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इंद्र राजा और लोक अनुष्ठान

इंद्र राजा और लोक अनुष्ठान

आज आँख खुलने से आँख लगने तक तमाम समाचारों में, खबर-बतर में, चर्चाओं में, केवल एक ही विषय चोटी पर रहता है "पानी... पानी... और पानी...." जल के देवता को मनाने के लिए कहीं होम-हवन, दान-पुण्य, तो कहीं कथा-अनुष्ठान हो रहे हैं। ऐसे अवसरों पर ज्ञान-विज्ञान एक कोने में धरा रह जाता है। सबको एक ही मनुहार होती है, "हे जल देवता। बरसो और खूब बरसो...।" अतिवृष्टि हो या अनावृष्टि, दोनों स्थिति में इंद्र को ही तो मनाना पड़ता है।
आज से नहीं, पुरातनकाल से ही यह सब हो रहा है। पुराणों में, इतिहास के पत्रों पर अनावृष्टि के लिए रूठे इंद्रदेव को मनाने की कथाएँ मिलती हैं। रामायणकाल में राजा जनक की कथा सर्वविदित है। उन्होंने दुर्भिक्ष के समय धरती एवं प्रजा के हित में, खेत में हल चलाया था। राजा जनक पर इंद्र प्रसन्न हुए और खूब बरसात हुई।
कहा जाता है कि शास्त्रोक्त पद्धति से अनुष्ठानों के माध्यम से देवताओं का आह्वान किया जाता है, और वे साक्षात् उपस्थित होते हैं। लोकांचलों में लोकमान्यताएँ और टोने टोटके फलीभूत होते हैं। एक मान्यता के अनुसार रूठे इंद्र देव को मनाने गाँव के मुखियाः पटेल-पटलन अपने गाँव में घर-घर जाकर हाथ पसार कर रोटी माँगते हैं। नगर सेठ, नगर पण्डित और अन्य प्रतिष्ठित घरों की महिलाएँ खाली गगरी सिर पर धरकर पानी माँगती हैं। गाँव के चैपाल पर 'डेडर-डेडरी' (मेंढक-मेंढकी) का विवाह रचाया जाता है। जब इन सबसे इंद्र का हृदय नहीं पसीजता तब 'इंद्र पूजा' की जाती है।
'इंद्रपूज' एक लोकानुष्ठान है इंद्रदेव को प्रसन्न करने का। निमाड़ांचल में इसे ध्रुवपूजा, काकड़पूजा भी कहते हैं। इस अनुष्ठान की पूजन विधि बड़ी सहज और सरल है; किन्तु इसके नियम बड़े सख्त हैं। गाँव की काकड़ (सरहद) पर सम्पूर्ण ग्रामवासियों को सम्मिलित होना होता है। गाँव को बिलकुल निर्जन छोड़ दिया जाता है। अस्वस्थ व्यक्ति, यहाँ तक कि सद्यप्रसूता तक को गाडी पर बैठाकर ले जाना होता है। सम्पूर्ण गाँव के घरों के द्वार खुले छोड़ दिए जाते हैं। नंगे पाँव पूजा में सम्मिलित होते हैं।
यह क्रिया प्रतीकात्मक है। इंद्रदेव को
अहसास कराया जाता है कि अब गाँव में अन्न-जल कुछ नहीं बचा। चोरी का भय नहीं रहा। घर-द्वार खुले छोड़कर इस गाँव का त्याग कर रहे हैं। गाँव में चूल्हा तक नहीं जला। इस प्रकार विपश्नि की घड़ी में सब ग्रामवासी एक जुट होकर अनुष्ठान में शरीक होते हैं। ध्रुव दिशा की ओर मुँह कर 'पटेल पटलन' इंद्रदेव की पूजा आरती करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ध्रुव दिशा से उठने वाली बदली कभी भी बिन बरसे नहीं जाती। कहा जाता है कि लोक-विश्वास की विजय होती है, चिलचिलाती धूप में तिलमिलाते लोग ध्रुव पूजन के पश्चात् भीगते हुए होंलास के साथ अपने घरों को लौटते हैं।
'इंद्रपूजा (ध्रुव पूजा) के समय गाया जाने वाला लोकगीत बादलों के आह्वान मंत्रों का कार्य करता है। इस गीत में इंद से तादात्म्य स्थापित कर बरसने को अरज की है। लोक का सोच व्यक्तिगत न होकर समष्टिगत होता है। व्यक्ति अपने लिए नहीं, जीव-जन्तु, वनस्पति व तपती धरती के लिए इंद्र से प्रार्थना करता है। धरती सबकी पालन हार है, वर्षा के अभाव से उसे इतना आघात लगा है कि वह मौन हो गई। इस गीत में इंद्र को 'राजा' कहकर संबोधित किया गया है पाणी को पड़ी गयो काळ रे इंद्रर राजा, धरती अबोलो छाई रह्यो जी। दूर
गरजो न नजीक बरसो रे इंद्रर राजा
नाना मोठा रोपा लहाओ


रे इंदर राजा,
अर्थः हे इंद्र राजा! तुम खूब बरसो। तुम्हारे न आने से अकाल की स्थिति बन गई है। तुम गरज रहे हो तो दूर जाकर गरजी, पर बरसो यहाँ पर। धरती माता जल के अभाव से मौन हो गई है। तुम अपनी पत्नी के प्रेम में ऐसे लुभा गए कि भूल ही गए कि तुम्हें बरसना भी है। तुम छोटे बड़े-पौधों को हरा करो। तुम्हारी गाय के जाये और पशु पक्षी जल को तरस रहे हैं। वे जीभ डाल रहे हैं। है इंदर राजा। बादलों को उड़ा ले जाने वाली हवा को रोक लो, उसे कोठड़ी में बन्द कर दो और ऊपर से सात ताले जड़ दो, ताकि वह बादलों को उड़ाकर न ले जा सके। मेंढकों को कहो कि वे टर्रऽ... टर्रऽ... करें। अगर बादल नहीं बरसते तो राम-लक्ष्मण के बाण चलाओ ताकि बादलों में छेद हों और पानी गिरने लगे। हे इंदर राजा। तुम किस से 'मान कर बैठे हो, तुम्हारा मन आऊँ-आऊँ कर रहा है, तुम बरसो ताकि धरती का मौन टूटे और वह मुखरित हो उठे। हे इंदर राजा ! तुम प्रसन्न होओ और बरसो।
लोकांचल में इंद्र पूजा का बड़ा महश्व है। लगता है इंद्रपूजा पर गाये जाने वाले इस गीत के एक-एक बोल इंद्र के हृदय को भेदन करते हैं और इंद्र देव बरस पड़ते हैं।
मैं स्वयं ऐसे एक अनुष्ठान की साक्षी हैं। उस समय मैं छह-सात साल की थी।


लेखक 

सुमन चौरे
लोक संस्कृति विद् एवं लोक साहित्यकार

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