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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाएँ

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाएँ

भारतीय संस्कृति में स्त्री को शक्ति का प्रतीक माना गया है एवं शक्ति प्राप्त करने के लिए उसकी पूजा करने का भी प्रचलन है। इस प्रकार प्रत्येक स्त्री स्वयं में शक्ति का ही रूप है। इस लेख में हम झारखण्ड के जनजाति वर्ग से आने वाली वीरांगनाओं पर चर्चा करने वाले हैं।

भारतीय स्वतंत्रता आंन्दोलन में जनजातीय समाज की महिलाओं का बड़ा योगदान रहा है। चूँकि जनजातीय समाज का जीवन-यापन सीमित संसाधनों पर आधारित रहा है जो कि प्रायः आखेट एवं अन्य वन्य संपदाओं से परिपूरित हो जाया करती है। प्रायः सभी जनजातियों का अधिवास पहाड़ी जंगली व दुर्गम क्षेत्रों में है। दुरूह-दुर्गम एवं सुविधाविहीन क्षेत्रों में रहने के कारण बाहरी सम्पर्क से वंचित, समय की गति और तथाकथित आधुनिक प्रगति से अछूता, पृथकता का जीवन बिताने वाले सरल-सीधे लोगों का अपना अलग संसार है जिसमें अपनी भाषा, रीति-रिवाज, वेश-भूषा तथा आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक एवं धार्मिक व्यवस्था कायम है।

इसमें एक विशेष प्रकार की संस्कृति और जीवन-यापन के ढंग तथा प्रवृत्ति-मनोवृत्ति का विकास हुआ है। इनकी संस्कृति अन्य आधुनिक समाज से भिन्न परन्तु निम्नतर नहीं है बल्कि विलक्षण है। प्रकृति ने इन्हें स्वतंत्र जीने का पाठ पढ़ाया है, सरल और परिश्रमी जीवन जीने की प्रेरणा दी है। पहाड़ों ने इन्हें सिर ऊँचा रखने का मंत्र दिया है। कुल मिलाकर इनका जीविकोपार्जन पूर्णतः प्रकृति के करीब एवं जंगलों पर ही आश्रित रहा है। यही कारण है कि इनके प्रायः सभी आंदोलन जल, जंगल, जमीन से संबंधित रहे हैं। इनके आंदोलन का कारण अंग्रेजों की शोषणकारी नीति रही है।

अंग्रेज जब झारखण्ड में प्रवेश किए तो इनका सम्पर्क यहाँ निवास करने वाली जनजातियों के साथ हुआ। सम्पर्क में आने पर इनसे भूमि कर की मांग की जाने लगी, भूमि कर के साथ-साथ जंगली वस्तुओं के उपयोग पर भी कर लगा दिया गया यहाँ तक कि इनके मुख्य पेय 'हड़िया' पर भी कर लगा दिया गया। कर वसूल करने के लिए अंग्रेजों ने साहूकारों, महाजनों एवं जमींदारों की फौज खड़ी कर दी। अंग्रेजों की इस व्यवस्था के कारण इन आदिवासियों को लगान चुकाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा था। कर्ज के जाल में वे ऐसे फंसते चले गए कि उससे उबर पाना सम्भव नहीं रहा। सुविधाविहीन एवं सीमित संसाधनों पर जीवन-यापन करने वाले इन जनजातीय समुदायों को अंग्रेजों का यह कृत्य अत्यन्त नागवार गुजरा। स्वतंत्र मानसिकता वाले ये स्वाभिमानी लोग अंग्रेजों के इस कृत्य से अत्यन्त दुःखित हुए एवं स्वाभाविक ही उनमें विद्रोह की भावना भड़की।

दूसरी ओर यहाँ की भूमि व्यवस्था ऐसी थी कि इनसे अंग्रेज कर वसूल नहीं पाते थे क्योंकि यहाँ की जनजातियों में एकल भूमि स्वामित्व की व्यवस्था नहीं थी। इस कारण से अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाते हुए इन क्षेत्रों में अन्य जातियों को बसाना शुरू किया और कर वसूल करने हेतु साहूकारों, महाजनों, जर्मीदारों एवं प्रभावी वर्गों का साथ लिया। ये वर्ग अंग्रेजों का साथ देते हुए उनकी खूँटकट्टी जमीन जिसमें गाँव के सभी लोगों का सामूहिक स्वामित्व था, इस भूमि व्यवस्था को तोड़ना शुरू किया ताकि कर लेने में सुविधा हो सके। अतः जब इस व्यवस्था को समाप्त कर जबरदस्ती करारोपण किया जाने लगा एवं कर न देने पर भूमि से बेदखल करने तथा जंगल से प्राप्त पदार्थों का उपयोग न करने के लिए बाध्य करने लगे। अतः इनमें विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी।

अंग्रेजों की इस व्यवस्था के कारण जंगली सीमित साधनों पर जीवन-यापन करने वाली इन जनजातियों को पेट की भूख सताने लगी। वे अपनी ही भूमि और जंगल के खाद्य पदार्थों का उपयोग नहीं कर सकते थे। इस कारण ये अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने को तैयार हुए। इस तरह वे धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लेने लगे, जिसमें जनजातीय महिलाओं की भी भागीदारी सम्मिलित रही। इन वीरांगनाओं में छोटानागपुर के संथाल परगना की फूलों-झानो ने भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। 1855 में ब्रिटिश सत्ता के सेवक साहूकारों, महाजनों सूदखोरों व जमींदारों के खिलाफ सिद्धो कान्हू के नेतृत्व में संथालों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में संथाल पुरूषों के साथ महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी थी। सिद्धो-कान्हू की ये दोनों बहनें फूलों एवं झानो घोड़ों पर बैठकर गाँव-गाँव संदेश पहुँचाने का कार्य करती थीं। इसी दौरान रास्ते में जो भी अंग्रेज सैनिक मिलता उसे बांधकर गाँव ले आती थी।

इनकी बहादुरी देख अन्य जनजातीय युवतियाँ भी इस विद्रोह में शामिल होने लगीं। 9 जुलाई 1855 में जब चांद और भैरव मारे गए तब ये दोनों बहनें अपनी सेना के साथ पहाड़ों से नीचे मैदानी इलाकों में आ गई, जहाँ इन्हें अंग्रेजों की गोली-बारी का सामना करना पड़ा। ये छिपकर अंधेरा होने का इंतजार करने लगीं। अंधेरा होने पर ये छिपकर अंग्रेजों के शिविर में घुसकर 21 जवानों को मौत के घाट उतार दीं। फूलों और झानों के साथ हजारों की संख्या में महिलाएँ शामिल थीं। जिनमें बहालेन जोभा, कंचनी जैसी और भी क्रांतिकारी महिलायें थीं। यद्यपि विद्रोह निर्ममता पूर्वक दबा दिया गया एवं विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया तथापि इस विद्रोह के व्यापक परिणाम हुए एवं लोगों को स्वंतत्रता का बिगुल फूंकने के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की पृष्ठभूमि के तौर पर इसे देखा जा सकता है।

(1) इस प्रकार 1900 ई. में बिरसा आंदोलन में गया मुण्डा की पत्नी माकी मुण्डा ने अंग्रेजों की दमनकारी नीति का विरोध करते हुए अपने गाँव एतकेडीह में अंग्रेजों पर हमला कर उनका विरोध किया था। माकी मुण्डा एक वीर एवं साहसी महिला थी। ई. टोप्पो ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि गया मुण्डा के साथ उसकी घरवाली माकी मुण्डा, लम्बी लाठी, छोटा बेटा कुल्हाड़ी, चौदह साल का पोता तीर-धनुष लिए डिप्टी कमिश्नर के विरोध में खड़े थे। इनकी तीनों बेटियाँ थिंगी, नागी और लेंबू के पास लाठी और तलवार थी। इनकी दोनों पुत्रवधुएं भी लाठी और टांगी लिए खड़ी थीं। गया मुण्डा और डिप्टी कमिश्नर लड़ने के दौरान जब जमीन पर लुढ़क गए थे तब पीछे से किसी औरत ने डिप्टी कमिश्नर पर वार किया था। गया की पत्नी काफी बहादुर थी। उसी ने पुलिस दरोगा को कुल्हाड़ी फेंककर मारी थी। डॉ. के. एस. सिंह के अनुसार इस संघर्ष में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका औरतों की ही थी। गया मुण्डा और उसकी पत्नी माकी मुण्डा सहित उसके पूरे परिवार के लोगों ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया और इससे अन्य लोग भी अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित हुए।


माकी मुण्डा

धरती आबा अर्थात भगवान बिरसा मुण्डा की माता करमी हातु मुण्डा भी आदिवासी समाज की वीरांगना थीं। ये अयूब हातु के डिबर मुण्डा की सबसे बड़ी बेटी थीं। करमी हातु ने जीवनभर बिरसा का नदी किनारे बैठकर इंतजार रोते-रोते किया था। जिसने स्वतंत्रता के लिए अपने बेटे को बलिदान कर दिया था। और वहीं पर इंतजार करते हुए जंगल में हमेशा के लिए खो गई। वो कभी घर वापस नहीं लौटी।

(3) इसी प्रकार रोहतासगढ़ ने मुगलों के विरोध में युद्ध के समय सिनगीदाई और कलईदाई नाम की दो उराँव महिलाओं ने पुरुषों का वेश बदलकर युद्ध किया और अपनी बहादुरी का झण्डा गाड़ा था। इस विजय की याद में आज भी उराँव महिलायें अपने माथे में गोदना गोदवाकर अपनी बहादुरी का परिचय स्मृति चिन्ह के रूप में देती हैं।


सिनगीदाई

(4) टाना भगत आन्दोलन में भी उराँव महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। टाना भगत आन्दोलन में जतरा उराँव की माता लिबरी, पत्नी बंधनी, पुत्रियाँ बिरसो और बंधनी तथा परिवार की अन्य सभी महिलाओं की भागीदारी इस आन्दोलन में रही थी। इस आन्दोलन में देवमनिया भगताईन का कार्य सराहनीय था। देवमनिया धार्मिक एवं राजनैतिक महिला नेता के रूप में आगे बढ़ी थी। इनके साथ जनजातीय महिलाओं का कारवाँ बढ़ता ही गया। इन महिलाओं के विषय में इतिहास के पन्नों पर काफी कम जिक्र हुआ है। उराँव महिलायें जब टाना भगत आन्दोलन से जुड़ी तो स्वतः ही राष्ट्रीय आन्दोलन से भी जुड़ती गई क्योंकि टाना भगत आन्दोलन गांधीवाद आन्दोलन से संबंधित था और उराँव महिलायें गांधी जी से अत्यधिक प्रभावित थीं।

(5) इन जनजातीय वीरांगनाओं में रतनी खड़िया, रूनिया और झुनिया का नाम भी उल्लेखनीय है। तेलंगा खड़िया की पत्नी रत्नी मातृभूमि की रक्षा के लिए तेलंगा के साथ युद्ध की तैयारी करती थी व तीर और तलवार चलाने का अभ्यास करती थी। रतनी गाँव-गाँव जाकर अंग्रेजों के विरूद्ध लोगों को संबोधित करती थीं। पति तेलंगा को अंग्रेजों से छिपने में मदद करती थी। तेलंगा की मृत्यु के बाद भी उसने अकेले ही जोड़ी पंचायत को जारी रखा था। वहीं रूनिया और झुनिया ने भी कोल विद्रोह के दौरान वीर बुधु भगत के साथ अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ दोनों खड़ी थीं। ये दोनों अपने पिता वीर बुधु भगत की ही तरह अद्भुत पराक्रमी, कुशल घुड़सवार, धनुर्धारी और तलवारबाज योद्धा थीं। कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रायः सभी जनजातीय विद्रोहों एवं आन्दोलनों में पुरूष नायकों के साथ-साथ उनके परिवार की महिलाएँ तो सम्मिलित रही ही थीं साथ ही इन महिलाओं ने अन्य महिलाओं को भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया। अतः स्वतंत्रता संघर्ष में जितना योगदान पुरुषों का रहा है उतना ही योगदान समान रूप से महिलाओं का भी रहा है। यद्यपि पुरुष दृष्टिकोण के कारण इतिहास में महिलाओं की भूमिकाओं का उचित सम्मान नहीं हो पाया है तथापि आधुनिक शोध एवं रचनाओं द्वारा महिलाओं की भूमिका को स्थापित किए जाने का निरंतर प्रयास जारी है।

भारत एक बहुभाषिक (Multi Lin-gual), बहुप्रजातीय (Multi Ethnic) एवं बहुसांस्कृतिक (Multi Cultural) देश है। यद्यपि यह निर्णय करना कठिन है कि कौन जनजाति है और जाति या फिर कहाँ जनजातीयता समाप्त होती है और कहाँ जाति की शुरूआत होती है? विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ-वेदों में 'जनजाति' शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। वेदकालीन समाज आर्य और दस्यु के रूप में दो भागों में बंटा हुआ था। विशाल वैदिक साहित्य में उल्लिखित कई जातियाँ भी जनजाति की तरह थीं। रामायण से महाभारत एवं महाकाव्यों तक कहीं भी स्पष्ट रूप से जनजाति की चर्चा नहीं मिलती।

संस्कृत में जनजाति को बोधिक करने के लिए 'वनचर' या 'वनवासी' शब्द का उल्लेख मिलता है किन्तु यह भी एकांगी है तथा कहना कठिन है कि नीयत ठीक है या नहीं? वर्तमान आधुनिक युग में' अनुसूचित जनजाति' एक संवैधानिक नाम है परन्तु संविधान जनजाति शब्द को परिभाषित नहीं करता; केवल जनजातियों की सूची का उल्लेख करता है। जो भी हो मानव सभ्यता अपने विकास के प्रारम्भ में तो कबीलाई ही रही होगी। इनमें रक्त सम्मिश्रण भी हुआ होगा तथा उनमें परस्पर रीति-रिवाज, खान-पान तथा अन्य सांस्कृतिक स्वरूपों का विनिमय भी हुआ होगा। काल-चक्र में जाति-जनजाति का भेद हुआ होगा। वर्ण या जाति-व्यवस्था कालान्तर में समसामयिक समाज एवं समय की आवश्यकता के रूप में ही देखा जाना चाहिए तथापि भारत में जनजातीय समाज की एक लम्बी और समृद्ध परम्परा रही है।

जिस समाज में जाति व्यवस्था न होकर केवल गोत्र-गण-चिन्ह (टोटेम) ही भिन्नता प्रदर्शित करने का माध्यम रहा वही जनजाति है। इसलिए कोई भी जनजाति अपने लिए जाति सूचक शब्द का प्रयोग न करके अपने को मात्र 'मनुष्य' कहती है, जैसे मुंडा अपने को 'होड़ो' उरांव 'कुडुख', संथाल 'होड़' नागा 'नोक' निषाद 'दाफिया' मिकिर 'अरलैंग', गारो 'मैनडे', कचारी 'बोड़ो' तथा कुछ नागा 'चींगफो' कहते हैं। आर्कटिक प्रदेश में रहने वाले एस्किमो अपने को 'इनुइट' तथा कालाहारी मरूभूमि के होटेन टॉट अपने को 'खाई' तथा बुशमैन को 'सान' कहते हैं। इन सभी शब्दों का अर्थ 'मनुष्य' या 'जन' होता है। जाति सम्प्रदाय से मुक्त अपने को मात्र 'मानव' कहने की जनजातीय विशेषता प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है। ये जनजातियाँ मानवीय मर्यादा और मर्यादित मानवता से इतना ओत-प्रोत है कि ये अपने को मनुष्य या जन कहते हैं और इसके सिवा कुछ नहीं कहते। आधुनिक सभ्य समाज में इसे पिछड़ेपन के रूप में देखा जा सकता है परन्तु आधुनिक विश्व को आज इसी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। आधुनिक सभ्य समाज के दृष्टिकोण के कारण आज जनजातीय लोगों को अपने इतिहास में अपूर्व विकासात्मक संकट का सामना करना पड़ रहा है। भारत की जनसंख्या का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा जनजातीय समुदायों का है।

भारत में जनजातीय समाज के विभिन्न समूह पाए जाते हैं, जिनमें आदिम जनजातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ और अन्य जनजातियाँ शामिल हैं। मानव शास्त्रियों एवं समाज शास्त्रियों ने जनजाति की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ दी हैं। उनके सार रूप में कहा जा सकता है कि जनजाति ऐसे सीधे-सादे लोगों का समूह या जनवर्ग है जिसका एक सामान्य नाम हो, एक निश्चित भू-भाग हो, एक सामान्य विशेष भाषा हो, एक सामान्य संस्कृति हो, रीति-रिवाज एवं कायदे-कानून हों, जिनमें स्वावलम्बन के साथ परस्परावलम्बन हो, जो टोटेन संबंधी निषेधाज्ञाओं का पालन करते हों तथा जरूरत या संकट या बाहरी आक्रमण के समय एकजुटता का प्रदर्शन करते हों।

इस प्रकार जनजातीय समाज के बारे में यदि सामान्य रूप से विचार किया जाए तो इसे वैसे सामाजिक समूह के रूप में देखा जा सकता है जो एक विशेष भू-भाग पर निवास करने वाले, सांस्कृतिक समानता रखने वाले, निरंतर सम्पर्क तथा कुछ विशेष हितों के कारण सामुदायिक एकता के सिद्धांत पर चलने वाले वैसे लोग हैं जिनमें सामुदायिक एकता की भावना बलवती होती है एवं इनका जीवन, रीति-रिवाज और व्यवहार के तौर तरीके आदिम अर्थात् आदिकालीन विशेषताओं से युक्त रहते हैं। आदिमता, सामुदायिक जीवन, परम्परागत मान्यताएँ, सामाजिक संगठन आदि जनजातीय समाज की प्रमुख विशेषताएँ हैं। प्रायः आदिम जीवन एवं जंगलों पर निर्भरता के कारण आधुनिक सुविधाओं का अभाव, सामुदायिक जीवन, परम्परागत मान्यताओं तथा सामाजिक संगठनों (मुखिया, पंचायत आदि) का प्रचलन इन्हें अन्य आधुनिक सभ्य समाज से पृथक करती रही है।

लेख 
नीलू कुमारी 
कोकर, रांची 

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