ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प
April 26, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार
नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

“समय” केवल गणना का विषय नहीं, बल्कि एक सजीव शक्ति है, जो ब्रह्मांड की गति और जीवन को संचालित करती है। आदिकाल से मनुष्य ने दिन-रात, ऋतुओं और ग्रहों की चाल को समझकर समय को विभाजित किया- क्षण, मुहूर्त, संवत्सर (वर्ष)। पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा को वर्ष कहा गया, लेकिन प्रश्न उठता है-कौन-सा दिन नए वर्ष की शुरुआत माने?

कालचक्र
भारतीय संस्कृति ने प्राकृतिक दृष्टिकोण और भौगोलिक घटनाओं को आधार मान कर वैज्ञानिक पद्धति से नव वर्ष की परंपराएँ विकसित की। इस लेख के माध्यम से हम भारत में नव वर्ष की परंपरा को जान और समझ पाएंगे।
“मैं समय हूँ!” आपने महाभारत धारावाहिक के आरंभ में सुना ही होगा। लेकिन क्या हम वास्तव में समय को जान पाए है? समय की परिभाषा मानवीय चेतना के साथ-साथ परिवर्तित होती आई है। प्रारंभिक काल में, जब मनुष्य प्रकृति की गोद में निवास करता था, तब उसका समय-बोध सहज एवं स्वाभाविक था। दो घटनाओं के बीच का समय जैसे जन्म और मृत्यु, दिन और रात, धूप और छाँव के क्रमिक परिवर्तन उसे चमत्कृत कर जाते थे। उसका विश्वास था कि जैसे जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी का स्वतंत्र अस्तित्व है, वैसे ही “समय” भी कोई ठोस सत्ता रखता है।
मनुष्य ने अनुभव किया कि समय के प्रवाह को न केवल महसूस किया जा सकता है, बल्कि उसे मापा भी जा सकता है। पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा 365 दिनों में पूर्ण होती है, जिसे संवत्सर, (एक पूर्ण चक्र ) वर्ष कहते है।
एक नया वर्ष का आरंभ हमें कितनी ऊर्जा से भर सकता है, यह सभी ने कभी-न-कभी अनुभूति की ही होगी। इसका सबसे प्राचीन उल्लेख हमें ब्रह्म पुराण में मिलता है, जिसे आदि पुराण भी कहा जाता है। यह सृष्टि के प्रारंभ की विस्तृत व्याख्या करता है। सामान्यतः भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है, क्योंकि यह सृष्टि के प्रथम दिवस के रूप में प्रतिष्ठित है। पौराणिक साहित्यों में ब्रह्मा जी को सृष्टि के रचनाकार माना जाता है।

भगवान ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हुए।
ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि के संतुलन और जीवनचक्र की सुव्यवस्था हेतु कालचक्र (समय चक्र) का निर्माण किया, जिससे सृष्टि संचालन का क्रम तय हुआ। इस पौराणिक आख्यान की वैज्ञानिक दृष्टि से व्याख्या करें तो कृषि, ऋतु परिवर्तन एवं सामाजिक गतिविधियों को व्यवस्थित और लोगों को अनुशासित करने के लिए यह कार्य हुआ। वस्तुतः भारत में ऋतु चक्र में छह ऋतुएँ मानी गईं, जो सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन गति के अनुसार विभाजित हैं, भारत में हमारे तीज त्यौहार इन्हीं के अनुसार मनाए जाते है। जैसे वसंत ऋतु (चैत्र: मार्च-अप्रैल) प्रकृति में नयी चेतना का संचार, नए फूल पत्तियों का खिलना इसे नव वर्ष के रूप में मनाने का पर्व की परंपरा है।

वसंत ऋतु का दृश्य: आम के बौर
जहां एक ओर भारतीय संस्कृति की वैश्विक पटल पर एक अलग पहचान बनाने में तीज-त्यौहारों की अलग व महत्वपूर्ण भूमिका है। वहीं दूसरी ओर यही तीज त्यौहार ही है जो विविध स्वरूप वाले भारतीय समाज को एकता के सूत्र में पिरोते हैं। देश के किसी भी क्षेत्र में इन परंपराओं के माध्यम से जो उत्सव मनाया जाता है उसके मूल में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव ही है।
तीज त्यौहारों के इसी क्रम में भारत में भी नववर्ष मनाया जाता है। हमारे देश में नववर्ष मनाने की परंपरा विविध तरीकों से, विविध दिनों में की है, लेकिन उसके पीछे का कारण हमें एक सूत्र में बांधता है। वह सूत्र है, वर्ष भर के लिए प्राप्त करने वाले अन्न, धन, संपदा, फसल चक्र आदि प्राप्त करने लिए प्रकृति से जो शक्ति प्राप्त होती है, उसके प्रति आभार व्यक्त करना। यह पर्व हमारे जीवन के दैनिक परिश्रम में शक्ति की प्राप्ति और मानसिक, शारीरिक और आत्मिक संतुलन को प्राप्त करने के लिए एक अवसर प्रदान करता है। इस पर्व को नववर्ष के रूप में रूप में मनाने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई इस पर हम आगे चर्चा करते है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जो प्रकृति के नवजीवन, सृजन और परिवर्तन का प्रतीक है। यह तिथि भारतीय परंपरा में केवल खगोलीय गणना से कहीं अधिक सृष्टि के नवसृजन का सजीव उदाहरण है।

गुड़ी पड़वा उत्सव
जब वसंत ऋतु अपनी संपूर्ण आभा में होती है, तब संपूर्ण वातावरण एक नए उल्लास से भर उठता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का सूर्योदय न केवल एक नए संवत्सर की शुरुआत करता है, बल्कि संपूर्ण प्रकृति के जागरण का भी संदेश देता है। आम के वृक्ष मंजरियों से लद जाते हैं, खेतों में गेहूं की बालियां पककर लहराने लगती हैं, और कोयल अपनी मधुर तान से वन-प्रान्तर को गुंजायमान कर देती है। यह वह समय है जब धरती पेड़ पौधों की नई कोपलों का स्वागत करती है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय कालगणना के अनुसार ‘युगादि’ का दिन है। यह वह तिथि है, जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम का राज्याभिषेक हुआ था और विक्रम संवत का प्रारंभ हुआ था। इस दिन घर-आंगन में स्वच्छता, रंगोली, मंगल कलश की स्थापना और हवन-पूजन का आयोजन हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखता है। भारतीय समाज में नववर्ष को उत्सव के रूप में हर्षोल्लास और आनंदपूर्वक मनाया जाता है।

मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में जो प्रथम अन्न जन्मा, वह जौ था, और तभी से यह अन्न ब्रह्म का स्वरूप बन गया। नवरात्रि में जब मिट्टी के कलश के समीप इसे श्रद्धा के साथ बोया जाता है। यह अंकुरण केवल मिट्टी में बीज का प्रस्फुटन नहीं, बल्कि भाग्य की उन संभावनाओं का प्रतीक भी है, जो समय के गर्भ में विद्यमान होती हैं।

नवरात्रि में कलश के पास हरे जौ के अंकुरित पौधे।
यदि जौ दो-तीन दिनों में अंकुरित हो जाए, तो यह सुख-समृद्धि और देवी की कृपा का संदेश लाता है। यदि इसका रंग हरा और ताजगी से भरा हो, तो यह उर्वरता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संकेत देता है। किंतु यदि जौ पीला पड़ जाए, या उसका अंकुरण धीमा हो, तो यह आने वाले समय की कठिनाइयों की पूर्व सूचना मानी जाती है।
परंपरागत मान्यता के अनुसार, इसकी वृद्धि से वर्षा के स्वरूप, कृषि की सफलता और भूमि की उर्वरता का अनुमान लगाया जाता है। यदि यह लहलहाकर बढ़े, तो यह एक समृद्ध फसल और अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियों की सूचना देता है। किंतु यदि यह कमज़ोर या मुरझाया हुआ प्रतीत हो, तो यह भविष्य की कठिनाइयों की ओर संकेत करता है।
वनांचल क्षेत्रों में नववर्ष की शुरुआत तीज त्यौहारों से होती है। इस समय सूरज ठीक भूमध्य रेखा के ऊपर होता है, और अब कर्क रेखा की ओर उत्तर दिशा में गति करता है। इसकी वजह से दिन बड़े होने लगते है, रात छोटी होने लगती है। सूरज की तपिश धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। धरती फसल के अगले चक्र के लिए स्वयं को तैयार करने में जुट जाती है।
बस्तर जैसे वनांचालों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा विशेष रूप से उनके पर्व-त्यौहारों में देखी जा सकती है। इन समाजों में प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान का अनूठा उदाहरण उनके पहले त्यौहार ‘माटी तिहार’ में देखने को मिलता है। इसे विभिन्न क्षेत्रों में बीज तिहार, चैत लेंज (चैत्र पर्व), चैतरा या चैइतरई, उगादि (युगादि) जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है।

बस्तर माटी तिहार: धरती माता पूजा करते हुए
इन पर्वों में सबसे पहले धरती माता की आराधना की जाती है। इस पूजा के माध्यम से समाज के लोग मिलकर धरती को धन्यवाद देते है कि उसने वर्षभर उन्हें जीवनदायी अन्न प्रदान किया। यह पर्व एक तरह से प्रकृति के साथ उनके सामंजस्यपूर्ण संबंध को दर्शाता है, जिसमें वे न केवल धरती माता की आराधना करते हैं, बल्कि आने वाले वर्ष में भी पर्याप्त अनाज और ऊर्जा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। यह त्यौहार हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का स्मरण कराता है और धरती के संरक्षण की दिशा में हमें प्रेरित करता है।

लेख:
वेद प्रकाश सिंह
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे
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