आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल षष्ठी | बुधवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: अतिगंड | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 22 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल षष्ठी | बुधवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: अतिगंड | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 22 अप्रैल 2026

पर्यटन और भारतीय साहित्य

पर्यटन और भारतीय साहित्य

समाज-सापेक्ष साहित्य

साहित्य और पर्यटन सामयिक महत्व का शीर्षक है। खासकर तब जब हाल ही में पर्यटन जीवन के सारे पहलुओं पर छाया है। भारतीय साहित्य की विकासशील धाराओं में पर्यटन वा यात्रा साहित्य की धारा पुष्ट होती रही है।

पर्यटन का अर्थ

पर्यटन आजकल विशेष अर्थ का बोधक शब्द है। किन्तु मूलरूप से उसका शब्दार्थ है-घूमना। गतिशीलता जीवधर्म है। यदि हम किसी कारणवश अपने घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं पाते तो थोड़ी देर के बाद छटपटाने लगते हैं। एकरस जीवन बिताने वाले जब छुट्टी पाते हैं और कुछ घूमने का मौका मिलता है तब वे बहुत खुश होते हैं। खुली हवा में टहलना अपने में उल्लास देने वाली बात है। फेफड़ों में ताजगी और बदन में फुर्ती आती है। मनपसंद स्थानों की सैर तो ऐसी खुशी देती है जिसका वर्णन कठिन है। यही पर्यटन का सबसे बड़ा महत्व है।

बच्चे के लिए माँ की गोद ही सबसे सुहावनी होती है। यों प्रकृति के विविध दृश्य ही हमें सबसे पहले प्रेम से बुलाते हैं। कलकल करती नदियाँ, गरजता सागर, चिड़ियों की चहक से गूँजती अमराई आदि का आकर्षण अनोखा होता है। साहसी प्रकृति के लोग पर्वत के नये श्रृंगों पर चढ़गा जैसी खतरनाक यात्राएँ करना चाहते हैं। इतिहास के प्रेमी ऐतिहासिक स्थान देखने के शौकीन हैं तो जिन्दगी का मजा लूटने के इच्छुक लोग उनके लायक स्थानों को जाना पसंद करते हैं।

देश घूमने से पाप दूर

हमारे देश के पुराने पर्यटकों की बात सोचते वक्त मलयालम के एक लोकगीत की टेक याद आती है-देश-देश घूमने से पापफल दूर होता है (नाटु चुट्टि संचरिच्वाल पापकर्म तौर)। हमारे बुजुर्ग, साधु महात्मा और भक्त जन दूर-दूर के मंदिरों, तीथों और पुण्य स्थलों की यात्रा करते थे। वे अकेले या दलों में पैदल इन स्थानों तक यात्रा करते थे। रेल और मोटरगाड़ी दो सौ वर्ष से पुरानी नहीं है। यहाँ सड़कों की व्यवस्था भी पक्की नहीं है। तब भी वे साहसपूर्वक भगवान की कृपा के भरोसे चलते थे।

हमारे देश के पवित्र तीर्थ स्थान उनके ध्येय रहे जम्मू में वैष्णों देवी से लेकर दक्षिणतम कन्याकुमारी तक, पश्चिम में सोमनाथ मंदिर से लेकर पूरब में नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर तक सैकड़ों मंदिर व पुण्यतीर्थ भक्तों को आकृष्ट करते थे। वैष्णों देवी की यात्रा, काशीयात्रा, ब्रजमरिक्रमा, पंढरीपुर की यात्रा, वैद्यनाथ धाम की यात्रा, तिरुपति की यात्रा, डाबरी पहाड़ की यात्रा-ये कुछ प्रसिद्ध यात्राएँ रही हैं। इन स्थानों की पैदल यात्रा साहस जरूर माँगती थी।

शैव व वैष्णव कवियों के वर्णन

भक्तों और साधु महात्माओं के विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं। एक यह कि ये भिन्न-भिन्न संप्रदाय या धर्म के थे। वैष्णव भक्त वैष्णव मंदिरों की यात्रा करते थे तो शैव शिवमदिरों के दर्शन चाहते थे। बौद्ध व जैन धर्म के आस्थावान लोग अपने धर्म से जुड़े स्थानों पर जाते थे। इनमें जो लोग काव्य या पद रचने में कुशल थे उन्होंने अपने देखे मंदिर या तीर्थ पर पद, गीत आदि रचे थे। शिष्यों या अनुयायियों ने उन्हें लिपिबद्ध किया। इस प्रकार तमिल के वैष्णव एवं शैव साहित्य में अनेक रचनाएँ प्राप्त हैं।

उदाहरणार्थ आलवारों में प्रमुख नम्माप्वार ने अन्य मंदिरों के समान चेरदेश के बाहर तेरह तिरुपतियों (वैष्णव मन्दिरों) पर भी पद गाए। उन्होंने तिरुअनन्तपुरम, तिरुषट्टार, तिरुवल्ला, तिरुनावाय, तिरुक्काव्करा, तिरुकोटित्तानम आदि के देवताओं पर गाया। ये सब "नालारियम" दिव्य प्रबंधम में प्राप्त हैं। ये तमिलनाडु के अनेक वैष्णवों को हृदिस्थ है। वे समय-समय पर केरल के वैष्णव मन्दिरों की यात्रा करते हैं। इसी तरह शैव काव्य तेवारम् और तिरुवाचकम् में शैवमंदिरों पर पद है।

इस संबन्ध में एक रोचक घटना स्मरण आती है। कोटुंगल्लूर में तिरुबंचिक्कुलम मुहल्ले में एक प्राचीन शिवमंदिर है। उसका उल्लेख शैवकाव्य में है। शैवों का दृढ़ विश्वास है कि सुन्दरमूर्ति नायनार को श्री चेरमान नायनार ने तिरुवंचिक्कुलम पर स्वर्ग को प्रस्थान कराया था। उस पवित्र तिथि को मनाने तमिलनाडु के शिवभक्त पूरे दल में गत वर्ष तिरुवंचिक्कुलम आये थे। ऐसे अनेक उदाहरण जनश्रुति में सुलभ है।

जिन भक्तों के विषय में ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं वे भी घुमंतू रहे हैं। संत कबीर ने स्वयं बताया है कि उन्होंने कभी कागज छुआ नहीं और उन्होंने जो कुछ ज्ञान पाया सत्संग से पाया। मीरा राजस्थान से वृन्दावन तक हरिगुन गाती चली थी। इन दोनों का हिन्दी के भक्ति साहित्य को योगदान प्रसिद्ध है। प्रभु गौरांग चैतन्य दल सहित वृन्दावन गए और उस तीर्थ की बड़ी व्यवस्था कर दी थी। उसके बाद वृन्दावन का यश विशेष रूप से बढ़ा। पर्यटक और इतिहास

अतीत के तथ्य साहित्यकारों की कल्पना से रंजित रूप में, साहित्य में कविता, कथा, नाटक आदि के माध्यम से प्रकट होते हैं। इंतिहासकार अतीत के तथ्यों का संग्रह संपादन कर उन्हें क्रमबद्ध रूप से पठनीय भाषा में पेश करते हैं। ये दोनों प्रसिद्ध पर्यटकों के दिए विवरणों से काफी सामग्री लेते हैं, बल्कि उन्हीं पर निर्भर करते हैं। पूरे भारत और राज्यों के विषयों में समय-समय पर कई यात्री अपनी प्रतिक्रिया डायरी व विवरण के तौर पर छोड़ गए हैं।

प्राचीन भारतीय इतिहास के विषय में ह्यूएनसांग, फाहियान, इत्सिंग, अलबरूनी, मार्कोपोलो और अनेक अन्य यात्रियों के विवरण उपलब्ध हैं। इतिहासकारों और ऐतिहासिक वाङ् मय के रचनाकारों ने उन सब का उपयोग किया है।

यात्रियों के प्रकार

अतीत के यात्रियों को श्रद्धाजांलि चढ़ाने के बाद हम इस बात पर विचार करें कि पर्यटन से साहित्य कैसे रचा जाता है। यात्री कई प्रकार के होते हैं। कुछ लोग रेलगाड़ी में खाते-पीते-सोते हुए पार्सल की तरह अपने लक्ष्य स्थान पर पहुंचते हैं। उनकी आँखें चारों तरफ के दृश्यों का विशेष निरीक्षण नहीं करती। न उनके मस्तिष्क में कोई कल्पना सजग हो उठती है। कुछ यात्री व्यर्थ की गपशप में समाज, धर्म और राजनीति की खोखली चर्चा करते हुए या बिरादरी के लोगों की आलोचना करते चलते हैं।

किन्तु कुछ कल्पना धनी और प्रतिभावान यात्री होते हैं जिनकी आंखों का कैमरा चारों तरफ के अद्भुत दृश्यों को अपने भीतर बन्द कर लेता है। वे घटनाओं और व्यक्तियों को स्मृति में सुरक्षित करते हैं। कोई-कोई घर लौटकर डायरी में नोट भी करते हैं। ऐसे लोग बाद में यात्रा के संस्मरण लिखते हैं।

एक संस्मरण

एक संस्मरण याद आता है। श्री ओ.एन.वी. कुरुप और मैं उस दिन भोपाल से रेलगाड़ी में बैठे थे। हमारे डिब्बे में एक युवा दंपत्ति और उनका प्यारा मुन्ना था।। वे कुछ समय बाद किसी स्टेशन पर उतर गए। मुन्ने का छोटा सा काँच या प्लास्टिक कंगन उनके बर्थ पर छूट गया। पह ओ.एन.वी. के हाथ लगा उन्होंने उसे बच्चे की कल्पना में ऐसे सुंदर वाक्य सुनाए जो उनकी कवित्वकला का प्रमाण थे। हिमाचल से लेकर कन्याकुमारी के समुद्र तक सैकड़ों प्रेरणास्थल पर्यटकों को वर्षों से मुखरित करते आये हैं।

कालिदास ने हिमाचल का वर्णन किया। उन्होंने लंका से अयोध्या को पुष्पक विमान से लौटते श्रीराम से सीता को यात्रा के विधि दृश्यों का वर्णन सुनवाया है। उन्होंने मेघदूत में मेष की रामगिरी से अलकापुरी की यात्रा का भी वर्णन किया। काव्य सुषमा व मानव जीवन का सम्मिलन इनमें मिलता है। ऐसे प्रसंग साहित्य प्रेमियों को बड़ा हर्ष देते हैं। कालिदास को पर्यटकीय कवि कहना गलत है पर उनके काव्य के प्रस्तुत प्रसंग पढ़ने से ज्ञानवर्धन एवं पर्यटन का आनंद प्राप्त होता है।

प्राचीन साहित्य-समीक्षकों ने गद्य साहित्य की विविध विधाओं पर जोर नहीं दिया क्योंकि प्राचीन युग में साहित्य नाटक को छोड़कर अधिकतर पद्यमय था। गद्य साहित्य अपेक्षाकृत आधुनिक है। तिसपर पश्चिमी साहित्य के संपर्क ने यात्रा साहित्य एवं संस्मरण लिखने की प्रेरणा दी । 

मैंने भारतीय भाषाओं के यात्रा साहित्य की झांकी के लिए डॉ के एम जार्ज द्वारा संपादित समकालीन भारतीय साहित्य (मलयालम) पढ़ा। उस ग्रंथ से प्राप्त जानकारी के अनुसार यात्रा-संस्मरण या पर्यटन वर्णन करने की पंरपरा नहीं थी। किसी-किसी भाषा में सत्राहवीं-अठारहवीं सदी में एकाथ यात्रा-संस्मरण अवश्य रचे गये। किन्तु अधिकतर उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में ही यात्रा-साहित्य सुपुष्ट हुआ।

तीन प्रकार का यात्रा वर्णन

विषय के आधार पर तीन प्रकार का मात्रा वर्णन मिलता है:-

1. किसी राज्य के भीतर के दृश्यों स्थानों का वर्णन

2. भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा का वर्णन

3. विदेश यात्रा के अनुभवों का वर्णन।

भारतीय भाषाओं के यात्रा साहित्य के अंतर्गत दूसरी और तीसरी कोटि के ग्रंथों की संख्या अधिक गिलती है। इनमें ग्रंथ भी हैं। पर पत्रिकाओं में प्रकाशित संस्मरण एवं फीचर ही बड़ी संख्या में प्राप्त है। राज्य के भीतरी स्थानों का चित्रण अन्य राज्यों बाले बल्कि विदेशी ही अधिक उत्साह से करते हैं। भारत के प्रमुख पर्यटन साहित्य-विषयों में हिमाचल, कश्मीर, शिमला, ऊटकमंड, कोडैकनाल जैसे पर्वतीय स्थान, प्रयाग संगम, बदरीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश, मथुरा-वृंदावन जैसे उत्तर भारत के मंदिरों के अलावा दक्षिण के मदुरै, महाबलिपुरम, कोवलम, कन्याकुमारी जैसे केंद्र भी शामिल हैं। देश के प्रमुख उत्सव होली, दीपावली, ओणम, वैसाखी, बिछू आदि पर्यटकों को भिन्न-भिन्न स्थानों पर आकृष्ट करते हैं।

विदेश यात्रा का लोभ

भारतीयों द्वारा विदेशी यात्रा के अनुभवों का वर्णन ही यात्रा साहित्य में मिलता है। इसके कई कारण हैं। मुख्य कारण है कि भारतीय लेखक को विदेश की हर चीज आश्चर्य में डालती है। वहाँ विज्ञान व प्रौद्योगिकी के चमत्कार देखकर उसके ताज्जुब का ठिकाना नहीं रहता इसलिए वह उन दृश्यों और अनुभवों का वर्णन करता है। औसत भारतीय को बुलेट ट्रेन, जंबो हवाई जहाज, समुद्र के भीतर की नाव सैर आदि अनुभव अजीब लगते हैं।

अपनी आर्थिक दशा के प्रतिकूल होने से उसके मन के अरमान पूरे नहीं होते। ऐसे पाठक को पुस्तक के माध्यम से ही सही, विदेश के एक से एक अद्भुत दृश्य देखने, उसका मजा पाने का सौभाग्य मिले तो वह खुश क्यों न हो। हमारे साहित्यकारों द्वारा चर्चित विदेशों में अब प्रमुख अमेरिका है। प्रारंभिक दिनों में इंग्लैंड, सिंगापुर व अमेरिका थे। लेकिन देश में साम्यवाद की धूम फैलने के बाद रूस और चीन प्रिय देश बन गये।

पोट्टेक्काडु जैसे कुछ लेखकों ने अफ्रीका बालीद्वीप आदि की भी कथाएँ लिखी। जापान और पश्चिम एशिया के देश शीघ्र ही पर्यटन साहित्य के प्रिय बन गए। इन विदेशों की प्रकृति, संस्कृति, शिक्षा, उद्योग, मनोरंजन, सामाजिक गठन, राजनीति आदि हर पक्ष चर्चित होता आया है। इन देशों की सरकारें पर्यटकों और संचार माध्यमों की सुविधा के लिए अपनी तरफ से सूचनाओं का भण्डार तैयार कर सस्ते भाव पर और मुफ्त भी देती हैं।

इनके आधार पर पयर्टन साहित्यकार विस्तार से लिखते हैं। सरकारी प्रकाशन देश की भीतरी कमजोरी छिपाते हैं। इसलिए पाठक ऐसा अनुभव करते हैं कि हमारा देश बहुत पिछड़ा है, कमजोर है। दूसरे देश बहुत अच्छे हैं। लेकिन सभी देशों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष हैं।

यात्रा साहित्य के अध्ययन से लाभ

यात्रा-साहित्य पढ़ने के कई प्रकार के लाभ हैं। जिन के लिए पर्यटन की सुविधा दुर्लभ हो वे पुस्तक या पत्रिका में पढ़े हुए वर्णन व अनुभव से मन ही मन पर्यटन की कल्पना और आनंद पा सकते हैं। यही नहीं, पर्यटक सीमित समय में किसी नगर का कोना तक भली-भांति देखा नहीं पाते। ग्रंथ पारायण से आप पूरे दृश्यों का अनुभव इच्छानुसार कर सकते हैं। जो पर्यटन की सुविधा रखते हैं, वे पर्यटन साहित्य पढ़ने के बाद यह अनुभव पाते हैं कि उनका आनंद दुगुना होता है।

यात्रा के बाद पर्यटन साहित्य पढ़‌ने पर अपने अनुभव की कमी को पूरा कर सकते हैं। अधिकांश पर्यटन साहित्यकार इसी प्रकार लेखन पूर्ण कर सकते हैं। किसी स्थान को देखने के पहले साहित्य में विवरण पढ़ लेने से दृश्य का आनंद दस गुना होता है। इसके अभाव में यात्री अधकचरे गाइड को टूटी-फूटी भाषा में उसकी कल्पित बातें ही सुनने को मजबूर होते हैं। अधिकतर सामान्य यात्री पर्यटन स्थान पर घूमने की औपचारिकता ही पूरी करते हैं। मंदिरों की क्यू की तरह क्यू में बढ़ते-बढ़ते यात्रा पूरी करते हैं।

अनिवार्य तत्व

अब यात्रा-साहित्य के आवश्यक गुणों पर एकाध बातें करें। भावपक्ष में लेखक को अपने विषय पर अधिकाधिक जानकारी होनी चाहिए। दूसरे, तथ्यों में पाठकों के लिए जरूरी और रोचक तथ्यों को पहचानने और प्रस्तुत करने की क्षमता लेखक में होना जरूरी है। आस्वाद्यता व पठनीयता ऐसे लेखन की सफलता का मर्म है। उस लेखक को कवि हृदय प्राप्त होना चाहिए। पत्रकारिता के मर्मों से परिचित होना चाहिए ताकि मुख्य बातें छूट न पावें।

शिल्प-पक्ष में एक तेज कलम चाहिए जो प्रसंगोचित भाषा में धड़ाधड़ लिख सके। अपने अनुभवों के वर्णन में भी अपने व्यक्तित्व को संयत रखना जरूरी है। कारण यह कि पाठक पर्यटन-साहित्य में स्वयं सब कुछ देखना व आनंद पाना चाहते हैं। वे आपके व्यक्तिगत चमत्कार की प्रशंसा सुनने में कोई रुचि नहीं रखते। भाषा की प्रभावशीलता सबसे महत्व की है।

भारतीय भाषाओं में पर्यटक सहायक

भारतीय भाषाओं में वर्तमान स्थिति पर भी कुछ बात कर इस आधार लेख को समाप्त किया जा सकता है। हमारे देश में अब पर्यटन सेवा की धूम है। सरकारी व गैर-सरकारी तंत्र इसके पीछे पड़ा है। होटल, परिवहन स्वामी और निजी प्रकाशक पर्यटक के लिए सूचनाएं तैयार कर देते हैं। मगर अफ़सोस है कि अधिकांश सामग्री अंग्रेजी में छपती है। भारतीय भाषाओं की घोर उपेक्षा है। राज्यों के प्रमुख पर्यटक केन्द्रों पर भारतीय भाषा में उत्तम सूचनापूर्ण ग्रंथ नहीं मिलते। सभी विदेशियों को खुश करने के लिए अधीर हैं।

इसकी जिम्मेदार केवल सरकार नहीं। हम सामान्य शिक्षित नागरिक ही जिम्मेदार हैं। हिन्दी प्रदेश के किसी किसी सम्मेलन में जब कोई अंग्रेजी में बोलने लगते हैं तब हिन्दी में बोलने का आग्रह किया जाता है। यह आग्रह पर्यटन केन्द्रों के साहित्य के विषय में हो तो हिन्दी में पर्यटकीय साहित्य सुपुष्ट हो जाएगा। यह हिन्दी ही नहीं, सारी भारतीय भाषाओं के लिए लागू है।

डॉ. एन. ई. विश्वनाथ अव्यर
पर्यटन और भारतीय साहित्य
"संस्कृति : अंक -03"

Follow us on social media and share!