शिव मंदिर देवखूंट का पुरातात्विक विश्लेषण
March 08, 2022
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

महासमुंद जिलार्न्तगत, महासमुंद तहसील मुख्यालय से खल्लारी 22 किमी. दूरी पर बागबाहरा मार्ग पर एवं रायपुर से 77 कि.मी. दूरी पर 20॰53’ उत्तरी अक्षांस तथा 82॰15’ पूर्वी देक्षांस पर स्थित है। रायपुर-वाल्टेयर रेल लाइन में भीमखोज रेलवे स्टेशन से 2 कि.मी. बायें तरफ पहाड़ी की तलहटी में खल्लारी स्थित है। रायपुर शाखा के कलचुरि शासकों का शासन, इस क्षेत्र पर रहा है, उन्ही के द्वारा इस क्षेत्र में मंदिरों का निर्माण किया गया।
ग्राम के मध्य में स्थित प्राचीन मंदिर से प्राप्त शिलालेख के आधार पर इस स्थान का नाम खल्वाटिका ज्ञात होता है जो ई. सन 1415 में देवपाल नामक मोची द्वारा भगवान नारायण का मंदिर निर्माण करने की जानकारी प्राप्त होती है। शिलालेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार हैहयवंशी राजा हरिब्रहमदेव की राजधानी खल्वाटिका थी। इस ग्राम में और भी कई मंदिर निर्मित थे जो वर्तमान में नष्ट हो चुके हैं।
ग्राम खल्लारी में बस्ती के पूर्वी कोने पर पूर्वाभिमुखी जगन्नाथ मंदिर स्थित है। यह मंदिर एक ट्रस्ट द्वारा वर्ष 1952 से संचालित है जिसमें पुजारी की व्यवस्था भी है। मंदिर के तल विन्यास में गर्भगृह, अंतराल, मण्डप एवं मुख मण्डप प्रमुख हैं। मंदिर के ऊर्ध्व विन्यास में अधिष्ठान मोल्डिंग, जंघा, शिखार, आमलक व कलश पूर्णरुपेण सुरक्षित स्थिति में हैं।
मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है जिसका माप 2X2 वर्गमीटर है। गर्भगृह के चारों कोनो में भित्ति स्तंभ स्थापित हैं। भित्ति स्तंभ की चौड़ाई 10X10 से.मी. है। गर्भगृह में चंदन की लकड़ी से निर्मित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा की प्रतिमायें स्थापित हैं जो रंगीन पेंट से पुती हैं। ये प्रतिमायें प्रति बारह वर्ष बाद परिवर्तित की जाती है। गर्भगृह की आन्तरिक भित्तियाँ सादी हैं जो रंगीन आयल पेंट से पुती हैं। गर्भगृह की उत्तरी भित्ति में धरातल पर पानी निकलने का छिद्र है जिसके बाह्य भाग में मकरमुख का अलंकरण है। गर्भगृह के वितान में दो परतों में उत्फुल्ल कमल दल का अंकन है। गर्भगृह के बाहर अन्तराल भाग है जो 2.00 मीटर चौड़ा तथा 1.70 मीटर लम्बा है। अन्तराल के बाहर तरफ एक लोहे का चैनल गेट ट्रस्ट द्वारा लगाया गया है। वस्तुत; यह शिव मंदिर है क्योंकि इसके उत्तरी ओर जल निकास हेतु प्रणालिका बनी हुई है। पश्चातवर्ती काल में यह जगन्नाथ मंदिर के रुप में परिवर्तित हुआ होगा।
द्वारशाखा :- गर्भगृह की द्वार चौखट सादी है। सिरदल पर गणेश का मध्य में अंकन है तथा द्वारशाखाओं पर परिचारिका द्विभंग मुद्रा में खड़ी है। द्वारशाखा के दोनों पार्श्व शाखाओं में नदी देवी गंगा तथा यमुना का अंकन है तथा इसके ऊपर का भाग सादा है।
मण्डप :- मण्डप वर्गाकार है जिसका माप 6.20X6.20 मीटर है। मण्डप सोलह स्तंभों पर आधारित है जिसमें से चार मण्डप के मध्य में, 10 स्तंभ मण्डप की भित्ति में तथा दो स्तंभ पिछ्ली भित्ति के सहारे स्थापित हैं। मण्डप के बाहर अर्ध्दमण्डप भी निर्मित है जिसमें दो स्तंभ भित्ति में स्थापित हैं। इन सभी स्तंभों की संरचना लगभग एक समान है। मण्डप की भित्ति में चारों किनारे पर छोटे-छोटे आयताकार गड्ढे बाहय भाग में हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसकी भित्ति में किनारे- किनारे प्रस्तर की पटटी निर्मित रही होगी जो बाद में नष्ट हो गई है जैसा कि इसके समकालीन मंदिरों फणिकेश्वर नाथ मंदिर, फिंगेंश्वर, शिव मंदिर एवं बजरंगबली मंदिर सहसपुर, जिला दुर्ग के मण्डप में निर्मित थे।
मण्डप की छत सादी तथा सपाट है जो नवनिर्मित है। छत का निर्माण लगभग 30 वर्ष पहले मंदिर के ट्रस्ट द्वारा करवाई गयी है जो सीमेंट तथा कांक्रीट से निर्मित की गई है। मण्डप में 16 स्तंभ है। जो नीचे से चौकोर, अष्टकोणीय, व सोलह कोणीय होकर ऊपर ब्रैकेट के रुप में हैं जिसके ऊपर धरण रखी है। मण्डप के मध्य में गरुड़ की हाथ जोड़े प्रतिमा स्थापित है। मुख मण्डप में प्रवेश करने के लिये चार सोपान निर्मित हैं जिसके समानान्तर मण्डप की फर्श निर्मित है।
मण्डप की पिछ्ली भित्ति में दोनों एक-एक अलिंद निर्मित हैं जिनके ऊपर शिखरनुमा अलंकरण है। मण्डप के मध्य के स्तंभ चौकी पर आधारित हैं।
ऊर्ध्व विन्यास :- मंदिर के ऊर्ध्व विन्यास में अधिष्ठान, जंघा, तथा शिखर भाग निर्मित हैं। उत्तर दिशा में जल प्रणालिका मकरमुख के द्वारा होती है। मंदिर की उत्तरी भित्ति पर जंघा भाग के मध्य रथ में दो अलिंद तथा अन्तराल के बाहय भाग की भित्ति में दो अलिंद एक के ऊपर एक निर्मित हैं। गर्भगृह की पिछ्ली भित्ति के मध्य रथ में दो अलिंद निर्मित हैं। दक्षिणी भित्ति में चार अलिंद दो तलों में उत्तरी भित्ति की भांति निर्मित हैं। अलिंद के ऊपर दो कटाव तथा खुर छाद्य हैं। शिखर भाग के मध्य रथ में पूर्व दिशा को छोड़कर तीन तरफ लघु शिखर निर्मित हैं।
ग्रीवा के चारों कोनों में एक-एक योगी की प्रतिमायें स्थापित हैं। शिखर के मध्य रथ में सबसे ऊपर चारों तरफ नाग का अंकन है। आमलक के ऊपर कलश स्थापित है। शिखर के सम्मुख भाग में सुकनासिका में भी कटाव निर्मित हैं लेकिन प्रतिमाओं का अभाव है। कलचुरी वंश की रायपुर शाखा के शासकों द्वारा 15 वीं शती ई में यह मंदिर निर्मित प्रतीत होता है।
जगन्नाथ मंदिर के सामने एक प्राचीन बावड़ी है जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है। संभावना है कि यह मंदिर के समय निर्मित की गई होगी। ग्राम खल्लारी में जगन्नाथ मंदिर के अलावा समीप में एक अन्य मंदिर तथा कुछ प्रतिमायें रखी हैं जिसकी ग्रामवासी पूजा करते हैं।
ग्राम खल्लारी के पश्चिम दिशा में एक ऊँची पहाड़ी है जिसमें जाने के लिए सीढियाँ निर्मित हैं साथ ही दर्शनार्थियों के लिए नीचे से ऊपर तक पानी की व्यवस्था की गई है। पहाड़ी के ऊपर दो विशाल पत्थरों के मध्य एक छोटी सी मढिया है जिसमें प्रस्तर निर्मित प्रतिमा रखी है जिसकी ग्रामवासी खल्लरी माता के नाम से पूजा करते हैं। यहाँ पर प्रतिवर्ष मेला भरता है।
डॉ. कामता प्रसाद वर्मा,
उप संचालक (से नि) संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व रायपुर (छ0ग0)
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