आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ का जेठौनी तिहार

छत्तीसगढ़ का जेठौनी तिहार

आज कार्तिक शुक्ल एकादशी है, चार महीने की योग निद्रा के पश्चात भगवान विष्णु जी के जागने का दिन है। हिन्दू परम्पराओं में यह दिन मांगलिक कार्यों का प्रारंभ माना जाता है। इस दिन से विवाहादि का प्रारंभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह किया जाता है। [caption id="attachment_558" align="aligncenter" width="700"] तुलसी चौरा, चिल्का - उड़ीसा फ़ोटो ललित शर्मा[/caption]   दीपावली के बाद इस त्यौहार की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती है क्योंकि हिन्दू मान्यता के अनुसार इस दिन से ही मंगल कार्य प्रारंभ किए जाते हैं। यह तिथि तुलसी मंगल के रुप में जानी जाती है। वैष्णव मंदिरों में इस दिन तुलसी विवाह होते हैं तथा लोग घरों में भी पूजा कर तुलसी विवाह करते हैं। तुलसी को पावन एवं पवित्र माना गया है, भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी एवं तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है। पद्म पुराण के कार्तिक महात्यम में इसका उल्लेख है कि देवैस्त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरै:। नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये॥ (पद्म पुराण – 6-29) इस दिन एकादशी का व्रत भी किया जाता है, महिलाएँ सांयकाल तुलसी पूजन करती हैं तथा इस दिन एकादशी का व्रत कर रात को चंद्र को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। इस तरह यह त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ अंचल में इस दिन गन्ने का मंडप बनाकर तुलसी पूजा की जाती है। इन्हें बेर, चने की भाजी, आंवला सहित अन्य मौसमी फ़ल एवं सब्जियों के साथ पकवान अर्पित किए जाते हैं। दीप मालाओं से घर सजाया जाता है तथा बच्चे पटाखे चलाकर उत्सव मनाते हैं। खेत से धान की बाली लाकर गांव के देवताओं को अर्प्तित की जाती है, इसके पश्चात धान की मिंजाई प्रारंभ करते हैं। इस दिन रावत लोग नाचते हैं तथा अपने मालिकों  एवं यजमानों के यहां जाकर गायों को सुहई बांध कर दोहा पारते (बोलते) हैं अहो परसा बांख ले सुहाई बनावै, लपट जावै हरइया॥ सोहै सुहाई बलही कलवरिया, लपट रइवे गोड़ रइया॥ सुहाई बांधने से पूर्व यजमान के यहाँ धान की कोठी पर धान देवता का चित्र बनाकर दोहा बोलते हैं – चार महीना चरायें चारा, अब खायें तोर मही के मोरा॥ आ गे मोर दिन देवारी जेठौनी, अब छोड़ देहें तोर निहोरा॥ (चार माह वर्षा ॠतु में मैं तुम्हारी गायों को चराते हुए उनकी देखभाल की, अब देवारी नृत्य में व्यस्त रहूंगा, अब तुम कुछ दिन अपने जानवरों की देखभाल खुद ही करना।) इस तरह पारम्परिक ढंग से देवऊठनी एकादशी, प्रबोधनी एकादशी, जेठौनी आदि नाम से जाने जाना वाला यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है।   आलेख ज्ञानेन्द्र पाण्डेय रायपुर

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