आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

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प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज

प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज

भारतीय दर्शन में प्रकृति केवल भौतिक संसाधन नही बल्कि पूजनीय एवं संरक्षित तत्व रहा है। वेदों में वृक्षों को पोषण का स्रोत बताते हुए कहा गया है-वनस्पते पुष्टिवर्धन, प्रजाभ्य:रसं ....। अर्थात हे वनस्पति जन समुदाय का पोषण एवं ऊर्जा से पूर्ति करें। यह सर्वविदित है कि प्रकृति के पांच मूल तत्व- अग्नि, वायु,जल,पृथ्वी और आकाश को पंच महाभूत के नाम से पहचाना जाता है |

कजली तीज का पर्व भारतीय नारी के जीवन,त्याग,अटूट विश्वास, प्रेम और सांस्कृतिक उल्लास का प्रतीक है। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के मध्य मध्य गहरे रिश्तों को मजबूत बनाने के साथ आध्यात्मिक और प्रकृतिवाद का संयुक्त दर्शन है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु और सुखी दाम्पत्य जीवन के रखा जाता है।

प्रकृति और कजली तीज
 प्रकृति और कजली तीज

पूजन- विधान- भाद्रपद कृष्ण द्वितीया को सिंजारा मनाया जाता है जिसमें स्त्रियाँ श्रृगारित हो हाथों पर मेंहंदी सजाती है। तृतीया के दिन निर्जला व्रत रखती है |पूजन में सोलह श्रृंगार करती है। पूजन के लिए मिटटी या गोबर से एक तलाई (छोटा तालाब के समान) बनाई जाती है। उस तलाई के किनारे नीमडी (नीम की टहनी)एवं आक के पत्ते रोपित किये जाते है। तलाई में  कच्चा दूध मिश्रित जल भरकर दीपक प्रज्ज्वलित के पूजन सामग्री में- सत्तू (चने,गेंहू,चावलके लड्डू) ऋतु फल,,केला,जल-कलश, नीमडी माता के चुनरी,श्रृंगार सामग्री,मोती की लड़ एवं दक्षिणा आदि।

दीपक के प्रकाश में तलाई में सभी पूजन सामग्री- सत्तू लड्डू, दीपक,नीम की पत्ती,मोती की लड़ आदि का प्रतिबिम्ब देखा जाता है। तलाई में प्रतिबिम्ब देखते समय बोला जाता है-तलाई में सातू दिखे-दिखे जिसोई टूटे ...। रात्रि में चन्द्रमा के दर्शन अर्ध्य देकर व्रत का पारणा किया जाता है। आक के पत्तों में कच्चे दूध का सेवन एवं सत्तू का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। चन्द्रमा के अर्ध्य देते समय-सोना की सांकळी,गळ मोतियाँ को हार ......चाँद के अर्ध्य देता जीवो पूत,वीर, भरतार। 

कजली तीज का पूजन
कजली तीज का पूजन

नीमडी माता की कथा- पूजन के पश्चात नीमडी माता,तीज माता से सम्बन्धित कथा,वार- त्यौहार की कथा एवं अंत में विनायक जी कथा कही एवं सुनी जाती है। कथानुसार एक सास-बहू थी |बहू के कोई सन्तान नही थी |एक बार सास बहू पडौसी के यहाँ नीमडी माता की पूजा- अर्चना देखि तो पूछा कि इसके करने का क्या तात्पर्य है,पडौसिन ने उत्तर दिया कि इससे सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है |इस पर सास ने संकल्प लिया कि यदि मेरी बहू नहाती रह गयी (गर्भवती हो जाए )तो मैं सवा सेर का पींडा(लड्डू) नीमडी माता को चढ़ाऊँगी।

कुछ समय पश्चात बहु गर्भवती हो गयी तो सास ने नीमडी पूजन  के समय कह दिया कि मेरे पोता(पौत्र) हो जाएगा तब पांच सेर का पींड़ा चढ़ा दूंगी बहु के लड़का हो गया। सास ने पुन: पूजन के समय कहा कि पौत्र का ब्याह होने दो सवा मण का पींडा चढ़ा दूंगी। पुन: कजली तीज आई और सबने पूजा कर ली पर सास,बहु,पौत्र बहु पूजा करने लगी तो नीमडी माता दूर खिसक गयी। यह देख कर बुजुर्ग महिलाओं ने पूछा कि आपने कोई बोलवारी (बोलमा/पूर्व संकल्प) बोल रखी है क्या? सास ने कहा हाँ तब सभी ने कहा पहले उसे पूर्ण करें तभी माता आपके  पूजन को स्वीकार करेंगी। सम्पूर्ण परिवार ने बड़े धूमधाम से माता के गीत गाते हुए नीमडी माता के प्रसाद अर्पण किया।

नीमडी माता की आराधना
नीमडी माता की आराधना

 

नीमडी माता गीत-

उदियापुर से बीज मंगाय, पन्ना मारू नीमडली
रे बुवाओ समंदर पाल पे जी, म्हांका राज। 
घी गुड़ पन्ना मारू पात रंधाय, नीमडली ने रे जिमाओं। 
समंदर पाल पे जी म्हांका राज | नन्दल बाई सा ने चावलिया जिमाय।  
देवर नखराला ने करड कसार जी, म्हाका राज। 
नन्दल बाई सा ने बेस दिराय ,देवर नखराला ने नौ गज पागडी जी, म्हाका राज।
ऊगी ऊगी घेर घुमेर, नीमडली रे उगाई ,समंदर पाल पे जी, म्हाका राज।

नीमडी माता के लोकगीत
नीमडी माता के लोकगीत

इतिहास के पन्नों को देखा जाए तो कहा जा सकता है कि नारी समाज ने पर्यावरण की रक्षार्थ अपने प्राणों तक का उत्सर्ग कर दिया |भारतीय नारी इस तथ्य से अवगत है कि कोई भी धार्मिक लोकाचार प्रकृति और उसकी सुरक्षा के बिना सम्पन्न नही हो सकते है।

- पुष्पा शर्मा

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