आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

वैश्विक महासंकट और भारतीय ऋषि परम्परा के समाधान

वैश्विक महासंकट और भारतीय ऋषि परम्परा के समाधान


प्रस्तुत लेख मानवता के उस सङ्घर्ष की गाथा है जो आज और कल के बीच एक सेतु का निर्माण करती है। जब सम्पूर्ण विश्व किसी अदृश्य शत्रु के सम्मुख नतमस्तक होता है, तब हमारी दृष्टि स्वाभाविक रूप से अपने उन मूल स्रोतों की ओर जाती है जिन्होंने इतिहास के विभिन्न कालखण्डों में आपदा प्रबन्धन के सूत्र प्रतिपादित किए थे। श्रीकृष्ण 'जुगनू' जी का यह आलेख मात्र एक विवरण नहीं है, अपितु यह चरक संहिता से लेकर अथर्ववेद के उन गूढ़ निर्देशों का विश्लेषण है जो सामूहिक आपदा के समय संयम और अनुशासन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह लेख स्पष्ट करता है कि पुरातन समय में 'कवच' और 'स्तोत्र' केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे, अपितु वे एक प्रकार के मानसिक और सामाजिक एकान्तवास के साधन थे। आज के सन्दर्भ में इन ऐतिहासिक प्रलेखों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।


मानव इतिहास में जब भी महामारियों का प्रकोप हुआ है, तब समाज ने अपनी रक्षा के लिए सामूहिक चिन्तन का आश्रय लिया है। जब संकट वैयक्तिक न होकर जनपदीय अथवा वैश्विक हो जाए, तो व्यक्तिगत स्वार्थों का परित्याग कर सामुदायिक स्तर पर विचार करना अनिवार्य हो जाता है।

महर्षि चरक ने इस विषय पर गम्भीरता से विचार किया था। जनपद ध्वंस के रूप में कौशाम्बी में हुई भीषण त्रासदी का पुनर्वसु अत्रि द्वारा किया गया वर्णन सम्भवतः संसार में महामारी का प्रथम ऐतिहासिक प्रलेख माना जा सकता है। यह विवरण बताता है कि प्राचीन काल में भी जन स्वास्थ्य के प्रति कितनी सजगता थी।

पौराणिक साहित्य में मिलते हैं आपदाओं से बचाव के सूत्र 
पौराणिक साहित्य में मिलते हैं आपदाओं से बचाव के सूत्र 

पौराणिक साहित्य में भी इन आपदाओं से बचने के अनेक सूत्र मिलते हैं। मार्कण्डेय पुराण, देवी पुराण और भागवत में देवियों ने महामारी के समय बरती जाने वाली सावधानियों का विस्तार से वर्णन किया है। हमारे प्राचीन स्तोत्रों और कवच पाठों में जो आर्त स्वर सुनाई देते हैं, वे पीड़ा के शमन की सामूहिक प्रार्थनाएँ हैं।

नारायणीय के प्रत्येक श्लोक में इस वैश्विक वेदना को शान्त करने की गुहार लगाई गई है। हनुमान बाहुक, बजरंग बाण, चन्द्रशेखर स्तोत्र और मार्कण्डेय स्तोत्र जैसे पाठों में मरकी अर्थात महामारी और बाधाओं के नाश का संकल्प मिलता है।

उत्तर मध्यकाल में कवचों के प्रणयन की बाढ़ सी आ गई थी। इसके पीछे एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण था। उस समय की महामारियों से रक्षा करने में तत्कालीन राजा भी अक्षम सिद्ध हो रहे थे।

ऐसी स्थिति में घर में बैठकर कवच का पाठ करना किसी आधुनिक 'क्वारंटीन' अर्थात एकान्तवास से कम नहीं था। यह विधि व्यक्ति को घर के भीतर मर्यादित रहने के लिए प्रेरित करती थी। इसी कारण उस काल में घर-घर तक कवच पहुँचाए गए ताकि जन सामान्य अनुशासित रहकर अपनी और समाज की रक्षा कर सके।


घर पर सपरिवार था 'क्वारंटीन' का प्राचीन स्वरुप 


भारतीय जन जीवन में विचारों की व्याप्ति बहुत व्यापक रही है। अथर्व परिशिष्ट ऐसे ही विचारों का एक अनूठा सङ्ग्रह है जो मनुष्य को विपन्नता से समृद्धि की ओर ले जाने का मार्ग दिखाता है। इसमें रोगों, उपसर्गों और महामारियों के समय किए जाने वाले शान्ति उपायों का विस्तृत प्रतिपादन है।

यह ग्रन्थ अद्वितीय है क्योंकि इसके समान अन्य कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। वर्ष 1909 में जॉर्ज मेलविल बोलिंग और जूलियस फॉन नेजलीन ने इसे रोमन लिपि में सम्पादित कर प्रकाशित किया था, जिसमें 'अथर्वहृदय' नामक 69वाँ परिशिष्ट अत्यन्त विचारणीय है।

श्री भवनाथ झा ने अथर्वहृदय परिशिष्ट के उन विशिष्ट निर्देशों को रेखांकित किया है जो महामारी और इति जन्य संकटों के समय समाज द्वारा स्वीकार किए जाते थे। यह वह काल होता है जब सर्वत्र निराशा और विडम्बना का वातावरण व्याप्त रहता है। ऐसे समय में ग्रन्थ निर्देश देते हैं कि प्रमुख संस्कारों, वरण, चयन और अग्न्याधान जैसे मांगलिक कार्यों को स्थगित कर देना चाहिए। ग्रन्थ का कथन है :

उपस्थिते राज्यनाशे महारौरव एव वा।
                  दुर्भिक्षे मरके वापि अनावृष्टिभयेऽपि वा ॥ (69,4.1)

सर्वं राष्ट्रे विनश्येत सस्यं शलभमूषकैः।
                      अकस्मान्निर्जला वा स्यादशोषा वा महासरित्॥ (69,4.2)

तथान्येष्वप्यनुक्तेषु घोरेषूपस्थितेषु च।
                     कुर्युः शान्तिमथर्वाणो द्विजा ह्येतेषु भेषजम्॥ (69,4.3)

लभते राज्ययोग्योऽपि न राज्यं राजनन्दनः।
          पठन्न लभते विद्यां द्विजः शृण्वन्नपि श्रुतम्॥ (69,4.4)

आधित्सुरपि नाधानं कुर्यादावासमेव च।
                कन्या परिणिनीषुर्वा काम्येष्विष्टपतिं न च॥ (69,4.5
)


महामारी और इति जन्य संकटकाल में अक्षरशः पालन  किये जाते थे ग्रन्थ कथन

 

इन श्लोकों का गूढ़ अभिप्राय यह है कि जब राज्य के विनाश की स्थिति उपस्थित हो, महारौरव जैसा कष्ट हो, दुर्भिक्ष अथवा अकाल का भय हो या महामारी का प्रकोप हो, तब सम्पूर्ण राष्ट्र में फसलों को कीटों और चूहों से बचाना असम्भव हो जाता है। यहाँ तक कि कभी न सूखने वाली विशाल नदियाँ भी सूख जाती हैं।

ऐसी घोर परिस्थितियों में अथर्ववेद के ज्ञाता विद्वानों को शान्ति के उपाय करने चाहिए। अद्भुत सागर जैसे ग्रन्थों में ऐसे सैकड़ों पृष्ठ मिलते हैं जो संकट काल की शान्ति विधियों से भरे पड़े हैं। बल्लाल सेन के शासन काल में जब ऐसे संकट आए होंगे, तब राजा को स्वयं इन उपायों को लिखकर देशभर में प्रसारित करना पड़ा था।

अथर्ववेद का यह प्रलेख हमें सचेत करता है कि विषम परिस्थितियों में राजा बनने योग्य राजकुमार का राज्याभिषेक भी रोक दिया जाना चाहिए। अध्ययनरत विद्यार्थी विद्या ग्रहण करने में असमर्थ होते हैं और ज्ञान के श्रवण में भी बाधा आती है।

नवीन गृह निर्माण और कन्या का विवाह जैसे मांगलिक कार्य भी ऐसी स्थिति में वर्जित कहे गए हैं। यह निषेधाज्ञा वास्तव में सामाजिक दूरी बनाए रखने का एक प्राचीन माध्यम थी ताकि संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ा जा सके।


वैश्विक संकट का रामबाण हैं हमारे प्राचीन ग्रन्थ 

वर्तमान में 'राक्षस' संवत्सर जैसी परिस्थितियों में हमें अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। संकट के समय केवल बचना ही मुख्य उपाय होता है। हमें संकल्पित होना होगा कि शासन और विशेषज्ञों द्वारा दिए गए निर्देशों का प्रत्येक स्तर पर पालन हो।

इस विषाणु जन्य त्रासदी और 'गदगिरि' संकट को हम सभी को मिलकर टालना होगा। हमारे पूर्वजों का अनुभव और शास्त्रों की मर्यादा ही इस वैश्विक महायुद्ध में हमारे सबसे बड़े शस्त्र हैं। प्राचीन ज्ञान को आधुनिक अनुशासन के साथ जोड़कर ही हम इस महामारी पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

 

-श्रीकृष्ण जुगनू
  राजस्थान

 

 

Follow us on social media and share!