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विश्व मूलनिवासी दिवस की अवधारणा और इतिहास

विश्व मूलनिवासी दिवस की अवधारणा और इतिहास


भारत में 9 अगस्त को सामान्यतः ‘विश्व आदिवासी दिवस’ कहा जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्र ने इसका आधिकारिक नाम ‘विश्व के मूलनिवासी लोगों का अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ रखा है। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के मूलनिवासी समाजों पर हुए औपनिवेशिक अत्याचारों से जुड़ी है। भारत में जनजातीय पहचान अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एक विशिष्ट पहचान है। जनजातीय वर्ग को अकेला मूलनिवासी और शेष भारतीय समाज को बाहरी मानने वाली अवधारणा गलत है। यह भारत के इतिहास से भी मेल नहीं खाती है।


आज विश्व आदिवासी दिवस नहीं है। यह विश्व मूलनिवासी दिवस है। भारत में 9 अगस्त को लेकर सबसे बड़ी भ्रान्ति यहीं से आरम्भ होती है। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को 'इन्टरनेशनल डे ऑफ द वर्ल्ड्स इंडिजिनस पीपुल्स' नाम दिया है। इसका हिन्दी अर्थ ‘विश्व के मूलनिवासी लोगों का अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ है। यह ‘विश्व आदिवासी दिवस’ नहीं है।

यदि इसे अनुसूचित जनजाति वर्ग का मूलनिवासी दिवस मान लिया जाए तो एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है। क्या अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर शेष भारतीय समाज बाहर से आया हुआ विदेशी समाज है? क्या यादव, राजपूत, साहू, कुर्मी, ब्राह्मण, देवांगन और भारत के असंख्य अन्य समुदाय इस भूमि के मूल निवासी नहीं हैं?


संयुक्त राष्ट्र

इस प्रश्न का उद्देश्य मूलनिवासी और बाहरी के विषय पर चिन्तन करना है। कुछ लोग जनजातीय वर्ग को छोड़कर शेष भारतीयों को बाहरी या विदेशी घोषित करते हैं।

शब्दावली का ऐतिहासिक सन्दर्भ

‘इंडिजिनस’, ‘नेटिव’, ‘ट्राइबल’, ‘आदिवासी’ और ‘जनजाति’ शब्द सामान्य बातचीत में समान अर्थों में उपयोग होते हैं। इनके ऐतिहासिक और कानूनी अर्थ अलग हैं। ‘नेटिव’ शब्द का सामान्य अर्थ किसी स्थान पर जन्मा या उससे स्वाभाविक रूप से जुड़ा व्यक्ति है। ‘इंडिजिनस’ शब्द अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक सम्बन्ध बताने वाली अवधारणा है। यह ऐसे समुदायों की ओर संकेत करता है जो किसी भूभाग पर बाहरी सत्ता की स्थापना से पहले से रहते आ रहे थे। बाद में बाहरी लोगों ने उन्हें उनके ही भूभाग में अल्पसंख्यक बना दिया।

संयुक्त राष्ट्र ने ‘इंडिजिनस पीपुल्स’ की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा स्वीकार नहीं की है। संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज भी स्पष्ट करते हैं कि इसकी कोई औपचारिक सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है। ‘आदिवासी’ शब्द नया है। यह भारत की आधुनिक राजनीतिक चर्चा में विकसित हुआ शब्द है।

भारतीय संविधान ‘आदिवासी’ या ‘मूलनिवासी’ को संवैधानिक श्रेणी नहीं मानता। संविधान के अनुच्छेद 366 खण्ड 25 और अनुच्छेद 342 के अन्तर्गत ‘अनुसूचित जनजाति’ मान्य संवैधानिक शब्द है। यह सामाजिक संरक्षण और विशेष अधिकारों से जुड़ी प्रशासनिक श्रेणी है। यह किसी समुदाय के इस भूमि के मूलनिवासी होने का प्रमाणपत्र नहीं है।


संविधान

यूरोप और उपनिवेशीकरण

सन् 1492 ईस्वी में अमेरिका पहुँचने वाले कोलम्बस और यूरोपीय शक्तियों ने वहाँ के स्थानीय लोगों की भूमि पर अधिकार कर लिया। हिंसा, दासता और बीमारियों ने स्थानीय समुदाय और संस्कृति को नष्ट कर दिया। शासकों ने बचे हुए लोगों को एक सीमित क्षेत्र में समेट दिया। इसके बाद उनका जीवन दूभर होता चला गया।

इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने एबोरिजिनल समुदायों को भूमि से बेदखल किया। वहाँ बच्चों को परिवारों से अलग कर 'स्टोलन जेनरेशन्स' जैसी त्रासदी रची गई। सन् 2008 ईस्वी में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमन्त्री ने इसके लिए क्षमा माँगी। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के इन ऐतिहासिक अनुभवों से अन्तरराष्ट्रीय मूलनिवासियों के हक और अधिकार की बात आरम्भ हुई। यह व्यवस्था भूमि से बेदखली और सांस्कृतिक विनाश की प्रतिक्रिया है।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अनुभव यह स्पष्ट करते हैं कि अन्तरराष्ट्रीय मूलनिवासी अधिकार व्यवस्था किन परिस्थितियों में विकसित हुई। वहाँ यह प्रश्न सांस्कृतिक पहचान के साथ भूमि से बेदखली, जनसंख्या के विनाश और राजनीतिक अधीनता का है।

भारत की आधिकारिक राय

विद्वानों का मानना है कि इस दिन को अनुसूचित जनजातियों और शेष भारतीय समाज के बीच शत्रुता उत्पन्न करने का माध्यम बनाना अनुचित है। यह दिन किसी भारतीय समुदाय को विदेशी घोषित करने का प्रमाण नहीं देता। संयुक्त राष्ट्र की घोषणा भारत के भीतर कोई जातीय या नस्लीय विभाजक रेखा निर्धारित नहीं करती। 13 सितम्बर सन् 2007 ईस्वी को भारत के प्रतिनिधि अजय मल्होत्रा ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट किया था कि भारत स्वतन्त्रता के समय उपस्थित सम्पूर्ण भारतीय जनसंख्या और उसकी आगे की पीढ़ियों को ही मूलनिवासी मानता है। भारत ने यह वक्तव्य मूलनिवासी अधिकार घोषणा के पक्ष में मतदान करते हुए दिया था। यह आधिकारिक वक्तव्य संयुक्त राष्ट्र के अभिलेख A/61/PV.108 में दर्ज है।


बिरसा मुण्डा

सन् 2021 ईस्वी से हम 15 नवम्बर को भगवान बिरसा मुण्डा की जयन्ती ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इसका उद्देश्य जनजातीय स्वतन्त्रता सेनानियों, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को सामने लाना है। भारत सरकार ने इसकी घोषणा का विवरण जारी किया है।

दक्षिण कोसल टुडे

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