पड़ता चला गया, करम के अवसर पर कही जाने वाली कथा के रूप में भी परिवर्तन होता चला गया।

 

 

 इस धारणा की पुष्टि नागपुरी तथा यहां की प्रमुख जनजातीय भाषाओं में प्रचलित अनेक गीतों से भी हो जाती है। करम कथा के अनेक रूप इस प्रकार मिलते हैं:-

करम कहानी

यह कथा गुंडाओं के बीच प्रचलित है।

"इस दुनिया में पहले केवल समुद्र था। तब भगवान ने दो कबूतर बनाये और कबूतरों को यह देखने के लिए कि कहीं पेड़ है या नहीं, भेजा। कबूतर इधर-उधर बहुत उड़े लेकिन कहीं पेड़ नहीं दिखायी पड़ा। आखिर हार कर वे लौट गये और हु हु हु करते हुए भगवान के हाथ में जा बैठे। उन्होंने बताया कि कहीं भी पेड़ नहीं है, चारों ओर पानी ही पानी है।

तब भगवान ने अन्य जंतुओं से पूछा कि कौन गंगा की मिट्टी निकाल सकता है? मेंढक ने कहा कि मैं निकालूंगा। वह पानी के भीतर घुसा और मिट्टी निकालने लगा। लेकिन मिट्टी घुल कर छूट गयी। वह निराश होकर लौट आया। भगवान ने उसका कान ऐंठा जिससे उसका कान टूट गया। अभी तक मेंढक के कान नहीं होते हैं।

दूसरी बार केंकड़ा गया। उसने पानी में समाकर मिट्टी खोदी लेकिन वह गल गयी। भगवान ने नाराज होकर उसका सिर कुचल दिया, इसी से अभी तक केंकड़े का सिर नहीं है।

इस प्रकार भगवान ने बारी-बारी से सभी चिड़ियों और जीव-जंतुओं को भेजा लेकिन मिट्टी लाने में किसी को सफलता नहीं मिली। अंत में जोंक ने कमर कसी। वह सिर नीचे करके पानी के भीतर समा गयी। उसने मुंह से मिट्टी खा ली और ऊपर लाकर पाखाना कर दिया। इसी मिट्टी से दुनिया बनी। उसका नाम पूपा देश पड़ा।

भगवान ने उसमें सभी जीव-जन्तुओं को रखा। उसमें एक राजा हुआ जिसके दो लड़के हुए। बड़े का नाम करमा और छोटे का नाम धरमा था। पीछे चलकर वे बहुत गरीब हो गये। इसलिए बड़ा भाई करमा मजदूरी के लिए बहुत दूर चला गया। छोटा घर पर ही रह गया। बहुत दिनों के बाद जब करमा घर लौटने लगा तब उसने घर पहुंचने के पहले धरमा के पास खबर करने के लिए दो सिपाहियों को भेजा।

उस समय धरमा कुडुम्बा वृक्ष की डाल गाड़ रहा था। सिपाहियों ने कहा तुम्हारा भाई करमा बहुत दूर से आया है इसलिए उसकी अगुवानी करने के लिए जाओ। धरमा ने कहा-अभी ठहरी। अभी यहां सात सौ गोपियां और सात सौ रावन नाच रहे हैं। उन्हें तम्बाकू चूना देना है। धरमा की बात सुनकर दोनों सिपाही करमा के पास लौट गये और सारी बात बता दी, करमा ने फिर दूसरे दो सिपाहियों को भेजा।

धरमा ने उनको भी वही उत्तर दिया। इस बार जब दोनों सिपाही लौटे तो करमा को बड़ा क्रोध आया। उसने सोचा, मैं इतना धन कमाकर लाया हूं तब भी वह मेरी अगुवानी नहीं करता। इस जंगली पेड़ का क्या मूल्य है। इससे उसे क्या मिलता है, वह घर पहुंचा और जाते ही पेड़ को उखाड़ कर सात पहाड़ों और सात नदियों के पार फेंक दिया। उसने अपना धन भी नहीं बांटा और अकेले ही रहने लगा।

थोड़े दिन बीतते-बीतते करमा की दशा खराब होने लगी। उधर धरमा के दिन अच्छी तरह कट रहे थे। धान रोपने का समय आया। धरमा ने बहुत से मजदूरों को लगाया और करमा अपनी पत्नी के साथ उसी के यहां मजदूरी करने गया। रोपनी खत्म होने पर वह धरमा के घर वेतन लेने पहुंचा। धरमा ने कहा तुम ठहरो, घर के आदमी हो, मजदूरी तुमको क्या दें, यहीं खाना खा लेना। जब सभी मजदूरी देने का काम खत्म हुआ तब धरमा ने कहा अब तो कुछ शेष नहीं बचा है, तुम्हें क्या दें?

करमा क्रोधित होकर घर लौटा और कहता गया कि हमने जिधर खेत बांधा है उसे कोड़ देंगे और जिधर रोपा है उसे उखाड़ डालेंगे। वह अपनी पत्नी के साथ खेत में जाकर मेड़ को कोड़ने और रोपे हुए धानों को उखाड़ने लगा। अचानक एक अपरिचित आदमी पहुंचा और करमा से कहने लगा कि तुमने किधर उखाड़ा और कहां कोड़ा? करमा ने चकित होकर देखा कि उसके उखाड़े हुए खेत में फिर से धान लहरा रहा है और उसकी काटी हुई मेड़ जैसी की तैसी तैयार होती जा रही है। करमा अपनी पत्नी के साथ घर लौटा। लोगों ने उसे कहा कि तुमने करम पेड़ को जो उखाड़ कर फेंका था उसी का फल पा रहे हो।

अब करमा उस फेंके हुए पेड़ की खोज में चल पड़ा। रास्ते में उसे भूख लगी, एक जगह पका हुआ बेर दिखायी पड़ा। जब उसने तोड़कर खाने के लिए फोड़ा तो उसमें कीड़े भरे थे। वह फिर आगे चला, एक पेड़ पर गूलर पके थे। तोड़ने पर उसमें भी कीड़े निकले। उसे फेंक कर जब आगे बढ़ा तो प्यास सताने लगी। एक तालाब में पहुंचने पर उसने देखा कि सारा पानी गंदला है। आगे चींटियों का झुंड रास्ता रोके था। फिर खकसा का फल कौड़ों से भरा था। फिर सांप रास्ते में लेटा हुआ पड़ा था और आगे एक ग्वाला दूध दूह रहा था।

करमा ने ज्यों ही उससे दूध मांगा कि लोटा ग्वाले के घुटने से सट गया। फिर एक चिउड़ा कूटने वाला मिला। करमा के पहुंचते ही उसका पैर डेकी में सट गया और फटकने वाले का हाथ सूप से बंध गया। करमा आगे बढ़ा। रास्ते में एक नदी मिली, इतनी विपत्तियों से घबड़ाकर उसे करम देवता की याद आयी। उसने करम की पूजा करके नदी पार करा देने की प्रार्थना की। तब नदी से एक मगर निकला और उसकी पीठ पर करमा पार हो गया। नदी के पार करम देवता मिले।

वे कीड़े मकोड़े बने थे। उन्होंने पकड़ने से रोका लेकिन करमा ने पकड़ ही लिया। तब करम देवता ने उसे एक चावल और एक दाल देकर कहा कि खाना बनाओ। जब करमा खाना बनाने लगा तो उत्तने से ही भात और दाल के घड़े भर गये। भूखे-प्यासे करमा ने भर पेट खाया और खाने के बाद करम देवता से रास्ते के सारे संकट एक-एक कर बताने लगा।

 

करमा का सारा दुःख सुन लेने पर करम देवता ने उसे भादों की एकादशी को लौटने की आज्ञा दी। करमा घर की ओर लौट पड़ा। रास्ते में चीटियां नहीं थी, सांप रुपयों की थैली बन गया था। बेर और गूलर के वृक्षों में मिठाइयां लटकी थीं। तालाब निर्मल जल से भरा था। ग्वाले ने उसे भर पेट दूध पिलाया। भोक्ता ने सूप पर चिउड़ा दिया और करमा घर पहुंचा तो देखा कि धान के बोरों से घर भरा था।

उस दिन से  एकादशी को करम गाड़ा और करम देवता को मानने लगा। धन दौलत से उसका घर भर गया और फिर कभी उसको दुःख नहीं हुआ।उसी दिन से लोग भादों की एकादशी को करम गाड़ा करते हैं।

दूसरी कथा

"पूर्वकाल में करमा और धरमा नाम के दो भाई थे। करमा करम गोसाई की बड़ी भक्ति करता था और प्रति वर्ष भादों शुक्ला एकादशी को उसके यहां बड़ी धूमधाम से करम पर्व मनाया जाता था। इसीलिए लोग उसे करमा कहकर ही पुकारते थे, नहीं तो उसका नाम कुछ और ही था। इसी प्रकार धरमा का नाम भी कुछ दूसरा ही था पर धर्म में भक्ति होने के कारण लोग उसको धरमा कहकर ही पुकारते थे।

एक साल करमा के यहां धूमधाम से करम पर्व हो रहा था। आंगन में करम वृक्ष गढ़ा था। सामने जावे की डलिया रखी थी चारों ओर परबैतिनें थालियों में पूजा की सामग्री लेकर बैठी थीं। पुरोहित पूजा करवा रहा था। ऐसे ही समय में धरमा वहां आ पहुंचा। वह बड़ा झुंझलाया। तर्जन गर्जन पर कहने लगा "यह क्या जंगलियों की भीड़ है। तुमलोग क्या असभ्यता प्रकट करने यहां आये हो। दूर होओ, जाओ धर्म की शरण में जाओं।"

ऐसा कह उसने जावे की डलिया को लात मारकर उड़ेल दिया और करम वृक्ष को भी उखाड़ पखाड़ चलता बना। पर करम गोसाई की शक्ति तो देखो कि जावे की डलिया फिर ज्यों की त्यों हो गयी और करम वृक्ष भी जैसा को तैसा गढ़ गया। तब परबैतिनों ने भक्ति सहित पूजा की और प्रसाद लिया। सारी रात नाचने गाने और आनन्द मनाने में बीती। भोर होने पर करमा ने करम गोसाई से भेंट अकवार किया। पीछे दूसरों ने भी वैसा ही किया। घर की परबैतिनों ने करम के पत्तों में बासी भात और साग टीप दिया। तब सब परबैतनियां करम गोसाई को भसाने ले चलीं।

इधर धरमा ने जब सुना कि करम गोसाई के प्रताप से जावा ज्यों का त्यों हो गया और वृक्ष फिर गढ़ गया तब वह बड़ा कुपित हुआ। वह भोर में ही जाकर करमा के खेत का सब धान उखाड़कर चला आया। करमा और धरमा के जिधर खेत थे उधर से ही परबैतिर्ने करम भसाने ले जा रहीं थीं। सो करम गोसाई के प्रताप से करमा के धान जो धरमा ने उखाड़ दिये थे वे ज्यों के त्यों हो गये और धरमा के खेत के सब धान उखड़कर आड़ में आ गये।

धरमा घर में निश्चिंत रहा कि आज करमा से हमने पूरा बदला ले लिया। पर कुछ दिन बाद जाकर धरमा ने देखा कि करमा के खेत में धान लहलहा रहे हैं और उसके खेत खाली पड़े हैं और आड़ में धान के पौधे सूख रहे हैं। यह देख धरमा को अपनी करनी पर बड़ा दुःख हुआ। घर जाकर उसने सब कहानी सुनायी। तब धरमा के घरवालों ने भी दूसरे साल से करम व्रत करने के मन्नत मानी।

इसी प्रकार जो करम गोसाई को तुच्छ समझता है उसकी महा दुर्गति होती है और जो श्रद्धाभक्ति रखता है और साल में एक दिन उसके नाम से व्रत करता है वह धन धान्य से पूर्ण हो जाता है और उसके दिन आनन्द से बीतते हैं।"

तीसरी कथा

"एक साल करमा जब करम गोसाई को लाने जा रहा था रास्ते में देखा कि एक मनुष्य माथे में भारी बोझा लेकर ढेंकी कूट रहा है। कांड़ी में धान चावल के बदले केवल भूसा है। यह देख करमा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने उस मनुष्य से उसका कारण पूछा। पर उसने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। बारंबार आग्रह करने पर उस मनुष्य की बहन इस प्रकार कहने लगी।

यह हमारा भाई घमंडू है। हम दोनों भाई बहन को छोड़ हमारे यहां कोई नहीं, न कुछ धन सम्पत्ति ही है। एक समय हमारा घर धन और जन से पूर्ण था। एक साल हम सबों ने बड़े प्रेम से करम एकादशी व्रत और पूजा की। बड़े बड़े थालों में मिठाई, लड्डू, पुआ, पकवान चढ़ाये। पर हमारे भाई को कुछ धन का मद हो गया था। इसलिए इसने नाचना गाना छोटा काम समझा और इसको एकदम बंद करवा दिया। उसी से इसकी यह दशा है।

यह बोझा सिर पर लेकर बराबर भूसा कूट रहा है। न निद्रा है न विराम। घर में कमाने वाला भी कोई नहीं। जो कुछ घर में था वह सब इसने खिलाने पिलाने में खप चुका। अब यह खाली टूटी फूटी झोपड़ी है। यदि इसकी मृत्यु भी हो जाती है तो इस कष्ट से छुटकारा पाता। क्या तुम किसी प्रकार इसके उद्धार का उपाय बता सकते हो ?

करमा ने कहा-बहिन, इसने धन के अभिमान से सचमुच बड़ा खोटा काम किया। इसने अपने को बड़ा समझ न तो कुछ गुणगान ही किया न इसके मन में कुछ आनंद ही आया कि इसके आठ अंगों में एक अंग भी डोलता। इसने जो इतना प्रसाद चढ़ाया वह केवल बोझ ही था। वही बोझा मोटरी बनकर इसके माथे पर चढ़ा है। और इसने जो भक्ति से नाच गाकर आनन्द मनाना बंद कर दिया उसी का यह फल है कि यह बराबर डेंकी कूट रहा है और कुछ बोल नहीं सकता। यह दुःख करम गोसाई की दया होने से ही दूर हो सकता है।

लड़की ने कहा- हम तो कल से निराहार हैं और घर में कुछ नहीं है तो हम करम गोसाई का व्रत और पूजा कैसे कर सकते हैं?

करमा ने कहा-यह बड़ा संयोग है। तुम करम गोसाई की आराधना करो और मन्नत मानो। कल संजोत था और आज एकादशी उपवास है। तुम कल से ही उपवास हो। जाओ, नहा धो कर भक्ति और प्रेम से गोसाई का स्मरण करो और मन्नत मानो। पास में कुछ नहीं है तो न सही, जाकर खेत से कुछ पके धान लाकर चूड़ा बना लो और तुम्हारे छप्पर पर खीरा लगा है सो एक खौरा लेकर फूल पत्ता करम गोसाई को चढ़ा देना। तुम्हारे धर्म से तुम्हारे भाई का तद्धार होगा। फिर दूसरे बरस सामर्थ्य के अनुसार व्रत और पूजा करना।

लड़की ने नहा धोकर करम गोसाई को स्मरण करके ज्यों ही मन्नत मानी कि उसके भाई के सिर की मोटरी हट गयी और बेंकी कूटना बंद हुआ और उसे सारी पूर्व घटना स्मरण हुई। नहा धोकर वह भी करमा के साथ चल पड़ा। फिर भाई बहन दोनों ने करमा के बताये अनुसार रात्रि में करम गोसाई की पूजा की।

करम गोसाई के प्रताप से एक ही साल में उनका घर धन धान्य से भर गया। तब से प्रति वर्ष उसके यहां करम गड़ाने लगा और सारी रात नाच गान में बीतने लगी। लड़की ब्याही जाकर ससुराल गयी और वहां उसने सुपुत्र लाभ किया।

चौथी कथा

"करमा जब घमंडू को लेकर आगे बढ़ा तो देखता है कि एक झोपड़ी में एक युवक दुबला पतला बैठा है। उसकी बहन फटे पुराने कपड़े पहन तन झीण और मन मलीन उसको मिठाई लड्डू खिला रही है। करमा को आश्चर्य हुआ कि यह क्या बात है कि ये दोनों ऐसी टूटी फूटी झोंपड़ी में रहते हैं, इनका शरीर जीर्ण शीर्ण है और तन ढकने को कपड़े तक नहीं हैं पर ऐसे दुःखी देख पड़ने पर भी युवक मिठाई लडडू ही खा रहा है। निकट जाकर पूछताछ करने पर जान पड़ा कि युवक गूंगा और बहरा भी है। करमा के आग्रह करने पर लड़की ने इस प्रकार कहना आरंभ किया-

एक दिन जब हमारे यहां करमा गड़ाया था तो विधिपूर्व हमने व्रत और पूजा की। रात को हमने खाने पीने में समय बिताया क्योंकि हमारे यह नीरसू भाई ने नाचना गाना यह कहकर मना कर दिया कि यह छोटपन है। तभी से इसकी यह दशा है। यह बहरा और गूंगा हो गया और मिठाई लड्डू छोड़ कुछ खाता भी नहीं। तिस पर भी आश्चर्य यह कि यह सूखता ही जा रहा है। मैं भी इसकी सेवा में लगी रहती हूं। कुछ काम धंधा भी नहीं कर पाती हूं और सब बासन बर्तन भी बेचकर खिला चुकी हूं। अब तो दो दिन से उपवास ही हो रहा है।

इतना सुन करमा ने कहा- यह करम गोसाई की कृपा है कि तुम संयोग से उपवास हो। तुम्हारे भाई ने करम गोसाई का कुछ महत्व नहीं समझा और अपने को बड़ा समझा जो इसने करम गोसाई के सम्मुख हरिगुण गाना और सुनना मना किया। उसी के फलस्वरूप यह गूंगा और बहरा हो गया। इसकी जिह्वा रसास्वादन नहीं कर पाती जिससे यह ऐसा भोजन करने पर भी सूखता जा रहा है। इसका उद्धार करम गोसाई ही कर सकते हैं। सो तुम उनका स्मरण करो और मन्नत मानो।

फिर जो पान फूल जुटा सको उसी से उनकी पूजा करो। यह तो तुम्हारे भाग्य की बात है कि कल से उपवास हो क्योंकि कल संजोत था और आज एकादशी है। जाओ, शीघ्रता करो। इतना सुन करमा के बताये अनुसार नहा धोकर जैसे ही लड़की ने करम गोसाई का स्मरण किया और मन्नत मानी कि उसका भाई बोलने और सुनने लगा। वह भी नहा धोकर करमा के संग हो गया। रात्रि को भाई बहन दोनों ने करम गोसाई की पूजा की। एक ही साल में उनका घर धन धान्य से भर गया। तभी उसे उनके यहां बराबर करम गड़ाता है।

समय पाकर लड़की ब्याही जाकर ससुराल गयी और वहां उसने पुत्र लाभ किया।"

पांचवीं कथा

"करमा अब और आगे बढ़ा। जाते-जाते एक नदी के पास पहुंचा तो देखता क्या है कि एक विचित्र जीव के माथे पर एक बड़ा वृक्ष उगा है। वह उस भारी वृक्ष को माथे पर ढोकर दुःख से कातर इधर-उधर दौड़ रहा है। करमा को यह देख बड़ा आश्चर्य हुआ। उस विचित्र जीव ने करमा को देखकर बड़े कातर भाव से पूछा-भाई, तुम कहां जाते हो ?  करमा ने कहा-आज भादों शुक्ला एकादशी है, इसलिए हम करम गोसाई को लाने जा रहे हैं कि अपनी शक्ति भर भक्ति से उनकी पूजा आराधना करें। तुम्हारी यह क्या दशा है?

उस जीव ने कहा-भाई, हमने करम गोसाई की मन्नत मानी थी पर मूर्खतावश हमने उनकी पूजा नहीं की। तुम उनके पास जा रहे हो सो हमारे दुःख की कथा उनसे कहना और हमारी ओर से क्षमा मांगकर हमारे उद्धार का उपाय पूछना।

करमा ने कहा-भाई, तुमने यह बड़ा दुष्कर्म किया। छल तो किसी से नहीं करना चाहिए। पर, तुमने देवता को भी ठगना चाहा। ऐसे तुम्हारे उद्धार नहीं हो सकता है। तुम करम गोसाई की शरण में जाओ। वे ही तुम्हारा उद्धार कर सकते हैं। तुम्हारे कोई हैं? उस जीव ने कहा- इस अवस्था में, मैं करम गोसाई की क्या सेवा कर सकता हूं। और तो स्मरण नहीं पर मेरी एक बहन थी। न जाने वह जीती है या नहीं।

इतना सुन करमा ने उसकी बहन का पता लगाया। वह करम एकादशी का उपवास कर रही थी और उस समय जावा जगा रही थी। करमा के मुंह से सारी बात सुनकर उसने "वह मेरा भाई बलकू है। उसने करमा गोसाई की मन्नत मानी थी और उसकी मनोकामना पूरी भी हुई। पर अब काम निकल गया यह सोचकर उसने करम गोसाई को भुला दिया। करम एकादशी से ही उसका पता नहीं था। बड़ा भाग्य है कि आपने उसका पता बताया। अब उसके उद्धार का उपाय भी आप ही बता सकते हैं।

करमा ने कहा-यह तुम्हारे ही धर्म का फल है कि आज यह संयोग हुआ। तुम करम गोसाई की आराधना करो तो तुम्हारे धर्म से उसका दुःख दूर हो जाएगा।बलकू की बहन ने वैसा ही किया। बलकू के सिर पर से वह वृक्ष हट गया और बलकू अपने पूर्व रूप में आ गया। वह जल से निकल आया और करम गोसाई की पूजा में सम्मिलित हुआ।"

करम गोसाई की कथा सुनने के बाद महिलाएं रात भर नाचती-गाती हैं। इसमें निर्धन तथा धनी महिलाएं बिना किसी भेद-भाव के सम्मिलित होती हैं। इस अवसर पर जो गीत गाये जाते हैं, उन्हें झूमर, करम झूमर, करम संगीत, करम गीत आदि कहते हैं। ये गीत नागपुरी, बंगला, मुडारी कुडुख आदि भाषाओं में होते हैं, पर सब पर नागपुरी की छाप अवश्य मिलती है।

इन गीतों की राग-रागिनियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं, यथा पांतासालिया, झींगफुलिया, लुझारी आदि। उराँवों के बीच एक अलग राग भी प्रचलित है जिसे करम डंडी कहते हैं। करम डंडी का गायन कुडुख तथा नागपुरी दोनों में किया जाता है। छोटानागपुर में करम पर्व का कितना महत्व है, इसका पता निम्नलिखित नागपुरी गीतों से लग जाता है-

1. "पहुंचल करम का दिन गोई, नहीं जाब ससुरारी कांचा हो बांस के डलवा बिनवबई, डाला लेले लोढ़े जाय गोई नहीं जाब ससुरारी ॥ नान्ही नान्ही धान के चिउरा कुटावबई, भइया घरे करम गड़ाब गोई, नहीं जाब ससुरारी ॥

2. श्री वृन्दावन में जो करम गड़ावल, चला जाहु देखें, श्री वृन्दावन में खेलन भारी ॥ केहु लेलें चौक चंदन केहु लेलें अबटन,

हाय हाय केहु लेलें सखी पाकल पान कि बटा भारी रुकमिनी चौक चांदन पदमिनी अबटन, सखिन सबे लेलें पाकल पान कि बटा भारी, हाय हाय सखिन सबै लेलें पाकल पान कि बट भरी ॥"

करम पर्व के अवसर पर कही जाने वाली जो कथाएं मिलती हैं, उनमें एक बात विशेष ध्यान देने योग्य है। प्रायः सभी कथाओं में धरमा या किसी अन्य पात्र के द्वारा नाच-गान की निंदा की जाती है और उसके द्वारा नाच-गान बंद करा दिया जाता है। नाचने गाने की प्रथा को 'जंगलीपन' या 'छोटापन' तक कह दिया जाता है। इस निंदा के कारण उस पात्र की दुर्गति कई रूपों में देखने को मिलती है।

ईसाई मिशनरियों के द्वारा इस क्षेत्र में जब आदिवासियों को ईसाई बनाना प्रारंभ किया गया तो उनके द्वारा आदिवासियों के नाचने गाने पर लगातार आपत्ति की गयी। मगर आदिवासियों ने भले ही अपना मूल धर्म छोड़ दिया, परन्तु उन्होंने नाच-गान कभी नहीं छोड़ा; क्योंकि यह उनके जीवन की अभिन्न अंग और पहचान है। यही बात यहां के सदानों के साथ भी है। धर्मान्तरित ईसाई तो अब यह स्पष्ट कहते हैं कि हमने अपना धर्म छोड़ा है संस्कृति नहीं।

वस्तुतः उन्हें अपनी संस्कृति पर गर्व है। अब इसका यह सुपरिणाम देखने में आ रहा है कि ईसाई मिशनों में भी आदिवासियों के पर्व-त्यौहार धूमधाम से मनाये जाने लग गये हैं और ऐसे हर अवसर पर नाच-गान को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। करम पर्व छोटानागपुर की संस्कृति की केवल एक पहचान ही नहीं है, बल्कि यह आदिवासी सदान हिन्दुओं की सांझी संस्कृति का एक अनूठा सम्मिलन है जो पता नहीं इस क्षेत्र में श्रद्धा तथा आस्था के साथ किस काल से मनाया जा रहा है और इसकी प्रतीक्षा दोनों समुदाय के लोग बड़ी आतुरता के साथ करते ही रहते हैं-

*भादों का एकादशी, सबैबे नारी हाँसी-खुशी।

आठ भाई खेलब रसिया, आजु करम केर रतिया ॥ बाग बगइचा बारी सभे दिसे हरी हरी। बड़ी रीझ लागे से गोइया आजु करम केर रतिया ॥'

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