सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा का पर्व
June 24, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी | शुक्रवार
नक्षत्र: उत्तरा फाल्गुनी | योग: ब्रह्मा | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 09 अक्टूबर 2026

सरगुजा अंचल की जनजातियों में होली की कई अनोखी परंपराएं प्रचलित हैं। यहाँ बैकोना गांव में होली के एक दिन बाद, तो सेमरा कला में एक दिन पहले उत्सव मनाने का रिवाज है। वहीं, चेरवा जनजाति फाल्गुन शुक्ल पंचमी को होली के दस दिन पहले ही यह त्योहार मनाती है। यहाँ लोग होलिका की राख को बीमारियों के इलाज के लिए अत्यंत पवित्र मानते हैं।
होली का पर्व हिंदी पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। बसंत ऋतु में आने के कारण इसे 'बसंतोत्सव' भी कहते हैं। हिंदू धर्म के इस महत्वपूर्ण त्योहार को फगुआ, फागुन, धूलेंडी और दोल जैसे नामों से भी जाना जाता है।

यह त्योहार भक्त प्रह्लाद की याद में मनाया जाता है। यहाँ प्रह्लाद का अर्थ 'आनंद' और होलिका को 'वैर व उत्पीड़न' का प्रतीक माना जाता है। सरगुजा में इसे 'होरी' कहते हैं। पहले दिन होलिका दहन होता है और दूसरे दिन धूलेंडी या 'धूर उड़ाना' मनाया जाता है, जिसमें लोग एक-दूसरे पर गुलाल लगाते हैं और फाग गीत गाते हैं।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में गोंड, कंवर, उरांव, कोड़ाकू, कोरवा, पंडो, खैरवार, चेरवा और अगरिया जनजातियां निवास करती हैं। ये सभी समुदाय अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों और मान्यताओं के साथ होली मनाते हैं।

खजूरी, बैकोना और सेमराकला गांव में मान्यता है कि ग्राम खजूरी 'पुरुष रूप' है और ग्राम बैकोना 'महिला रूप'। इसलिए पहले खजूरी में और उसके अगले दिन बैकोना में होली मनाई जाती है। ग्रामीणों का मानना है कि इस क्रम को तोड़ने से कोई अनिष्ट हो सकता है। वहीं, सेमरा कला में पूर्वजों के समय से ही एक दिन पहले होली मनाने का रिवाज है ताकि गांव में खुशहाली बनी रहे।
कंवर जनजाति: कंवर जनजाति के लोग पूरे एक माह तक गांव में घूम-घूमकर सरगुजिहा बोली में होली गीत गाते हैं। होलिका दहन के लिए सेमर वृक्ष की डाली का उपयोग किया जाता है, जिसे गांव का कोटवार लाता है। बैगा (पुरोहित) विधि-विधान से पूजा कर सम्मत जलाता है।
प्रमुख मान्यताएं: जलती लकड़ी (लूठी) से दागने पर बांझ वृक्षों में फल आने लगते हैं।बीमार जानवर ठीक हो जाते हैं। बची हुई सेमर की लकड़ी को शिकार के हथियारों में लगाने से सफलता मिलती है। इसकी राख का तिलक लगाने या इसे पीने से बीमारियां दूर होती हैं।

गोंड़ जनजाति के रिवाज
गोंड समुदाय में 'रेंड़ी' वृक्ष की डाली को प्रह्लाद का प्रतीक मानकर गाड़ा जाता है। बैगा द्वारा पूजा-अर्चना के बाद सम्मत जलाई जाती है। यहाँ भी जलती लकड़ी से वृक्षों को दागने की परंपरा है और भगवान राम-सीता से संबंधित सुंदर फाग गीत गाए जाते हैं।
चेरवा जनजाति: दस दिन पूर्व उत्सव
चेरवा समाज के लोग होली से दस दिन पहले पंचमी को त्योहार मनाते हैं। सम्मत दहन के समय ये लोग एक अंडा और काला चूजा (करिया चिंयां) चढ़ाते हैं। इनकी मान्यता है कि जलती होली में चावल डालने से परिवार के सभी दुख, रोग और परेशानियां जलकर राख हो जाती हैं।
पंडो जनजाति की आस्था
पंडो जनजाति में 'चिरचिटा' (तेंदू) वृक्ष की डाली का उपयोग होता है। ग्रामीण गाजे-बाजे के साथ जंगल से लकड़ी लाते हैं। मान्यता है कि होलिका दहन की राख से बुखार, खाज-खुजली और खसरा जैसे रोग ठीक हो जाते हैं। ये लोग बची हुई लकड़ी पर तीर-धनुष से निशाना लगाकर बुराई को दूर करने का प्रतीक मनाते हैं।
उरांव और कोड़ाकू जनजाति
उरांव जनजाति में होलिका दहन की अग्नि को घर ले जाने की परंपरा है। इसी पवित्र अग्नि से घर का चूल्हा जलाकर पकवान पकाए जाते हैं, ताकि घर में अच्छाई का प्रवेश हो।

कोड़ाकू जनजाति में कुंवारे लड़के जंगल से सेमर की लकड़ी लाते हैं। दहन के बाद बची लकड़ी पर पत्थर से निशाना लगाने वाले को इनाम में महुआ का पेड़ दिया जाता है। ये लोग भी सम्मत की आग से घर का चूल्हा जलाते हैं और नदी में स्नान करने के बाद ही घर में प्रवेश करते हैं।

इस प्रकार, सरगुजा की जनजातियां अपनी प्राचीन मान्यताओं और परंपराओं के माध्यम से आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं।
लेख: श्री अजय कुमार चतुर्वेदी
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